हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 108, कुल 302 में से
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८८ हितोपदेशः [सुहृद्भेदः १४-
तमालोक्य वर्धमानोऽचिन्तयत्—
‘करोतु नाम नीतिज्ञो व्यवसायमितस्ततः ।
फलं पुनस्तदेवाप्यं यद्विधेर्मनसि स्थितम् ॥ १४ ॥
उसे देख कर वर्धमान चिंता करने लगा—‘नीति जानने वाला इधर उधर
भले ही व्यापार करे, परंतु उसको लाभ उतना ही होता है कि जितना
विधाताके जीमें है ॥ १४ ॥
किंतु,—
विस्मयः सर्वथा हेयः प्रत्यूहः सर्वकर्मणाम् ।
तस्माद्विस्मयमुत्सृज्य साध्ये सिद्धिर्विधीयताम्’ ॥ १५ ॥
परंतु—सब कार्योंको रोकने वाले संशयको छोड़ देना चाहिये, एवं संदेहको
छोड़ कर, अपना कार्य सिद्ध करना चाहिये’ ॥ १५ ॥
इति संचिन्त्य संजीवकं तत्र परित्यज्य वर्धमानः पुनः स्वयं
धर्मपुरं नाम नगरं गत्वा महाकायमन्यं वृषभमेकं समानीय धुरि
नियोज्य चलितः। ततः संजीवकोऽपि कथंकथमपि खुरत्रये
भारं कृत्वोत्थितः।
यह विचार कर संजीवकको वहां छोड़ कर-फिर वर्धमान आप धर्मपुर नाम
नगरमें जा कर एक दूसरे बड़े शरीर वाले बैलको ला कर जुएमें जोत कर चल
दिया। फिर संजीवकभी बड़े कष्टसे तीन खुरोंके सहारे उठ कर खडा हुआ।
यतः,—
निमग्नस्य पयोराशौ पर्वतात्पतितस्य च ।
तक्षकेणापि दष्टस्य आयुर्मर्माणि रक्षति ॥ १६ ॥
क्योंकि—समुद्रमें डूबे हुएकी, पर्वतसे गिरे हुएकी और तक्षक नाम सर्पसे
डसे हुएकी आयुकी प्रबलता मर्म (जीवनस्थान) की रक्षा करती है ॥ १६ ॥
नाकाले म्रियते जन्तुर्विद्धः शरशतैरपि ।
कुशाग्रेणैव संस्पृष्टः प्राप्तकालो न जीवति ॥ १७ ॥
जो काल न होय तो सैकड़ों बाणोंके बिंधनेसेभी प्राणी नहीं मरता है और
जो काल आ जाय तो केवल कुशाकी नोंकसे छूतेही मर जाता है ॥ १७ ॥