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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 265

हित चौरासी • • २५६
(५) सम्प्रदाय नवधा भगति वेद सुरसरी नीर।
ललिता सखी उपासना ज्यौं सिंहिनि कौ छीर॥
-श्रीभगवत रसिकजी
इत्यादि महापुरुषों के वाक्य प्रमाण हैं। इसी तत्व की ओर नेति नेति
शब्दों से श्रुतियों ने लक्ष्य कराया है। यह नित्य विहार सर्व उपनिषदोपरि तो है
ही साथ-साथ सृष्टि चक्र से भी सर्वथा अतीत है। नित्य विहारी श्रीकृष्ण के
लिये विश्व के उद्भव पालन एवं संहार से कोई सम्बन्ध की आवश्यकता नहीं
है। इसके लिये तो प्रत्येक ब्रह्माण्ड में भिन्न भिन्न ब्रह्मा विष्णु और शिव कार्य
किया करते हैं।
इस प्रकार यह नित्य विहार वेदोपरि, और विश्व से भी परे है। वेदों की
सारी मर्यादाएँ विश्व के सञ्चालन के लिये हैं मनुष्यों की उच्छृङ्खल वृत्तियों के
नियमन के लिये हैं, गुणातीत, सर्वेश्वर, भूमा और अव्यक्त तत्व श्रीनित्य विहारी
लाल पर नियमन, शासन करने के लिये नहीं।
यह नित्य क्रीड़ा नित्य विहारी लाल की सर्व तन्त्र स्वतंत्र आत्म क्रीड़ा
है-प्रेम विलास है। वे अपनी आत्मा श्रीराधा और श्रीराधा की अनेक मूर्ति रूपा
सखि जनों के साथ रमण करते हैं, इसी से राधा रमण कहे जाते हैं। यह विहार
प्राकृत मन बुद्धि और इन्द्रियों का विषय नहीं है इनसे अलक्षित है अतः जब
इनका अविषय है तब उस पर टीका टिप्पणी और उचित अनुचित की मोहर
लगाने का किसी को हक ही कैसा ?
यदि इस विहार को तात्विक दृष्टि से देखें तो ज्ञात होगा कि यह नित्य
विहारी लाल की आह्लादिनि सन्धिनि, लीला और क्रिया शक्ति का दिव्य विलास
है। यह विलास अत्यन्त गोपनीय है अतः वेदों का भी अविषय है, यह स्तर वेदों
से ऊँचा है जो भगवद्रूप रसिक महात्मा गणों के हृदय में ही प्रकट हुआ।* जो
स्तर वेदों से ऊपर है उसमें वेदों की मर्यादाओं का उल्लङ्घन सहज है।
*जिस प्रकार वेदों का साक्षात्कार मन्त्र-द्रष्टा मुनि और ऋषियों ने किया था, उसी
प्रकार इन रसिकों ने-
नित्य बिहार उद्धार कियौ, मथि निज हृदय सिंधु वर वारिज॥