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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

पृष्ठ 263, कुल 275 में से

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पृष्ठ 263
  • ८२ -
    अवतरण - पद में श्रीप्रियाजी के रूप, गुण, शील, सौन्दर्य, माधुर्य्य,
    उदारता, सुकुमारता, कला, विद्या, हाव भाव चातुरी रसिकता आदि अनेक
    लक्षणों का वर्णन है। श्रीप्रियाजी के इन्हीं लक्षणों पर श्रीलालजी आसक्त हैं
    और इतने आसक्त कि किसी प्रकार उनसे छूट नहीं सकते। श्रीहित सखीजी
    इन्हीं बातों का वर्णन करती हैं-
    केदारौ
    मूल-नागरता की रासि किसोरी।
    नव नागर कुल मौलि साँवरौ, वर बस कियौ चितै मुख मोरी।।
    रूप रुचिर अँग अंग माधुरी, बिनु भूषन भूषित ब्रज गोरी।
    छिन छिन कुसल सुधंग अंग में, कोक रभस रस सिंधु झकोरी।।
    चंचल रसिक मधुप मौहन मन, राखे कनक कमल कुच कोरी।
    प्रीतम नैन जुगल खंजन खग, बाँधे विविध निबंधनि डोरी।।
    अवनी उदर नाभि सरसी में, मनौं कछुक मदिक मधु घोरी।
    (जै श्री) हित हरिवंश पिवत सुंदर वर, सीव सुदृढ़ निगमनि की तोरी।।८२।।
    भावार्थ-किशोरी राधिका सुन्दरता की राशि हैं। इन्होंने नव नागर समूह
    के भी सिरमौर श्याम सुन्दर को अपनी चितवन और ललितभाव से मुख
    मोड़ने की क्रिया से ही विवश कर दिया है। इनका रूप अत्यन्त रुचिर है और
    अङ्ग-अङ्ग में माधुर्य्य है। ये व्रज गोरी विना भूषणों के ही भूषित है अर्थात्
    अत्यन्त रमणीय है। यह सुधङ्ग नृत्य के प्रत्येक अङ्ग में कुशल तो है ही अपितु
    एकान्तिक कोक विलास के रस समुद्र में भी प्रतिक्षण सराबोर सी हैं। इन्होंने
    परम चञ्चल रसिक मन मोहन भ्रमर के मन को अपने कनक जैसे कुच कमलों
    की कोर से ही अटका लिया है और प्रियतम के युगल नयन खञ्जन पक्षियों को
    भी (अपने रूप माधुर्य्य आदि) अनेक बन्धन डोरियों से बाँध रखा है।
    श्रीहित हरिवंशचन्द्र महाप्रभु पाद (सखी रूप से) कहते है इन परम
    सौन्दर्य्य मयी श्रीराधा ने अपने उदर रूप भूमि में स्थित नाभि कुण्डिका में कुछ
    एक मधुर एवं मादक रस घोल रखा है, जिसे सुन्दर शिरोमणि श्रीलालजी
    वेदों की भी सुदृढ़ मर्यादा-सीमाओं को तोड़कर उल्लङ्घन करके पी रहे हैं।