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सर्वकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

पृष्ठ 107, कुल 302 में से

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पृष्ठ 107

-१३ ] द्रव्यसंचय और पुरुषार्थकी प्रशंसा ८७
यतः,—
जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः ।
स हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च ॥ १० ॥
क्योंकि—जैसे जलकी एक एक बूंदके गिरनेसे धीरे २ घड़ा भर जाता है वही
कारण सब प्रकारकी विद्याओंका, धनका और धर्मकाभी है ॥ १० ॥
दानोपभोगरहिता दिवसा यस्य यान्ति वै ।
स कर्मकारभस्त्रेव श्वसन्नपि न जीवति' ॥ ११ ॥
दान और भोगके बिना जिसके दिन जाते हैं वह लुहारकी धोंकनीके समान
सांस लेता हुआभी मरेके समान है ॥ ११ ॥
इति संचिन्त्य नन्दकसंजीवकनामानौ वृषभौ धुरि नियोज्य
शकटं नानाविधद्रव्यपूर्णं कृत्वा वाणिज्येन गतः कश्मीरं प्रति ।
यह सोच कर नन्दक और संजीवक नाम दो बैलोंको जुएमें जोत कर और
छकड़ेको नाना प्रकारकी वस्तुओंसे लाद कर व्यापारके लिये काश्मीरकी ओर गया।
अन्यच्च,—
अञ्जनस्य क्षयं दृष्ट्वा वल्मीकस्य च संचयम् ।
अवन्ध्यं दिवसं कुर्याद्दानाध्ययनकर्मसु ॥ १२ ॥
और दूसरे—काजलके क्रम क्रमसे घटनेको और वल्मीक नाम चींटीके संच-
यको देख कर, दान, पढ़ना और कामधंधामें दिनको सफल करना चाहिये ॥१२॥
यतः,—
कोऽतिभारः समर्थानां किं दूरं व्यवसायिनाम् ? ।
को विदेशः सविद्यानां कः परः प्रियवादिनाम् ? ॥ १३ ॥
क्योंकि—बलवानोंको अधिक बोझ क्या है ? और उद्योग करने वालोंको
क्या दूर है ? और विद्यावानोंको विदेश क्या है ? और मीठे बोलने वालोंका
शत्रु कौन है ? ॥ १३ ॥
अथ गच्छतस्तस्य सुदुर्गनाम्नि महारण्ये संजीवको भग्नजानु-
र्निपतितः ।
फिर उस जाते हुएका, सुदुर्ग नाम घने वनमें, संजीवक घुटना टूटनेसे
गिर पडा ।