हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 111, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ें-२६ ] पराधीन जीवनकी निन्दा ९१
और-स्वाधीनताका होनाही जन्मकी सफलता है, और जो पराधीन होने
परभी जीते ( कहलाते ) हैं तो मरे कौनसे हैं ? अर्थात् वेही मरेके समान हैं
जो पराधीन हो कर रहते हैं ॥ २२ ॥
अपरं च,—
एहि गच्छ पतोत्तिष्ठ वद् मौनं समाचर ।
एवमाशाग्रहग्रस्तैः क्रीडन्ति धनिनोऽर्थिभिः ॥ २३ ॥
और दूसरे-धनवान् पुरुष, आशारूपी ग्रहसे भरमाये गये हुए याचकोंके
साथ, 'इधर आ, चला जा, बैठ जा, खड़ा हो, बोल, चुपसा रह' इस तरह खेल
किया करते हैं ॥ २३ ॥
किंच,—
अबुधैरर्थलाभाय पण्यस्त्रीभिरिव स्वयम् ।
आत्मा संस्कृत्य संस्कृत्य परोपकरणीकृतः ॥ २४ ॥
और जैसे वेश्या दूसरोंके लिये सिंगार करती है वैसेही मूर्खोंनेभी धनके लाभ-
के लिये अपनी आत्माको संस्कार करके हृष्ट पुष्ट बनवा कर पराये उपकारके
लिये कर रक्खी है ॥ २४ ॥
किंच,—
या प्रकृत्यैव चपला निपतत्यशुचावपि ।
स्वामिनो बहु मन्यन्ते दृष्टिं तामपि सेवकाः ॥ २५ ॥
और जो दृष्टि स्वभावहीसे चपल है और मल, मूत्र आदि नीची वस्तुओं परभी
गिरती है ऐसी स्वामीकी दृष्टिका सेवकलोग बहुत गौरव करते हैं ॥ २५ ॥
अपरं च,—
मौनान्मूर्खः प्रवचनपटुर्वातुलो जल्पको वा
क्षान्त्या भीरुर्यदि न सहते प्रायशो नाभिजातः ।
धृष्टः पार्श्वे वसति नियतं दूरतश्चाप्रगल्भः
सेवाधर्मः परमगहनो योगिनामप्यगम्यः ॥ २६ ॥
और चुपचाप रहनेसे मूर्ख, बहुत बातें करनेमें चतुर होनेसे उन्मत्त अथवा
वातून, क्षमाशील होनेसे डरपोक, न सहन सकनेसे नीतिरहित (अकुलीन),
सर्वदा पास रहनेसे ढीठ, और दूर रहनेसे घमंडी कहलाता है. इसलिये सेवाका
धर्म बड़ा रहस्यमय है ( सब क्लेश सहन करनेवाले ) योगियोंसेभी पहचाना नहीं
जा सका है ॥ २६ ॥