हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
हित चौरासी • • २५५
भ्रमहूँ कौ विरह कहत जहाँ डर आवै,
ऐसे हैं रँगीले 'ध्रुव' तनु सुकुमार री।।
-श्रीहित ध्रुवदासजी
यह विरह विक्षेप रहित नित्य मिलन ही श्रीहित हरिवंशचन्द्र महाप्रभु पाद
की उपासना का मूल है और उसका उदाहरण है-
वल्लवी सु कनक वल्लरी...
....राधिका सुनामिनी।
अथवा-
रँगमगे दंपति रसमसे, हित ध्रुव अद्भुत केलि।
छवि तमाल सौं लपटि रही, मानहुँ छबि की बेलि।।
यह सम्भोग श्रृङ्गारमय नित्य विहार ही रस की पराकाष्ठा है। इसी
पराकाष्ठा की ओर इस 'वल्लवी ....नामिनी' पद से सङ्केत किया गया है।
- ८१ -
अवतरण - युगल किशोर नृत्य कर रहे हैं। नृत्य में श्रीप्रियाजी की
प्रधानता है। सखियाँ दर्शन करके आनन्दित हो रही हैं। इस पद में श्रीप्रियाजी
के नृत्य कालीन श्रृङ्गार का वर्णन है-
केदारौ
मूल- वृषभानु नंदिनी मधुर कल गावै।
विकट औघर तान चर्चरी ताल सौं,
नंदनंदन मनसि मोद उपजावै।।
प्रथम मज्जन चारु चीर कज्जल तिलक,
श्रवन कुंडल वदन चंदनि लजावै।
सुभग नकबेसरी रतन हाटक जरी,
अधर बंधूक दसन कुंद चमकावै।।
वलय कंकन चारु उरसि राजत हारु,
कटिव किंकिनी चरन नूपुर बजावै।
हंस कल गामिनी मथति मद कामिनी,
नखनि मदयंतिका रंग रुचि द्यावै।।
२५६ • • हित चौरासी
निर्त्त सागर रभसि रहसि नागरि नवल,
चंद चाली विविध भेदनि जनावै।
कोक विद्या विदित भइ अभिनय निपुन,
भ्रू विलासनि मकर केतनि नचावै।।
निविड़ कानन भवन बाहु रंजित रवन,
सरस आलाप सुख पुंज बरसावै।
उभै संगम सिंधु सुरत पूषन बंधु,
द्रवत मकरंद हरिवंश अलि पावै।।८१।।
भावार्थ – (“सखि!) श्रीवृषभानु नन्दिनी मधुर और सुन्दर गान करती हैं
और गान में अत्यन्त विलक्षण औघर तान से नन्द नन्दन के मन में भी आनन्द
उत्पन्न कर देती हैं। उन्होंने प्रथम स्नान फिर सुन्दर वस्त्र, आँखों में कज्जल,
ललाट पर तिलक और कानों में कुण्डल धारण किया है और इस भूषा से
अनेकों चन्द्रमाओं को लज्जित कर रही हैं। नासिका पर सुन्दर नक बेसर
शोभित है जो स्वर्ण एवं रत्नों से जटित है। जिसके बन्धूक पुष्प से अधर और
कुन्द सी दन्तपंक्ति है। बाहुओं में वाजूबन्द कलाइयों में सुन्दर कङ्कण एवं हृदय
पर हारवली शोभित है एवं कटि में करधनी और चरणों में नूपुर बज रहे हैं
उनके। वह हंस कल गामिनि समस्त सखियों के गर्व को मथ रही है। चरण
नखों में मेहंदी का रङ्ग कैसा चमक रहा है? वह नव नागरी आनन्दित हो होकर
मानो नृत्य रस के सागर में कल्लोल कर रही है। नृत्य के समय चिन्द नामक
अपनी विशेष गति से अनेक प्रकार के भाव भेदों को प्रकट कर रही हैं। श्रीराधा
समस्त कोक विद्याओं की पूर्ण ज्ञाता हैं, भाव और अभिनयों में भी चतुर हैं
अपने केवल भृकुटियों के सङ्केतों से ही कामदेव के समूहों को नचा रही हैं।"
सखि ! अब वे सघन निकुञ्ज भवन में रमण श्रीलालजी के कंधों पर
अपनी भुज लताएँ लपेटे हुए सरस आलाप (गान) के साथ मानो सुख समूहों
की वृष्टि कर रही हैं। फिर कभी दोनों मिलन-रूप समुद्र में सुरत रस का कमल
खिलता है जिससे (प्रेम का) मकरन्द रस बह निकलता है जिसे 'हरिवंश' अलि
(सखी या भ्रमर) पान करती है।
- ८२ -
अवतरण - पद में श्रीप्रियाजी के रूप, गुण, शील, सौन्दर्य, माधुर्य्य,
उदारता, सुकुमारता, कला, विद्या, हाव भाव चातुरी रसिकता आदि अनेक
लक्षणों का वर्णन है। श्रीप्रियाजी के इन्हीं लक्षणों पर श्रीलालजी आसक्त हैं
और इतने आसक्त कि किसी प्रकार उनसे छूट नहीं सकते। श्रीहित सखीजी
इन्हीं बातों का वर्णन करती हैं-
केदारौ
मूल-नागरता की रासि किसोरी।
नव नागर कुल मौलि साँवरौ, वर बस कियौ चितै मुख मोरी।।
रूप रुचिर अँग अंग माधुरी, बिनु भूषन भूषित ब्रज गोरी।
छिन छिन कुसल सुधंग अंग में, कोक रभस रस सिंधु झकोरी।।
चंचल रसिक मधुप मौहन मन, राखे कनक कमल कुच कोरी।
प्रीतम नैन जुगल खंजन खग, बाँधे विविध निबंधनि डोरी।।
अवनी उदर नाभि सरसी में, मनौं कछुक मदिक मधु घोरी।
(जै श्री) हित हरिवंश पिवत सुंदर वर, सीव सुदृढ़ निगमनि की तोरी।।८२।।
भावार्थ-किशोरी राधिका सुन्दरता की राशि हैं। इन्होंने नव नागर समूह
के भी सिरमौर श्याम सुन्दर को अपनी चितवन और ललितभाव से मुख
मोड़ने की क्रिया से ही विवश कर दिया है। इनका रूप अत्यन्त रुचिर है और
अङ्ग-अङ्ग में माधुर्य्य है। ये व्रज गोरी विना भूषणों के ही भूषित है अर्थात्
अत्यन्त रमणीय है। यह सुधङ्ग नृत्य के प्रत्येक अङ्ग में कुशल तो है ही अपितु
एकान्तिक कोक विलास के रस समुद्र में भी प्रतिक्षण सराबोर सी हैं। इन्होंने
परम चञ्चल रसिक मन मोहन भ्रमर के मन को अपने कनक जैसे कुच कमलों
की कोर से ही अटका लिया है और प्रियतम के युगल नयन खञ्जन पक्षियों को
भी (अपने रूप माधुर्य्य आदि) अनेक बन्धन डोरियों से बाँध रखा है।
श्रीहित हरिवंशचन्द्र महाप्रभु पाद (सखी रूप से) कहते है इन परम
सौन्दर्य्य मयी श्रीराधा ने अपने उदर रूप भूमि में स्थित नाभि कुण्डिका में कुछ
एक मधुर एवं मादक रस घोल रखा है, जिसे सुन्दर शिरोमणि श्रीलालजी
वेदों की भी सुदृढ़ मर्यादा-सीमाओं को तोड़कर उल्लङ्घन करके पी रहे हैं।
२५८ • • हित चौरासी
टिप्पणी-
"......पिवत सुंदरवर सींव सुदृढ़ निगमनि की तोरी
राजा परीक्षित के प्रश्न-धर्म स्थापना के लिये अवतरित होकर भी भगवान्
श्रीकृष्ण ने रास-क्रीड़ा जैसा जुगुप्सित कर्म क्यों किया ?-पर शुकदेव जी ने
एक ही उत्तर दिया था-
धर्म व्यत्तिक्रमो दृष्ट ईश्वराणां च साहसम्।
श्रीमद्भागवत-१०/३३/३०
अर्थात् "धर्म के उल्लङ्घन कर देने की सामर्थ्य ईश्वर में है।" क्योंकि
सारी मर्यादाएँ उन्हीं की स्थापित की हुई हैं न ! इस सिद्धान्त के अनुसार नित्य
विहारी श्रीराधावल्लभ लालजी की भी क्रीड़ा समस्त वेद उपनिषद्, शास्त्र एवं
पुराणों की मर्यादाओं से अतीत है, एक दम परे है। जैसा कि सन्त महानुभाव
गण कहते हैं-
(१) अलक्ष्यं राधारव्यं निखिल निगमैरप्यतितरां,
रसाम्भोधेः सारं किमपि सुकुमारं विजयते।
-श्रीहित हरिवंशचन्द रसिकाचार्य
अर्थात् "समस्त वेदों के शिरोभूषण उपनिषदों से भी अलक्षित राधा
नामक जो एक तत्व है, उस परम रस सागर सार रूप अनिवर्चनीय किन्हीं
सुकुमारी की जय हो।
(२) आगम निगम अगोचर राधे चरन सरोज व्यास अवतंस।
श्रीहरिराम जी 'व्यास'
(३) पाई रस भक्ति गूढ़ जुग जुग जग दुर्लभ भव इन्द्रादि विधिम्।
आगम अरु निगम पुरान अगोचर सहज माधुरी रूप निधिम्।।
एवं-
निगम लोक मरजाद भंजि क्रीडन्त रंग रस।
-श्रीदामोदर 'सेवक जी'
(४) अमग निगम की कौन चलावै।
महाविष्णु के मन नहिं आवै।।
-श्रीहित ध्रुवदासजी
हित चौरासी • • २५६
(५) सम्प्रदाय नवधा भगति वेद सुरसरी नीर।
ललिता सखी उपासना ज्यौं सिंहिनि कौ छीर॥
-श्रीभगवत रसिकजी
इत्यादि महापुरुषों के वाक्य प्रमाण हैं। इसी तत्व की ओर नेति नेति
शब्दों से श्रुतियों ने लक्ष्य कराया है। यह नित्य विहार सर्व उपनिषदोपरि तो है
ही साथ-साथ सृष्टि चक्र से भी सर्वथा अतीत है। नित्य विहारी श्रीकृष्ण के
लिये विश्व के उद्भव पालन एवं संहार से कोई सम्बन्ध की आवश्यकता नहीं
है। इसके लिये तो प्रत्येक ब्रह्माण्ड में भिन्न भिन्न ब्रह्मा विष्णु और शिव कार्य
किया करते हैं।
इस प्रकार यह नित्य विहार वेदोपरि, और विश्व से भी परे है। वेदों की
सारी मर्यादाएँ विश्व के सञ्चालन के लिये हैं मनुष्यों की उच्छृङ्खल वृत्तियों के
नियमन के लिये हैं, गुणातीत, सर्वेश्वर, भूमा और अव्यक्त तत्व श्रीनित्य विहारी
लाल पर नियमन, शासन करने के लिये नहीं।
यह नित्य क्रीड़ा नित्य विहारी लाल की सर्व तन्त्र स्वतंत्र आत्म क्रीड़ा
है-प्रेम विलास है। वे अपनी आत्मा श्रीराधा और श्रीराधा की अनेक मूर्ति रूपा
सखि जनों के साथ रमण करते हैं, इसी से राधा रमण कहे जाते हैं। यह विहार
प्राकृत मन बुद्धि और इन्द्रियों का विषय नहीं है इनसे अलक्षित है अतः जब
इनका अविषय है तब उस पर टीका टिप्पणी और उचित अनुचित की मोहर
लगाने का किसी को हक ही कैसा ?
यदि इस विहार को तात्विक दृष्टि से देखें तो ज्ञात होगा कि यह नित्य
विहारी लाल की आह्लादिनि सन्धिनि, लीला और क्रिया शक्ति का दिव्य विलास
है। यह विलास अत्यन्त गोपनीय है अतः वेदों का भी अविषय है, यह स्तर वेदों
से ऊँचा है जो भगवद्रूप रसिक महात्मा गणों के हृदय में ही प्रकट हुआ।* जो
स्तर वेदों से ऊपर है उसमें वेदों की मर्यादाओं का उल्लङ्घन सहज है।
*जिस प्रकार वेदों का साक्षात्कार मन्त्र-द्रष्टा मुनि और ऋषियों ने किया था, उसी
प्रकार इन रसिकों ने-
नित्य बिहार उद्धार कियौ, मथि निज हृदय सिंधु वर वारिज॥
२६० • • हित चौरासी
वास्तव में वेदों की मर्यादाओं का जाल तो माया मुग्ध जीवों को नियन्त्रण
में लाने के लिये है। ब्रह्माजी ने वेद की कर्म डोरीसे सबको नाथ दिया है जिससे
ये उच्छृङ्खल न हो जायें और क्रमशः सत्कर्म परायणता से उठकर भगवत्प्राप्ति
रूप परम फल को प्राप्त करें। तब इन मर्यादाओं से परम पुरुष प्रभु को बँधा
देखना कितना गलत दृष्टि कोण है।
जब उनके उपासक महात्मा गण इन कर्म शृङ्खलाओं से नहीं बँध सकते
तो फिर परात्पर पुरुष, वेदातीत, त्रिगुणातीत परिपूर्णतम भगवान् नित्य विहारी
श्रीराधावल्लभ लाल ही उसके बन्धन में कैस आ सकते हैं ? उनके समक्ष इन
तुच्छ मर्यादाओं का अस्तित्व ही क्या है ? श्रीशुकदेव जी कहते हैं-
यत्पादपङ्कज पराग निषेव तृप्ता
योग प्रभाव विधुताखिल कर्मबन्धाः।
स्वैरं चरन्ति मुनयोजऽपि न नह्यमानां-
स्तरयेच्छयात्तवपुषः कुत एव बन्धः॥
श्रीमद्भा. १०/३३/३५
अर्थात् "जिनके चरण कमलों कीधूलि के सेवन से तृप्त भक्त जन और
योग साधन के प्रभाव से सम्पूर्ण कर्म बन्धनों से मुक्तयोगी जन भी सब प्रकार
के विधि निषेध रूप बन्धनों से छूटे हुए स्वच्छन्द विचरते हैं फिर स्वेच्छा
शरीरधारी श्रीहरि को ही किस प्रकार कर्म का बन्धन हो सकता है ? अर्थात्
नहीं हो सकता।"
अस्तु; इस नित्य विहार में वेद एवं शास्त्रों की मर्यादाएँ तो पग पग पर
टूटती हैं या यों कह दें कि अधिकारी गणों के लिये कर्म बन्धन रूप डोरियों को
तोड़ दिखाने के ही लिये है तो यह कथन अत्युक्ति रूप न होगा।
यह मर्यादातीत विहार केवल श्रीवृन्दावन में ही है और वृन्दावन के
रसिक जनों ने बहुत बहुत प्रकार से इसका गान किया है। इस मर्यादातीत गान
से आज भी श्रीवृन्दावन का रस साहित्य गौरवान्वित है जिसकी एक झाँकी है
यह-
अवनी उदर नाभि सरसी में मनौं कछुक मादिक मधु घोरी।
(जै श्री) हित हरिवंश पिवत सुंदर वर, सींव सुदृढ़ निगमन की तोरी।।
हित चौरासी • • २६१
- ८३ -
अवतरण - हित मयी सखियों ने लता भवन में शय्या रच दी है। रात्रि
का समय है। युगल किशोर के शयन की बेला है किन्तु अकारण या रस वृद्धि
के लिये प्रियाजी मान कर बैठी हैं। श्रीहित सजनी उन्हें मना रही हैं-
केदारौ
मूल- छाँड़िदै मानिनी मान मन धरिबौ।
प्रनत सुंदर सुघर प्रानवल्लभ नवल,
वचन आधीन सौं इतौ कत करिबौ।।
जपत हरि विवस तव नाम प्रतिपद विमल,
मनसि तव ध्यान ते निमिष नहिं टरिबौ।
घटति पलु पलु सुभग सरद की जामिनी,
भामिनी सरस अनुराग दिसि ढरिबौ।।
हौं जु कहति निजु बात सुनु मानि सखि,
सुमुखि बिनु काज घन विरह दुख भरिबौ।
मिलत 'हरिवंश हित' कुंज किसलय सयन,
करत कल केलि सुख सिंधु में तरिबौ।।८३।।
भावार्थ - (श्रीहित सजनी ने कहा-) "मानिनि ! अब मन में इस तरह का
मान रखना छोड़ दो ! देखो, परम सुन्दर नवल किशोर तुम्हारे प्राण वल्लभ ही
तुम्हारे प्रति दीन हो गये हैं तुम्हारे वचनों के अधीन हैं, (अर्थात् तुम्हारे कहे में
हैं ।) फिर उनसे ही ऐसा (मानादि व्यववहार) करना (क्या उचित है) ? हे प्यारी !
श्रीहरि तो तुम्हारे प्रेम में विवश हुए क्षण क्षण में तुम्हारे पवित्र नाम का जप
करते हैं और तुम्हारे ध्यान से पल मात्र के लिये भी अलग नहीं होते। हे
भामिनि ! यह सुन्दर शारदीय रात्रि क्रमशः पल पल करके घट ही तो रही है
अतः आपका सरस अनुराग की ही ओर ढलना उचित है; (मान की ओर नहीं ।")
श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु पाद (सखी रूप से) कहते हैं-"हे सखि ! मैं
जो कुछ कह रही हूँ यह तुम्हारे लिये अपनी (खास) बात है अतः उसे सुनो और
मान भी लो। सुमुखि ! बिना किसी कारण के व्यर्थ ही इतना घनीभूत विरह दुख
२६२ • • हित चौरासी
भोगना क्या उचित है ?" चल कर कुञ्ज भवन में रचित किशलय शय्या पर मधुर
मधुर सुन्दर सुन्दर प्रेम क्रीड़ा कीजिये और सुख समुद्र का अवगाहन कीजिये !"
टिप्पणी—सम्भोग शृङ्गार में मान एक विशेष दुःख दायक स्थिति है चाहे
फिर वह नायक के लिये हो या नायिका के लिये। स्वामी श्रीहरिदासजी ने अपने
केलिमाल में एक पद लिखा है, जिसमें श्रीलालजी के द्वारा प्रार्थना करायी गयी
है कि हे प्रियाजी ! आप मान न किया करें मुझे ऐसा वरदान दीजिये। इसीसे
अनुमान किया जा सकता है कि कितनी वेदना पूर्ण स्थिति है इस मान की।
इसमें उद्विग्नता और विकलता का तो ओर छोर नहीं मिलता। बात बात पर
भय और आशङ्काएँ खड़ी दिखती हैं, श्रम जो मानिनि के मनाने में होता है
उसका तो वारापार नहीं। फिर भी यह 'मान' सम्भोग शृङ्गार का एक विशेष
अङ्ग है।
यद्यपि इस नित्य विहार में विरह मान आदि का भ्रम भी नहीं है फिर भी
मान है। इसका यह अर्थ कि यहाँ 'मान' मान के अर्थ में नहीं वरं रस की वृद्धि
के लिये केलि के विकाश के लिये है क्योंकि इससे रस की विशेष पुष्टि होती है,
ऐसा रसिकाचार्य्यों का मत है।
नित्य विहार की क्रीड़ा में इस मान की स्थिति श्रीप्रियाजी के हृदय में नहीं
है यह वहाँ वाह्य रूप से है। वे सदा अपने प्रियतम के अनुकूल एवं दक्षिण
होकर भी मानवती बन जाती हैं इसका बड़ा ही गम्भीर आशय है। वह यह कि
वे जानती हैं कि मेरी सर्व काल अनुकूल प्रीति से श्रीलालजी को मेरे प्रति,
प्रतिक्षण द्रवित होना पड़ता है तब वे अपने प्रेम प्रवाह को रोकने में स्वयं
असमर्थ हो जाते हैं अतः नाट्य रूप से ही सही मान धारण करके उनके बढ़ते
हुए प्रवाह को रोक देती हैं; जिससे उन्हें अपने स्ववश रहने का अधिक अवसर
मिले यह है कृपालु श्रीराधा के मान का गम्भीरार्थ।
स्वामी श्रीहरिदासजी एवं रसिकाचार्य्य श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु के
नित्य मिलन सिद्धान्त में मान का एक अर्थ उक्त प्रकार से है और अन्यान्य
शैलियों से मान के अनेकों भाव हैं। जो यहाँ प्रकाश में ले आना असम्भव और
अनुचित होगा।
हित चौरासी • • २६३
'हित चौरासी' के सम्पूर्ण पदों का अध्ययन करने पर एक बात पाठकों
को यह भी मिलेगी कि सर्वत्र श्रीप्रियाजी ही मानवती हैं। इसके अनेक कारणों
में से एक तो ऊपर ही कहा जा चुका। दूसरा यह कि यहाँ प्रेम की शैली अन्य
शैलियों से विलक्षण है। यहाँ श्रीराधा प्रेमास्पद और श्रीकृष्ण प्रेमी हैं किन्तु
अन्य उपासना मार्गों में श्रीकृष्ण चन्द्र प्रेमास्पद और श्रीराधा प्रेमी हैं। इसीलिये
अन्य उपासना मार्गों में श्रीकृष्ण के लिये भी मान का अवसर है जैसा कि 'गीत
गोविन्द' एवं जगन्नाथ वल्लभ नाटक में श्रीजयदेव कविराज एवं राय रामानन्द
जी ने वर्णन किया है। इसी प्रकार व्रज लीला गायक महाकवि महात्मा सूरदास
जी ने श्रीराधा से रूठ कर श्याम सुन्दर के चले जाने और श्रीराधा के दुखी
होने विलाप करने का वर्णन कितने ही पदों में किया है। इसके सिवाय व्रज
भाषा एवं संस्कृत साहित्य में नायक नायिका भेद का वर्णन करने वाले कवि,
महात्मा और सन्तों में से अधिकांश ने नायक मान का वर्णन किया है, जो
साहित्य श्रृङ्गार की मर्यादा के शायद अनुकूल है या नहीं, मैं नहीं जानता किन्तु
इससे बचकर चलने वाले दो ही आचार्यों के दर्शन मुझे हुए-
(१) रसिकाचार्य्य वर्य गोस्वामी श्रीहित हरिवंश चन्द्र
(२) रसिकानन्य नृपति स्वामी श्रीहरिदासजी।
ये क्यों बचकर चले ? इसलिये कि इनकी उपासना का लक्ष्य नित्य
मिलन शृङ्गार है और इस नित्य मिलन में प्रधानता नायिका की है, नायक की
नहीं। दूसरे इनकी आराध्या नायिका श्रीराधा स्वाधीन भर्तृका है तथा नायक
अपनी प्रियतमा श्रीराधा के अनुकूल एवं पति हैं; जार (उपपति) एवं बहुनायक
नहीं। यद्यपि यहाँ नायिका श्रीराधा प्रेमास्पद हैं फिर भी उनका प्रेम अपने प्रेमी
नायक श्रीलालजी के प्रति अगाध एवं अपार है। या यों कह दें दोनों दोनों के
प्रेमास्पद हैं। श्रीराधा प्रेमास्पदा का प्रेम अपने प्रेमी के प्रति अगाध और अपार
है, जो प्रवाहित होने पर किसी प्रकार रोका नहीं जा सकता, अतएव उसका
प्रवाहित न होना आवश्यक है इसलिये भी यहाँ नायक मान की आवश्यकता
नहीं रह जाती। इसके विपरीत नायक की दशा है कि वह दीन और अधीन है
अपनी प्रिया नायिका के। उसका प्रेम बढ़ता रहता है अतः उसे रोकर कर
२६४ • • हित चौरासी
सामान्य स्थिति में रखने की आवश्यकता है इसीलिये वह नायिका मान द्वारा
रोका जाता है।
इसके अतिरिक्त एक विशेष बात यह है, जिसे सभी रस शास्त्रों ने
स्वीकार किया है कि रस की सम्पुष्टि नायिका के ही प्राधान्य में होती है, नायक
के प्राधान्य में नहीं। श्रीहिताचार्य्य चरण रस के सुज्ञ आचार्य्य हैं उन्होंने अपनी
उपासना में श्रीप्रियाजी का ही स्थान प्रधान रखा है इसके अनेक कारणों में एक
यह भी है कि वे उक्त सिद्धान्त की महत्ता को ध्यान में रखते हैं। उन्हें ज्ञात है कि
नायक की प्रधानता तो दूर रही समकक्षता स्वीकार करने में भी रसाभास हो
जाता है। इसी रसाभास से बचकर उन्होंने अपने समस्त ग्रन्थों का प्रणयन
किया है।
रसों की परिभाषा के क्षेत्र में कटु, अम्ल, और तिक्त भी रस कहे गये हैं
और साहित्य क्षेत्र में वीर, भयानक एवं वीभत्स तक। किन्तु इन रसों के
आस्वादन कर्त्ता रसिक न कहे जायेंगे अपितु छः रसों में से मधुर और नव रसों
में से शृङ्गाररस के आस्वादन कर्त्ता ही रसिक पद से विभूषित होंगे। इसीलिये
श्रीसेवक दामोदरजी ने कहा-
रसिक बिनु कहें सबही जु मानत बुरौ,
कहौ रसिकई कैसे जु जानी ?
रसिक न कहे जाने से आराधक वर्ग में से प्रायः सभी को बुरा तो अवश्य
लगता है पर 'आपने रसिकता कैसे जानी कहाँ से जानी ? इस प्रश्न का
उनके पास कोई उत्तर नहीं है। इस पर यदि वे रसिकता की वाञ्छा करते हैं
तो उन्हें सीधा मार्ग दिखाते हैं-
जौरु तुम रसिक रस रीति के चाड़िले,
तौरु मन देहु हरिवंश बानी।
ठीक तो है, यदि तुम्हें रसिक कहलाना है और तुम्हारे चित्त में रस रीति
की वाञ्छा है तो तुम श्रीहरिवंशचन्द्र की रसमयी सुधा वाणी में मन दो।
क्योंकि यही रसिकाचार्य्य है और इनकी वाणी, रस।
हित चौरासी • • २६५
अब यह देखना है कि इन युगल रसिक नृपति आचार्य्य के सिद्धान्त से
विपरीत जिन्होंने नायक मान स्वीकार किया है। उनके सिद्धान्त से प्रेम विलास
में रस का कैसा परिपाक हुआ है और वहाँ नायक एवं नायिका का पारस्परिक
सम्बन्ध क्या है ? पश्चात् यह भी देखना होगा कि श्रीहिताचार्य्य चरण के रस
सिद्धान्त से उनके रस सिद्धान्त का संतुलन माप क्या है ?
श्रीकृष्ण ही रस और रसिकता के मूर्त्त रूप हैं। सबने यह स्वीकार किया
है कि श्रीकृष्ण गोपियों एवं श्रीराधा के जार (उपपति) और बहुनायक हैं तथा
समस्त युवती मण्डल के प्रेमास्पद भी। जैसा कि माध्व गौड़ीय सम्प्रदायाचार्यों
का मत है-
आराध्यो भगवान् व्रजेश तनयस्तद्धाम वृन्दावनं,
रम्याकाचिदुपासना व्रजवधू वर्गेण या कल्पिता।
श्रीमद्भागवतं पुराणममलं प्रेमापुमर्थो महान्,
श्रीचैतन्यमहाप्रभोर्मतमिदं तत्राग्र हो नापरः।।
अर्थात् " आराध्य है व्रजराजनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण, उनका धाम है
श्रीवृन्दावन। पूर्वकाल मे व्रज वधू गणों ने जिस भाव से आराधना की है वही
कोई रम्य (परकीया शृङ्गार रस की) उपासना है। इसका प्रमाण है श्रीमद्भागवत
जैसा अमल पुराण और इस उपासना का लक्ष्य है परम पुरुषार्थ प्रेम लक्षणा
भक्ति। बस इतना ही श्रीचैतन्य महाप्रभु पाद का मत है जो साधक के लिये
अवश्य ग्रहणीय है; अन्य नहीं।"
इसके उदाहरण श्रीमद्भागवत एवं परकीया भाव से सम्बन्ध रखने वाले
समस्त महात्माओं के काव्यों में मिलेंगे। इस रस का आस्वादन वहाँ वहाँ किया
जा सकता है। अब पाठक इस रस को ध्यान में रखते हुए श्रीहिताचार्य्य चरण
रस सिद्धान्त की ओर दृष्टि करें-
नित्य विहार अखंडित धारा।
एक बैस रस विवि सुकुमारा।।
नित्य किसोर रूप निधि सीवाँ।
२६६ • • हित चौरासी
तिन बिच अन्तर पल कौ नाहीं।
तऊ तृषित प्रीतम मन माँहीं।।
अद्भुत सहज रंग सुखदाई।
तहाँ प्रेम की एक दुहाई।।
पिय गज मत्त न अंकुस के बस।
परम सुछन्द फिरत अपनैं रस।।
देखत हीं तिनकी परछाँही।
मदन कोटि व्याकुल है जाहीं।।
ते मोहन बस कीनें गोरी।
राखे बाँधि प्रेम की डोरी।।
छुटत न क्यौंहूँ ऐसे अटके।
प्राँन हारि चरनन तर लटके।।
प्रीति की रीति लाल ही जानैं।
तजि प्रभुता बिनु मोल बिकानैं।।
प्रेम मयी रस मैंन विनोदा।
नव नव उपजत है दुहुँ कोदा।।
रहत है दिनहिं प्रेम सरसाई।
तहाँ मान की कहाँ समाई।।
सूच्छम प्रेम न मन में आवै।
स्थूल रूप सबही कौं भावै।।
यह है श्रीहिताचार्य्य का रसमय सिद्धान्त।
जहाँ-नायक तहाँ न नायिका रस करवावत केलि।
सखी उमै संगम सरस पिवत नैन पुट झेलि।।
अब विज्ञ रसज्ञ जन परखें कहाँ रस है और कहाँ रसाभास ? इसीतरह
मान नायक का उचित है या नायिका का तथा किस मान में रस की पूर्णतया
पुष्टि होती है ?
हित चौरासी • • २६७
- ८४ -
अवतरण-आज सम्पूर्ण रात्रि युगल किशोर ने रति रस विलास किया है
पर सखियों की चोरा चोरी। प्रातः काल रति रस के चिह्नों के प्रकाश ने चोरी
प्रकट कर ही दी। श्रीहित सखी ने ठिठोली सी करते हुए अपनी प्राणाधार
स्वामिनी श्रीराधा से कहा-
केदारौ
मूल-आजुऽब देखियत है हो प्यारी रंग भरी।
मोपै न दुरति चोरी वृषभानु की किसोरी;
सिथिल कटि की डोरी, नंद के लालन सौं सुरत लरी।।
मोतियन लर टूटी चिकुर चंद्रिका छूटी;
रहसि रसिक लूटी गंडनि पीक परी।
नैननि आलस बस अधर बिंब निरस;
पुलक प्रेम परस हित हरिवंश री राजत खरी।।८४।।
भावार्थ - (श्रीहित सखी ने कहा-"सखी !) हे प्यारी आज तुम इस
समय आनन्द से भरी हुई दिख रही हो और हम देख रही हैं। हे वृषभानु की
किशोरी ! मुझसे भला आपकी चोरी (छिप छिप कर की गई रति क्रीड़ाएँ,
मिलन, प्रियतम सम्भोग की बातें) कैसे छिपाये छिपेंगी ? नहीं छिप सकतीं।
देखो न; तुम्हारी कटि की डोरी (कटि बन्धन, नीबी) ढीली है; अतः (स्पष्ट है
कि) तुम नन्द के दुलारे श्रीश्याम सुन्दर से अवश्य सुरत युद्ध करती रही हो।
[या अब प्रातःकाल उनसे रति युद्ध करके ही आयी हो।]
श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभुपाद (सखी भाव से) कहते हैं-"राधे ! तुम्हारी
मोती माला टूट चुकी है और गुँथी हुई केश चन्द्रिका भी छूट चुकी है। कपोलों
पर पीक चिह्न भी अङ्कित हैं (इससे ज्ञात होता है कि) रसिक लाल जी ने तुम्हें
एकान्त में लूट लिया है। अरी ! तुम्हारी आँखें आलस्य वश हैं और बिम्बा फल
से अधर भी रङ्ग हीन या रस हीन से हैं। तुम्हारा सम्पूर्ण शरीर प्रेम के स्पर्श के
कारण पुलकित है। अहा ! तुम अब इन सम्पूर्ण शोभाओं से युक्त होकर कैसी
भली लग रही हो ?" (अर्थात् 'राजत खरी' यह मधुर व्यङ्गोक्ति भी है।)
२६८ • • हित चौरासी
टिप्पणी – इस पद में सम्भोग शृङ्गार की चरम सीमा सुरत विहार का
वर्णन है। ग्रन्थ के इस अन्तिम पद में सुरत विहार का वर्णन करके मानो अपने
सेव्य नित्य विहारी लाल की आनन्दमयी केलि सुरत क्रीड़ा की नित्य स्थिति
का लक्ष्य कराया गया है। प्रथम पद में "जोई जोई प्यारो करै......तरंगनि
न्यारे।"
कह कर युगल सरकार के अत्यन्त गाढ़ एकाकार प्रेम का लक्ष्य कराया
गया था। ग्रन्थ के मध्य में उपपत्ति रूप से उसी रस को नाना केलि कलाओं से
पुष्ट किया गया। मानो इस हित वाणी सुधार्णव में अनेकों लहरियाँ उठीं और
समा गयीं अन्त में उसी रस की गम्भीरता में–
जै श्री हित हरिवंस करौ दिन दोऊ अचल विहार।
इस प्रकार सम्पूर्ण ग्रन्थ उपक्रम उपपत्ति एवं उपसंहार में आद्यन्त एक
ही रस–प्रेम विलास सुरत क्रीड़ा से ओत प्रोत है। इस अन्तिम पद में केवल
सुरत क्रीड़ा का ही वर्णन करके यह सूचित किया गया कि यह रस नित्य
अविचल और अखण्ड है किंवा श्रीवृन्दावनेश्वरी, श्रीकृष्णआह्लादिनि, नित्यानन्द
मयी नित्य नवल किशोरी श्रीराधा और उनके प्रियतम रसिक शेखर नित्यानन्द
मय उन्नत नवल किशोर सदा एक रस अविचल विहार में मग्न हैं यह सूचना
है। युगल किशोर की भाँति उनका समस्त परिकर सखी गण, खग, मृग,
श्रीवन के लता तरु आदि सभी नित्यानन्द मय, रस मय और विलास से ओत
प्रोत हैं।
यह श्रीहित हरिवंश चन्द्र रसिकाचार्य्यवर्य का आराध्य तत्व रस है,
जिसका विमल विकाश है श्रीवृन्दावन का अत्युज्ज्वल शृङ्गार पूर्ण नित्य विहार
और जिसकी सुमधुर झाँकी इस सम्पूर्ण ग्रंथ में करायी गयी है।
३४ • • हित चौरासी
यह वे राधा हैं, जिनके नाम का एक बार भी उच्चारण कर लेने पर
सबका आकर्षण करने वाले श्रीकृष्ण भी राधा नाम जापक के पास अपने आप
आकर्षित हुए चले आते हैं। तब फिर उस साधक को समस्त पुरुषार्थों में
तुच्छता का स्फुरण होने लगता है। श्रीकृष्ण स्वयं भी इस नाम का जप करते हैं,
सखि जनों के मुख से इस राधा नाम का गान सुना करते हैं, वे कभी कालिन्दी
के तट पर बैठ कर योगीन्द्रों की भाँति इसका ध्यान करते और प्रेमाश्रु पूर्ण हो
जाया करते हैं तो कभी अति रसानन्द के कारण आनन्द मग्न हो जाया करते
हैं। यह राधा नाम देवताओं भक्तों, मुक्तों और श्रीकृष्ण सुहृदों से भी अत्यन्त दूर
है। इस राधा नाम की महिमा अनिर्वचनीय है। इस नाम के प्रताप से राधा नाम
का गान-स्मरण करने वाले को प्रियतम श्रीकृष्ण अदेय वस्तु देकर भी उसके
ऋणी हो जाया करते हैं और उसके अनन्त एवं लेखा न कर सकने लायक
अपराधों को तत्काल ही क्षमा करके उसे अपना बना लेते हैं। श्रीहिताचार्य
पाद कहते हैं-
अनुल्लिख्यानन्तानपि सदपराधान्मधुपति
र्महाप्रेमाविष्टस्तव परम देयं विमृशति।
तवैकं श्रीराधे गृणत इह नामामृत रसं
महिम्नः कः सीमां स्पृशति तव दास्यैक मनसाम्।।
श्रीराधा सुधा निधि श्लो. १५४
अस्तु; श्रीराधा एक अद्भुत रस तत्व है। जो लावण्य की परम अद्भुतता
से परिपूर्ण है, जिसमें लीला गति दृग्भङ्गी, हास आदि की अद्भुतता विराजमान
है। जब अद्भुत प्रणय-कोप से आकुल होती हैं तब महा रसिक-मौलि श्रीलालजी
सभय कौतुक दृष्टि से देखते ही रह जाते हैं। आपका सौन्दर्य भी अत्यद्भुत है।
श्रीमुख के अनुपम रसानन्द कन्द चन्द्र की चन्द्रिका के कला-अणु मात्र से ही
पूर्णिमा का चन्द्र तुच्छ हो जाता है। अरे ! एक चन्द्र की तो बात ही क्या ? यदि
अनेक अनेक राकाशशि एक साथ उदित होकर अपनी प्रेमामृतमयी ज्योति
तरङ्गों से अगणित कोटि ब्रह्माण्डों को आपूरित कर दें, तो शायद इन विचित्र
चन्द्र समूहों की श्रीराधा मुखचन्द्र की एक किरण से उपमा दी जा सकेगी।