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हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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पृष्ठ 109

-१९ ] दैवकी समस्या ८९
अरक्षितं तिष्ठति दैवरक्षितं
सुरक्षितं दैवहतं विनश्यति ।
जीवत्यनाथोऽपि वने विसर्जितः
कृतप्रयत्नोऽपि गृहे न जीवति ॥ १८ ॥
दैवसे रक्षा किया हुआ, विना रक्षाके भी ठहरता ( बच जाता ) है, और
अच्छी तरह रक्षा किया हुआ भी, दैवका मारा हुआ नहीं बचता है, जैसे
वनमें छोड़ा हुआ सहायहीनभी जीता रहता है, घर पर कई उपाय करनेसेभी
नहीं जीता है ॥ १८ ॥
ततो दिनेषु गच्छत्सु संजीवकः स्वेच्छाहारविहारं कृत्वारण्यं
भ्राम्यन् हृष्टपुष्टाङ्गो बलवन्ननाद । तस्मिन्वने पिङ्गलकनामा सिंहः
स्वभुजोपार्जितराज्यसुखमनुभवन्निवसति ।
फिर कितनेही दिनोंके बाद संजीवक अपनी इच्छानुसार खाता पीता वनमें
फिरता फिरता हृष्ट पुष्ट हो कर ऊंचे स्वरसे डकराने लगा; उसी बनमें पिंगलक
नाम एक सिंह अपनी भुजाओं ( स्वबल ) से पाये हुए राज्यके सुखका भोग
करता हुआ रहता था.
तथा चोक्तम्—
नाभिषेको न संस्कारः सिंहस्य क्रियते मृगैः ।
विक्रमार्जितराज्यस्य स्वयमेव मृगेन्द्रता ॥ १९ ॥
जैसा कहा है—मृगोंने सिंहका न तो राज्यतिलक किया और न संस्कार किया
परंतु सिंह अपने आपही पराक्रमसे राज्यको पा कर मृगोंका राजा होना दिखला-
ता है ॥ १९ ॥
स चैकदा पिपासाकुलितः पानीयं पातुं यमुनाकच्छमगच्छत् ।
तेन च तत्र सिंहेनाननुभूतपूर्वकमकालघनगर्जितमिव संजीवक-
नर्दितमश्रावि । तच्छ्रुत्वा पानीयमपीत्वा स चकितः परिवृत्य
स्वस्थानमागत्य किमिदमित्यालोचयस्तूष्णीं स्थितः । स च तथा-
विधः करटकदमनकाभ्यामस्य मन्त्रिपुत्राभ्यां शृगालाभ्यां दृष्टः ।
तं तथाविधं दृष्ट्वा दमनकः करटकमाह—'सखे करटक ! किमित्य-
यमुदकार्थी स्वामी पानीयमपीत्वा सचकितो मन्दं मन्दमव-