हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
हित चौरासी • • १११
- २८ -
अवतरण – वसन्त के सुहावने समय में श्रीवृन्दावन की अवर्णनीय शोभा
है किन्तु श्रीप्रियाजी मानिनि बनी बैठी हैं। इस समय हित सहचरि ने श्रीवन की
अपूर्व शोभा का दर्शन कराते हुए मानिनि प्रिया के मान का मोचन करने के लिये
श्रीलालजी की प्रशंसा की। पश्चात् उद्दीपन विभाव श्रीवृन्दावन का वसन्त यश
गान किया जिसे सुनकर मानिनी का मान छूट गया और वे प्रियतम से जा मिलीं।
इस पद में इसी भाव का वर्णन है। श्रीहित सहचरि श्रीप्रियाजी से कहती
हैं-
वसन्त
मूल-राधे देखि वन की बात।
रितु बसंत अनंत मुकुलित कुसुम अरु फल पात।।
बैंनु धुनि नँदलाल बोली, सुनिऽब क्यौं अर सात।
करत कतऽब विलंब भामिनि वृथा औसर जात।।
लाल मरकत मनि छबीलौ तुम जु कंचन गात।
बनी (श्री) हित हरिवंश जोरी उभै गुन गन मात।।२८।।
भावार्थ – "प्यारी राधे ! श्रीवृन्दावन की छटा तो देखो ! वसन्त ऋतु
अनन्त पुष्प फल और पत्रों से मुकुलित है-खिली हुई है। (ऐसे समय में) वेणु
ध्वनि के द्वारा श्रीनन्द लाल ने तुम्हें बुलाया है फिर (तुम उस ध्वनि को सुनकर
भी) आलस्य क्यों कर रही हो ? हे भामिनि ! विलम्ब किस लिये कर रही हो,
देखो (कैसा सुन्दर) अवसर व्यर्थ जा रहा है !
श्रीहित हरिवंश चन्द्र (सखी रूप से) कर रहे हैं-"अहा ! तुम दोनों की
कैसी सुन्दर जोड़ी बनी है जो (दोनों ओर से) अनेक गुण समूह से मत्त है-परिपूर्ण
है, जैसे श्रीलालजी मरकत मणि जैसे छविमय है वैसे ही तुम भी कनक वपु हो।" - २९ -
अवतरण – श्रीकृष्ण आह्लादिनि, श्रीकृष्ण की हृदय भूषण स्वरूपा परम
सुन्दरी, ब्रज नव तरुणि कदम्ब शिरोमणि नित्य नवल किशोरी श्रीराधा अपने
११२ • • हित चौरासी
रूप लावण्य, माधुर्य्य, यौवन, गुण, शील, हाव भाव, कौशल आदि सभी उत्तमा
नायिकोचित रस एवं गुणों में सर्वापेक्षा अत्युत्कृष्ट हैं-अनुपमेय हैं ? वे श्रीकृष्ण
की आराधनीया हैं कौन श्रीकृष्ण? पूर्ण पुरुषोत्तम प्रकट परावर नाथ स्वयं
भगवान् श्रीकृष्ण बस, इससे अधिक और क्या कहा जा सकता है उनकी
महिमा के सम्बन्ध में।
और रस एवं श्रृङ्गार के क्षेत्र में भी उनसे श्रेष्ठ कोई नायिका नहीं है।
उनके शुभ लक्षणों का सम्पूर्णतया वर्णन करने में सभी शास्त्र और उपनिषद्
थकित हैं-हतप्रभ हैं। बस उनकी जैसी तो केवल वही हैं। वे रस रूपा हैं, रस
भूषण हैं, रस निधि हैं, और रस दात्री भी हैं।
भगवती श्रुति के सङ्केत रसो वै सः अर्थात् वह रस रूप है की यही प्रत्यक्ष
मूर्त्ति हैं। इनका साक्षात्कार, अनुभव और रस पान करने पर ही श्रुति के रसं
ह्येवायं लब्ध्वानन्दी भवति' अर्थात् निश्चय ही इस रस को प्राप्त करके (मनुष्य)
आनन्द मय हो जाता है, इस वाक्य का साक्षात्कार होता है।
अस्तु, यहाँ पर उन्हीं उपनिषदोपरि श्रीकृष्ण हृदयेश्वरी श्रीराधा के नख
शिख रूप श्रृङ्गार का वर्णन श्रीहिताचार्य्य चरण शाखा चन्द्र न्याय से कर रहे हैं-
देव गंधार
मूल-ब्रज नव तरुनि कदंब मुकुट मनि स्यामा आजु बनी।
नख सिख लौं अँग अंग माधुरी मोहे स्याम धनी।।
यौं राजत कबरी गूँथित कच कनक कंज वदनी।
चिकुर चंद्रिकनि बीच अरध विधु मानौं ग्रसित फनी।।
सौभग रस सिर स्रवत पनारी पिय सीमंत ठनी।
भृकुटि काम कोदंड नैन सर कज्जल रेख अनी।।
तरल तिलक ताटंक गंड पर नासा जलज मनी।
दसन कुंद सरसाधर पल्लव प्रीतम मन समनी।।
चिबुक मध्य अति चारु सहज सखि साँवल बिंदु कनी।
प्रीतम प्रान रतन संपुट कुच कंचुकि कसिब तनी।।
भुज मृनाल वल हरत वलय जुत परस सरस श्रवनी।
स्याम सीस तरु मनौं मिडवारी रची रुचिर रवनी।।
हित चौरासी • • ११३
नाभि गंभीर मीन मोहन मन खेलन कौं हृदनी।
कृस कटि पृथु नितंब किंकिनि वृत कदलि खंभ जघनी।।
पद अंबुज जावक जुत भूषन प्रीतम उर अवनी।
नव नव भाइ विलोभि भाम इभ विहरत वर करिनी।।
(जै श्री) हित हरिवंश प्रसंसित स्यामा कीरति विसद घनी।
गावत श्रवननि सुनत सुखाकर विस्व दुरित दवनी।।२९।।
भावार्थ – (समस्त) व्रज की नव युवतियों के समुदाय में भी मुकुट मणि
स्वरूपा श्यामा (श्रीराधा) आज बड़ी भली बनी हैं-शोभित हैं, जिनकी नख
शिख पर्यन्त अङ्ग प्रत्यङ्ग माधुरी पर प्रियतम प्राणेश्वर श्रीश्याम सुन्दर मोहित
हैं। अहा ! स्वर्ण कमल मुखी श्रीराधा गुँथे हुए केशों के जूड़े (कबरी) से ऐसी
शोभित हैं मानो केश चन्द्रिका रूप फणि (सर्प) ने चन्द्र (रूप श्रीमुख कमल) को
आधा निगल रखा हो। स्वयं प्रियतम श्रीलालजी ने आपका सीमन्त शृङ्गार
किया है। वह सीमन्त शृङ्गार ही मानो (श्रीराधा के) सुहाग-रस की पनारी
(धारा) सिर में बह रही है। भृकुटियाँ ही काम के धनुष हैं नयन बाण हैं और
कज्जल की रेखा ही बाणों की नोंक हैं। ललाट पर तरल तिलक और कपोलों
पर ताटङ्क झिलमिल झिलमिल कर रहे हैं, नासा पर सुन्दर मणि मुक्ता शोभित
है। कुन्द कली जैसे दशन हैं और अधर पल्लव भी बड़े सरस हैं, ऐसी सरसधर
पल्लवा श्रीराधा प्रियतम श्रीलालजी के मन की शान्ति करती हैं।
हे सखि! चिबुक के मध्य में अत्यन्त सुन्दर स्वाभाविक श्याम बिन्दु कण
(तिल) शोभित है। प्रियतम के प्राण रूप रत्नों की रक्षा करने वाले सम्पुट
(डिब्बे) की तरह कुचों पर बन्धनों द्वारा कञ्चुकि कसी है। वलय सयुक्त भुज
मृणाल स्पर्श करते ही बल का हरण करते और रस का सञ्चार करते हैं। श्याम
तमाल विटप रूप श्रीश्याम सुन्दर के शीश को आवेष्टित करने वाली इस
मिडवारी लता की रचना उन्होंने (श्रीप्रियाजी ने) कर रखी है। [अर्थात् श्री
प्रियाजी ने श्रीश्याम सुन्दर के गलबहियाँ दे रखी है।] श्रीप्रियाजी की नाभि
क्या है मानो मोहन के मीन मन के खेलने के लिये कुण्डिका है। श्रीराधा पतली
कटि युक्त हैं। पुष्ट प्रथुल नितम्ब प्रदेश किङ्किणि से आवृत है तथा ये कदलि
स्तम्भ जैसे जङ्घा वाली हैं। इनके चरण कमल जावक (महावरु) एवं भूषणों से
११४ • • हित चौरासी
संयुक्त हैं एवं सदा प्रियतम की हृदय अवनी में विराजित हैं ये चरण। नवीन
नवीन भावों के द्वारा भामिनि श्रीराधा प्रियतम को प्रलोभित कर कर के ऐसे
विहार करती हैं जैसे मत्त गजराज के साथ उन्मत्त करिणि।
श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु कहते हैं कि मेरे द्वारा प्रशंसित श्रीश्यामा की
कीर्त्ति पवित्र एवं अत्यधिक है, जिसका गान एवं श्रवण कर्ण पुटों के लिये सुख
का समुद्र है और विश्व के समस्त पाप तापों का दमन शमन करने वाला भी।
- ३० -
अवतरण - शरद मास की राका रजनी है। शीतल पवन धीरे-धीरे बह
रहा है। सरोवरों में कमल विकसित हैं और वृन्दावन विभिन्न पुष्पों से अलङ्कृत
है, मधु लोभी मधुप गण गुंआर करते हुए फूलों पर मँड़रा रहे हैं।
श्रीप्रिया प्रियतम ने विविध प्रकार के किशलय दल एवं पुष्पों से एक
मनोहर शय्या निर्मित की है और उस पर परम रसिक युगल किशोर विराजमान
हैं, परम एकान्त कुञ्ज भवन में। निकट में न कोई सखियाँ हैं न दासियाँ ही।
जब युगल रसिक रति रण से विथकित होकर प्रेम मूर्च्छा से विथकित हो
जाते हैं, तब ललितादिक निज सहचरियाँ आकर उन पर व्यंजन आदि करने
लगती हैं अपने अञ्चल से। वे इसे अपना परम सौभाग्य समझती हैं।
इसका वर्णन श्रीहित सजनी अपनी किसी अन्तरङ्ग सखी से इस प्रकार
करती हैं-
देव गंधार
मूल-देखत नव निकुंज सुनु सजनी लागत है अति चारु।
माधविका केतकी लता लै रच्यौ मदन आंगारु॥
सरद मास राका निसि सजनी सीतल मंद सुगंध समीर।
परिमल लुब्ध मधुव्रत विथकित नदित कोकिला कीर॥
वहु विध रंग मृदुल किसलय दल निर्मित पिय सखि सेज।
भाजन कनक विविध मधु पूरित धरे धरनि पर हेज॥
तापर कुसल किसोर किसोरी करत हास परिहास।
प्रीतम पानि उरज वर परसत प्रिया दुरावति वास॥
हित चौरासी • • ११५
कामिनि कुटिल भृकुटि अवलोकत दिन प्रतिपद प्रतिकूल।
आतुर अति अनुराग विवस हरि धाइ धरत भुज मूल॥
नागर नीवी बंधन मोचत ऐंचत नील निचोल।
बधू कपट हठ कोपि कहत कल नेति नेति मधु बोल॥
परिरंभन विपरित रति वितरत सरस सुरत निजु केलि।
इंद्रनील मनिमय तरु मानौं लसत कनक की बेलि॥
रति रन मिथुन ललाट पटल पर श्रम जल सीकर संग।
ललितादिक अंचल झकझोरतिं मन अनुराग अभंग॥
(जै श्री) हित हरिवंश जथामति बरनत कृष्ण रसामृत सार।
श्रवन सुनत प्रापक रति राधा पद अंबुज सुकुमार॥३०॥
भावार्थ- (श्रीहित सखी ने कहा-) "हे सजनी ! सुन तो सही ! यह नव
निकुञ्ज देखने में कितना सुन्दर लगता है ! मदन ने माधवी, केतकी आदि
लताओं से निकुञ्ज भवन बनाये हैं। शरद मास की पूर्ण राका रजनी है, शीतल
एवं सुगन्धित पवन धीरे धीरे बह रहा है और सुगन्ध से लुब्ध भ्रमर मादकता
के कारण विथकित हो रहे हैं। कोकिला और कीर गान कर रहे हैं।
(ऐसे सुहावने काल में) विविध रत्नों के बहुत से मृदुल किशलय दलों से
हे सखी ! श्रीलालजी ने शय्या रची है। वहीं पर अनेकों कनक घट नाना प्रकार
के मधु आसवों से भरे भूमि पर संजोकर रख गये हैं। उस शय्या पर कुशल
किशोर और किशोरी बैठे हास परिहास कर रहे हैं। प्रियतम अपने करों से
प्रियाजी के वर उरोजों का स्पर्श करते और वे उन्हें अपने अञ्चल से छिपा लेती
हैं। (प्रेम रोष से) कामिनि कुटिल भौंहों द्वारा प्रियतम की ओर देखतीं और सदा
बात बात पर प्रतिकूल सी बनती हैं। किन्तु अति अनुराग से विवश और आतुर
श्रीहरि झपट कर उनका भुज मूल पकड़ ही लेते हैं। नागर श्रीलालजी बलात्
उनका नीबी बन्धन खोलते और नीलाम्बर खींचते हैं, तब कपट हठ (मिथ्या
नहीं) का प्रकाश करती हुई कुपित होकर "नहीं, ऐसा नहीं, ऐसे मधुमय वचन
कहती हैं।"
(तदुपरान्त दोनों मिलकर) "एक दूसरे का आलिङ्गन करते और (दोनों
ही) अपनी सरस सुरत रस केलि (निज केलि) द्वारा विपरीत रति का वितरण
११६ • • हित चौरासी
करते हैं, (रसिक जन सखियों के लिये।) सखि ! (उस समय की छबि ऐसी
दीखती है,) मानो इन्द्रनील मणिमय विटप से स्वर्ण की लता लिपट रही है।
रति युद्ध के श्रम से दोनों के ललाट पटल पर श्रम जल (प्रस्वेद) सीकर
शोभित हैं और जिनके मनों में अभङ्ग अनुराग है ऐसी ललितादिक सहचरियाँ
अपने अञ्चलों से पवन झकझोलती-वायु डुलाती हैं।"
श्रीहित हरिवंश चन्द्र इस श्रीकृष्ण रसामृत सार रति विहार का यथा मति
वर्णन करते हैं जो श्रवणों में पड़ते ही श्रीराधा के सुकुमार पदाम्बुजों का प्रेम
प्राप्त करा देने वाला हैं।
टिप्पणी-
(१) 'भाजन कनक विविध मधु पूरित धरे धरनि पर हेज,' चूँकि शास्त्र
मर्यादा के अनुसार आसवों का पान करना हेय है और फिर भगवान् के लिये तो
और भी विशेष; क्योंकि वे जैसा आदर्श उपस्थित करते हैं, उसी के अनुसार
अन्य जन भी आचरण करते हैं किन्तु इस रस विहार-रसोपासना में न तो
शास्त्रों का बन्धन है और न लोक वेद की मर्यादा ही। यह नित्य विहार सर्व
तन्त्र स्वतन्त्र है। इस पर धर्म कर्म, लोक, वेद, शास्त्र आदि किसी का भी
अनुशासन नहीं; क्योंकि-
धर्म व्यतिक्रमों दृष्ट ईश्वराणां च साहसम्।
श्रीमद्भागवत १०/३३/३०
अर्थात् 'धर्म के उल्लङ्घन कर देने का साहस ईश्वर में देखा जाता है।'
उक्त प्रसङ्ग में यह बात ध्यान देने योग्य है कि भगवान् श्रीकृष्ण पूर्ण
पुरुषोत्तम और परात्पर ब्रह्म भी हैं। यदि उनके निखिल निगमागम अलक्षित
रसमय नित्य विहार में उज्ज्वल रस की रीत्यानुसार आसवों (मादक द्रव्यों) का
उपयोग है तो वह किसी प्रकार भी हेय नहीं और न कहा ही जा सकता है। यह
तो लोक वेदातीत, मर्यादा से परे भावुक रसिक जनों के लिये है जो इसके
अधिकारी हैं। उनका परिचय निम्न श्लोक से प्राप्त होता है-
न जानीते लोकं न च निगम जातं कुल परं-
परां वा नो जानत्यहह न सतां चापि चरितम्।
हित चौरासी • • ११७
रसं राधायामाभजति किल भावं व्रज मणौ,
रहस्यं तद्यस्य स्थिति रपि न साधारण गतिम्।।
- श्रीराधा सुधा निधि।
अर्थात् जो महानुभाव इस एकान्त रस देश में व्रज मणि श्रीराधा के भाव
एवं रस का निश्चय रूप से भजन करते हैं, अहो ! वे न तो लोक को जानते
और न निगम समूह को और न कुल परम्परा को ही जानने की इच्छा रखते हैं।
उन्हें साधु आचरणों की भी स्पृहा नहीं है, तभी तो उनकी गति-स्थिति साधारण
नहीं वरं असाधारण है।
इन अधिकारी गणों के लिये इस रसविहार का सहज सिद्धान्त है-
यत्राधर्म एव धर्मः स्थापितः।
श्रीरसिकोतंस जी
अर्थात् 'जहाँ (प्रेम राज्य में) अधर्म ही धर्म के रूप में स्थापित है।'
इसीलिये श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु पाद पुनः अन्यत्र कहीं कहते हैं-
अवनी उदर नाभि सरसी में मनहुँ कछुक मादिक मद घोरी।
(जै श्री) हित हरिवंश पिवत सुन्दरवर सीवँ सुदृढ़ निगमनि की तोरी।।
निगमों की सुदृढ मर्यादा को भी तोड़कर सुन्दर वर श्रीलालजी श्रीप्रियाजी
के उस नाभि कुण्ड का सरस मादक मधु पी रहे हैं।
ऐसे ही कुछ श्रीदामोदर (सेवक जी) भी कह रहे हैं-
नवल नवल सुख चैन ऐन आपुने आप बस।
निगम लोक मर्जाद भंजि क्रीडन्त रंग रस।।
सुरत प्रसंग निसंक करत जोइ जोइ भावत मन।
ललित अंग चलि भंगि भाव लज्जित सुकोक गन।।
अद्भुत विहार हरिवंश हित, निरखि दासि सेवक जियत।
विस्तरत सुनत गावत रसिक सु नित नित लीला रस पियत।।
अतएव इस रस राज्य में जो भी कुछ अमर्यादित चेष्टाएँ हैं वे सभी
उचित हैं और शास्त्र मर्यादातीत हैं। इसी दृष्टि से निकुञ्ज भवन में मादक
आसवों के सँजोने का वर्णन भी किया गया है, जो शृङ्गार-उज्ज्वल रस की
दृष्टि से आवश्यक उद्दीपन एवं रस विवर्द्धक है।
११८ • • हित चौरासी
(२) ललितादिक-
निकुञ्जेश्वरी श्रीराधा की अनन्त दासियाँ और सहेलियाँ हैं। वे सब अपने
अपने भावानुसार अनुराग पूर्वक युगल किशोर की सेवायें करती रहती हैं। इन
सब सखियों की कुछ यूथेश्वरियाँ हैं, इन यूथेश्वरियों की प्रधान ये आठ
ललितादिक सखियाँ हैं। ये आठों युगल सरकार की अति आत्मीय हैं। इनके
नाम क्रमशः ललिता, विशाखा, रङ्ग देवी, चम्पक लता, चित्र लेखा, इन्दु
लेखा, तुङ्ग विद्या और सुदेवी हैं। इन आठों में पारस्परिक कोई तारतम्य भेद
नहीं है। ये छाया की भाँति युगल की नित्य सङ्गिनी हैं। ये आठों हित-प्रेम की
मूर्त्ति हैं अतः निरन्तर आनन्द की ही वृद्धि करती रहती हैं। इनके मन, प्राण,
आत्मा और इन्द्रियाँ सभी प्रेम से ओत प्रोत हैं।
ये सभी उज्ज्वल, रोचक और श्रेष्ठ वस्त्राभूषण धारण करतीं हैं जो
उनकी अपनी रुचि के किन्तु भिन्न भिन्न हैं। सबका सौन्दर्य अवर्णनीय है-अतुल
है। इनमें से प्रत्येक की सेवा, वेश भूषा, और दक्षता, रूप वर्ण और रुचि क्रमशः
इस प्रकार है-
(१) ललिताजी- प्रेम की समस्त युक्तियाँ (घातें) जानतीं अतः रस
विलास प्रक्रिया की पण्डिता हैं। ये रुचिर ताम्बूल बीड़ियों की रचना करके
युगल सरकार को खिलाया करती हैं। अपने मुख से वही बात कहती हैं जो
दोनों में रुचि और प्रेम की वृद्धि करने वाली हो।
इनकी शरीर आभा गोरोचन जैसी है और मयूर पिच्छ के भाँति की सारी
धारण करती हैं।
(२) विशाखाजी- श्रीललिताजी की ही तरह विशाखा जी भी युगल का
अत्यन्त प्यारी हैं। ये भी सदा ही युगल के साथ रहती और उनकी रुचि के
अनुसार उन्हें नवीन, उज्ज्वल, सुकोमल और मनोहर वस्त्रधारण कराती रहती
हैं। सदा श्रीप्रियाजी की रुचि की बातें करती रहती हैं।
इनकी तनद्युति शत शत दामिनियों की तरह है एवं तारा मण्डल जैसे
इनके वस्त्र हैं।
हित चौरासी • • ११६
(३) रङ्गदेवी जी- सर्वदा अपना नाम सार्थक करती हुई आनन्द रङ्ग
की ही वृद्धि करती रहती हैं। युगल सरकार को भूषण धारण कराना और
उनकी सुव्यवस्था पूर्वक रचनायें करना इन्हीं का कार्य है। इनमें चित्र लेखन
की भी बड़ी शक्ति है।
इनकी शरीर कान्ति कमल किअल्क जैसी है और ये सारी पहिनती हैं
जपा कुसुम के रङ्ग की।
(४) चम्पकलताजी- पाक कला में अत्यन्त निपुण हैं। अनेकों प्रकार
के नवीन नवीन और सुस्वादु व्यञ्जन बना बनाकर सदैव युगल को सन्तुष्ट
करती रहती हैं।
ये यथानाम गौराङ्गी हैं और इन्हें श्रीप्रियाजी ने प्रसन्न होकर अपना दिव्य
नीलाम्बर दे रखा है वही इनके श्रीवपु की शोभा वृद्धि करता रहता है।
(५) चित्रलेखाजी- युगल सरकार की बड़ी प्यारी हैं। ये उन्हें सुगन्धित
जल अर्पण करतीं और विविध प्रकार के आसव तैयार करती हैं, साथ ही चित्र
लेखन एवं शृङ्गार रचना की कला में भी ये अत्यन्त निपुण हैं।
इनका वर्ण केशर का सा है और ये स्वर्ण प्रभा जैसे वस्त्र धारण करती
हैं।
(६) इन्दुलेखाजी-कोक कला की समस्त क्रियाओं में परम विदग्ध हैं।
काम कहानियों की तत्काल ही सरस रचनायें करना तो केवल यही जानती हैं।
इसके सिवाय प्रेम मंत्र, वशीकरण, सम्मोहन आदि यन्त्र तन्त्र सभी कुछ
जानती हैं। मानादि के अवसर में युगल पर अपने यन्त्र तन्त्रों का प्रयोग भी
करती हैं। इन्दुलेखाजी श्रीलालजी को अपने सारे गुण सिखाती रहती हैं
इसलिये भी श्रीप्रियाजी को प्यारी हैं।
हरताल की तरह इनकी देह प्रभा है और ये दाड़िम पुष्प के रङ्ग के वस्त्र
धारण करती हैं। ये युगल के कोष की भी अधिकारिणि हैं।
(७) तुङ्गविद्याजी- यथानाम तथा गुण हैं। ये-गान, नृत्य कोक हास
शिल्प चित्र रचना, वाद्य आदि सभी विद्याओं में निपुण हैं। गुणों की तो मानो
अवधि हैं।
१२० • • हित चौरासी
मन हरण गौर इनका वर्ण हैं और तदनुरूप पाण्डु वर्ण के ये वस्त्र धारण
करती हैं।
(८) सुदेवीजी- बड़ी सलोनी हैं। प्रत्येक बात में पूर्ण हैं किसी बात में
न्यून नहीं। युगल सरकार का नख शिख श्रृङ्गार करना ही इनकी सेवा है। ये
कबरी बन्धन करना और अञ्जन रेख बनाना अच्छा जानती हैं, अतः श्रीप्रियाजी
की परम कृपा पात्र हैं।
ये अद्भुत रमणीय वर्ण की हैं और सूहे रङ्ग की सारी पहिनती हैं।
उक्त आठ निज सखियों में से प्रधान हैं श्रीललिताजी। जो रति विहार के
मर्म अवसरों पर भी युगल की सेवा की अधिकारिणि हैं किन्तु कभी कभी उन्हें
भी एकान्त रस विहारावसर में लता भवन के रन्ध्रों से ही इस विहार का दर्शन
सुख ले सकती हैं, समीप नहीं रह सकतीं। उस समय केवल एक सखी अव्यक्त
रूप से युगल सरकार के समीप रहती है जिसका सङ्केत परिचय रुद्रयामल
तन्त्र में इस प्रकार है-
सुतल्पे शाययित्वाथ सम्वाह्य च पदाम्बुजम्।
रहस्य समयं ज्ञात्वा वयस्या वाहिरागतः॥
एका सखी तु श्रीराधा कृपातिभर पूरिता।
तदानीमपि सेवार्थं तल्पोपान्ते विराजते॥
अर्थात् “युगल सरकार को सुन्दर शय्या में शयन कराके एवं उनके
चरण कमलों का सम्वाहन करके रहस्य समय जानकर सखियाँ बाहर हो गयीं
किन्तु वहाँ श्रीराधा की अति कृपा प्रवाह पूरिता एक सखी उस समय भी सेवा
के लिये श्रीराधा की शय्या के समीप रही।”
रुद्र यामल में वर्णित यह 'एका सखी' कौन है ? इसका परिचय श्रीनाभाजी
महाराज अपने भक्त माल में देते हैं-
श्रीराधा चरन प्रधान हृदय अति सुदृढ़ उपासी।
कुञ्ज केलि दम्पती तहाँ की करत खवासी॥
सर्वसु महाप्रसाद प्रसिद्ध ताके अधिकारी।
विधि निषेध नहिं दासि अनन्य उत्कट व्रत धारी॥
हित चौरासी • • १२१
श्रीव्यास सुवन पथ अनुसरै सोई भलैं पहिचानि है।
श्रीहरिवंश गुसाईं भजन की रीति सकृत कोऊ जानि है।।
भाव यह कि दम्पति के कुञ्ज केलि की खवासी निरन्तर करने वाली वह
'एका सखी' श्रीहित हरिवंश चन्द्र ही हैं।
इसी प्रकार चाचा श्रीहित वृन्दावन दास जी भी कह रहे हैं-
बन्दौं प्रेम खिलाड़ी दंपति उर जो है।
कौतुक रचै जु भारी दोऊनि मन मोहै।।
कौतुक रचे जु भारी वारी अति रस रूप छकावै।
सदा सदेह रहै वृंदावन पिय प्यारी दुलरावै।।
याके खेल रसिक जन परखैं थिर चर सब मन भावै।
वृन्दावन हित रूप सहेलिनु चित जु चोज उपजावै।।
इस छन्द में 'दंपति उर जो है' सदा सदेह रहै वृंदावन और पिय प्यारी
दुलरावै, विशेष ध्यान देने योग्य हैं।
और इस प्रेम के मूल परिचय का प्रवचन श्री ध्रुवदास जी से सुनिये-
प्रकट प्रेम कौ रूप धरि श्रीहरिवंश उदार।
राधावल्लभ लाल कौ प्रकट कियौ रस सार।।
बस इन्हीं हित हरिवंश चन्द्र-प्रकट हित (प्रेम) की प्रति मूर्त्ति हैं ये आठों
सखियाँ।
यथा- मानौं आठौं मूरति हित की,
-श्रीहित ध्रुवदासजी
(३) कृष्ण रसामृत सार- यों तो साहित्य के नव रसों में, वीभत्स, रौद्र
और भयानक भी रस हैं इसी प्रकार भोजन के छः रसों में कटु अल्म और तिक्त
भी, किन्तु साहित्य में श्रृङ्गार और भोजन में मधुर का जो स्थान है उसे सभी
लोग बिना विवाद किये ही मान रहे हैं-उन्हें मधुर और श्रृङ्गार को अत्युच्च या
सर्वश्रेष्ठ स्वीकार करने में कोई आपत्ति ही नहीं।
अस्तु; इतिहास, पुराण एवं शास्त्रों के मत से सिद्ध तो है ही और संत
महात्माओं ने अपने अनुभव की छाप लगाकर और भी सिद्ध कर दिया है कि
१२२ • • हित चौरासी
भगवान् श्रीकृष्ण मूर्त्तिमान् शृङ्गार हैं। अनेक भाव प्रवण रसिक महानुभावों ने तो
श्रीकृष्ण एवं उनके रस-शृङ्गार रस को साहित्यिक शृङ्गार रस से सर्वथा श्रेष्ठ
उज्ज्वल रस कहा है, और है भी यही बात यथार्थ भी। क्योंकि जिस प्रकार
भगवान् श्रीकृष्ण त्रिगुणातीत, पूर्ण आत्माराम, सच्चिदानन्द घन, स्वयं ज्ञान
और अव्यक्त विभु हैं, उसी प्रकार वे श्रुति अतर्क्य, अवाच्य, अप्रकाश्य और
केवल अनुभव गम्य है। इनके लिये भगवती जहाँ पर उक्त विशेषणों से पूर्ण
शब्द देती हैं वहीं पर वह उन्हें "रसो वै सः," अर्थात् वह रस रूप भी है। ऐसा
भी कहती है।
अतएव अब यहाँ यह जानना आवश्यक हो जाता है कि वह उस "रस
रूप ब्रह्म" का स्वरूप है क्या ? इस विषय का यहाँ पर संक्षेपतः निवेदन किया
जाता है।
ब्रह्मानुभूति की भाँति यह रसानुभूति केवल स्वानुभूति है-आत्मानुभूति है
जो अवाङ्मनशगोचर और आलौकिक दिव्यानन्द है वही रस है। जहाँ प्राण,
मन, आत्मा सभी किसी सात्विक एवं दिव्य प्रवाह में डूब कर परम स्निग्धता
का अनुभव करने लगते हैं, वही रस की स्थिति है- वही प्रेम है। समस्त चराचर
इसी रस के आस्वादन में आकुल है। फिर चाहे वह उसे अपने मन और
इन्द्रियों का विषय बनाकर भोग रहा हो अथवा आत्मा का। अपने अपने स्तर
में सभी उस रस रूप ब्रह्म का ही आस्वादन कर रहे हैं। किं बहुना ? चराचर
जगत् ही रस रूप है, उस रस से अतिरिक्त कुछ अन्य है ही नहीं। भगवती श्रुति
कहती है-
"नेहनानाऽस्ति किञ्चन।"
और इस चराचर व्यापी रस की प्रकट मूर्त्ति हैं श्रीराधा और श्रीकृष्ण।
यही दोनों रस के दिव्य 'आलम्बन' हैं। इन्हीं से रस की स्थिति है और रस का
विकास भी। श्रीवृन्दावन और सहचरि (युगल किशोर की नित्य सङ्गिनी सहेलियाँ
ललिता विशाखा आदि) समाज इस उज्ज्वल रस के 'उद्दीपन' हैं। श्रीराधा और
श्रीकृष्ण का पारस्परिक प्रेम ही रति है- 'स्थायी भाव' है। दोनों के बीच जिन
जिन कारणों से स्थायी अनन्त रति का प्रकाश होता रहता है, वही 'विभाव' हैं।
इसी प्रकार प्रेम पूर्ण कटाक्ष, भ्रू विक्षेप, हास, दर्शन, सङ्केत आदि इस रस के
हित चौरासी • • १२३
'अनुभाव' हैं। रति की पुष्टि ही स्मृति, चिन्ता, उत्कण्ठा आदि भावों से पुष्ट
होकर 'स्थायी भाव' का नाम ग्रहण करती है, यथा-
विभावैरनुभावश्च सात्त्विकैर्व्यभिचारिभिः।
आनीयमानः स्वाद्यत्वं स्थायीभावों रसः स्मृतः॥
स्थायी भाव की रति ही शृङ्गार रस है यह शृङ्गार रस दो प्रकार का है-
(१) सम्भोग या संयोग शृङ्गार
(२) विप्रलम्भ या वियोग शृङ्गार
सम्भोग शृङ्गार की तीन स्थितिया हैं जो क्रमानुगत हैं-
क: पूर्वानुराग- जहाँ नायिका के हृदय में पहले पहल किन्हीं कारणों से
नायक के प्रति अनुराग की उत्पत्ति हो वह पूर्वानुराग है। यह पूर्वानुराग मुख्यतः
चार कारणों को लेकर ही उदित होता है, वे ये हैं-गुण श्रवन चित्र दर्शन, स्वप्न
दर्शन और प्रत्यक्ष दर्शन। यथा-
पहिलें ही गुन में श्रवन मिले जाइ फिर
रूप सुधा मधि कीनों नैनहू पयान हैं।
हँसनि, नटनि, उजराई, सुघराई सुधा
सुथराई मिश्री मिली कीन्हीं पय पान है॥
मोहि मोहि मोहनमयी री मेरौ मन भयौ,
हरीचंद भेद न परत अब जान है।
कान्ह भये प्रानमय, प्रान भये कान्हमय,
हिय में न जानि परै कान्ह है कि प्रान है॥
खः मिलन- पूर्वानुराग के पश्चात मिलन होता है। यह मिलन ही रस का
जीवन है। यह भी दो प्रकार का है, एक नित्य मिलन, दूसरा अनित्य मिलन।
युगल किशोर निकुअ बिहारी का मिलन पूर्वानुराग और प्रवास से सुदूर एक
रस, नित्य अनादि और अनन्त है अतः इसका रस विलास भी अनन्त है
जिसका वर्णन इस सम्पूर्ण ग्रन्थ में है भी और हम इसी प्रसङ्ग में आगे विशेष
रूप से करेंगे। दूसरा अनित्य मिलन है जो श्रीहित ध्रुवदास जी के शब्दों में प्रेम
ही नहीं है-रस ही नहीं। वे कहते हैं-
१२४ • • हित चौरासी
जब बिछुरत तब होत दुख, मिलतहिं हियौ सिराइ।
याही में रस द्वै भये 'प्रेम' कह्यौ क्यौं जाइ।।
–प्रीति चौवनी
ग. प्रवास– प्रियतम का प्रेमी से दूर हो जाना या अन्यत्र चले जाना ही
प्रवास है। यह दो प्रकार का है, भूत प्रवास और भावी प्रवास। प्रवास से विरह
की उत्पत्ति है। विरह के दश लक्षण हैं–अभिलाषा, चिन्ता, स्मरण, गुण गान,
उद्वेग, प्रलाप, उन्माद, व्याधि, जड़ता और मरण।
कुछ विद्वान् गण ग्यारहवा लक्षण मूर्च्छा भी मानते हैं।
इसी प्रसङ्ग में शृङ्गार रस के आलम्बन–नायक एवं नायिका की जाति
गुण एवं अवस्थाओं का वर्णन अनावश्यक न होगा।
जाति के अनुसार पद्मिनी एवं चित्रिणी श्रेष्ठ जाति की नायिकाएँ हैं और
स्वभाव के अनुसार नायिका दश प्रकार की हैं; यथा–प्रोषित, पतिका, खण्डिता,
कलहंतारिता, विप्रलब्धा, उत्कण्ठिता, वासकसज्जा, स्वाधीन पतिका
अभिसारिका, प्रवत्स्य पतिका और आगत पतिका।
श्रीजयदेव कविराज ने अपने 'गीत गोविन्द' काव्य में इन दशों लक्षणों
को प्रायः श्रीप्रियाजी पर ही घटित किया है, क्योंकि वे भिन्न भिन्न स्थितियों में
अलग अलग स्वभावों से अभिभूत होती हैं, तब वही उनका विशेषण होता है।
अस्तु; इसके सिवाय उत्तमा, मध्यमा, अधमा, अन्य सुरत दुःखिता,
मानवती, वक्रोक्ति गर्विता, प्रेम गर्विता, रूप गर्विता, गुण गर्विता आदि भेद
नायिका के गुणों के अनुसार हैं।
वय (उम्र) के अनुसार भी नायिका तीन प्रकार की हैं–मुग्धा, मध्या और
प्रौढ़ा। भावों के अनुसार भी नायिका तीन प्रकार की है–स्वकीया, परकीया और
गणिका। इनमें गणिका हेय–घृणास्पद है, अतः यहाँ उसका कोई प्रसङ्ग नहीं है।
अस्तु; धर्मानुसार नायक भी अनेकों प्रकार के हैं, उनमें उत्तम नायक
वही है जो धीर, ललित, प्रोषित पति, उप पति, अनुकूल, दक्षिण, वचन चतुर
एवं क्रिया चतुर हो।
हित चौरासी • • १२५
श्रीवृन्दावन के दिव्य रस विहार में स्वामिनि श्रीराधिका सर्वतोगुणोधिका
नायिका हैं। उनमें सर्वोत्तमा नायिका के सभी लक्षण हैं। इसी प्रकार ललित
नायक श्रीकृष्ण भी सर्व गुण सम्पन्न नायक हैं। रस विलास के लिये श्रीराधिका
स्वकीया भी हैं और परकीया भी तथा स्वकीया परकीया से विलक्षण अनिर्वचनीया
रसवती प्रेम पुत्तली। इसी तरह श्रीलालजी भी पति उप पति सभी कुछ हैं।
आचार्य्य श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु द्वारा प्रकाशित मिलन-शृङ्गार में
नित्य मिलन अखण्ड मिलन का ही अनवरत सुख है। वहाँ विरह मान आदि तो
होंगे कहाँ से? उनका भ्रम भी नहीं है। फिर भी वहाँ विरह है पर रूप दर्शन की
अतृप्ति रूप से, प्रेम की नवीन नवीन उत्कण्ठा के रूप में वह वहाँ बस रहा है।
इसी प्रकार मान भी है पर प्रेम वैचित्य के रूप में। स्थूल मान की भाँति नहीं।
यहाँ तक कि-
देखत देखत कल नहिं माई।
चाहत रूप में रूप समाई।।
-हित ध्रुवदासजी
श्रीवृन्दावन एक प्रेम मय देश है। वहाँ केवल प्रेम का ही राज्य है। युगल
किशोर इस प्रेम राज्य के नरेश हैं। दुलहिनि राधा रानी हैं और दूलह हैं नवल
किशोर श्याम। प्रजा हैं सखीगण, मृग, पक्षी और श्रीवृन्दावन का समस्त
परिकर। युगल नरेश निरन्तर ललित यौवन के सिंहासन पर आसीन रहते हैं।
उन पर रूप का छत्र भी तना ही रहता है। निकुञ्ज महल ही उनका राज्य
प्रासाद है। और सखियाँ हैं सामन्त एवं सभासद गण। ये युगल नरेश सदा
निर्भीक भाव से अपने अन्तरङ्ग महल में स्वच्छन्द विहार ही करते रहते हैं। इनके
हृदय में मदन (प्रेम) की एक फुलवारी लगी है जो मानों इनके अङ्ग-अङ्ग में
फूली हुई है। इस मदन बाग में मालिनिएँ हैं छहों ऋतुएँ जो सर्वदा सुख के फलों
का उत्पादन करती रहती हैं।
कभी कभी ये युगल नरेश मदन केलि की सतरञ्ज भी खेलते हैं।
प्रतिक्षण रूव अवलोकन, हाव भाव एवं चितवन की ही चालें उस खेल में चली
जाती हैं। दोनों के मन ही सतरञ्ज के वजीर (मन्त्री) हैं, जो रूख देख कर
अपनी चाल चलते हैं। उरोज गयन्द और आँखें तुरंग हैं। पैदलों और (पयादों)
१२६ • • हित चौरासी
का काम करती हैं दोनों की नरम नरम अँगुलियाँ। जब श्रीप्रियाजी के कपोल
तिल अलक छवि एवं मुसकान के बीच में श्रीलाल नृपति का मन मन्त्री फँस
जाता है औरश्रीप्रियाजी अपने नयन तुरंगों को अटपटी चाल पर ला देती हैं,
तभी लाल नृपति को मानों शैः (किश्त) दी जाती है। यह ऐसी शैः है जो खाली
जाती ही नहीं जिससे नृपति की गति रुक जाती है और वे मात खा जाते हैं
किंतु श्रीप्रियाजी जब खेल की परिसमाप्ति नहीं करना चाहतीं तब पुनः मात
खाये हुए नृपति अधरामृत रस रूप अवसर देकर अपनी चाल वापस कर लेती
हैं और राजा की विसातों को सम्हाल देती हैं। पश्चात् आलिङ्गन चुम्बन पूर्वक
पुनः खेल प्रारम्भ हो जाता है और निरन्तर चलता ही रहता है इसी हार जीत
के साथ।
इस प्रकार इस नित्य मिलन का रस विलास अक्षुण्ण है। इसमें मिलन के
साथ विरह और अतृप्ति ओत प्रोत है किन्तु किस रूप में उसे भी देखें-
फूल सौं फूलनि सेज बनाई।
अति सुगन्ध सौंधे छिरकाई।।
नैंकु चितै तिरछे मुसकानी।
लालहिं सुधि बुधि सबै भुलानी।।
बसी जु प्यारे लाल उर, वह चितवनि मुसकानि।
तबते कबहुँ छुटीनहिं, चुभी जु उर में आनि।।
तिनकौं प्रेम और ही भाँति।
अदभुत रीति कही नहिं जाति।।
दिन संजोग में रहत हैं माई।
सूक्ष्म प्रेम विरह दुखदाई।।
देखत ही अनदेखी मानैं।
तिनकी प्रीतहि कहा बखानैं।।
प्रेम लालची लाल रँगीलौ।
अवधि प्यार की रसिक रसीलौ।।
कर अँगुरिनु भुज मूलनि परसै।
अधर पान रस कौं जिय तरसै।।
हित चौरासी • • १२७
छुवै न सकत उरजनि कर काँपैं।
चतुर कुँवरि अंचल सों ढाँपै।।
सो वह छटा प्रेम की न्यारी।
लालहिं विवस करति अति भारी।।
तबहिं सँभारि लेति सुकुमारी।
अधर कपोलनि चूँवत प्यारी।।
जब देखी अँखियानि उघारी।
प्याइ जिवाये अधर सुधा री।।
जबहीं उर सों घुरि लपटाहीं।
तब नैना विरही ह्वै जाहीं।।
छुटैं जबहिं छबि देख्यौ करैं।
विरह आनि अंगनि संचरैं।।
भाँति अटपटी सों चित हरयौ।
जात नहीं उर धीरज धरयौ।।
छिन छिन दसा और की औरै।
थाँभै रहतिं सखी सिरमौरै।।
प्रेम अटपटी चटपटी, रही लाल उर पूरि।
और जतन ताकौ न कछु प्रिया सजीवन मूरि।।
विरह सँजोग दिनहिं दिन माँही।
जद्यपि ग्रीवनि मेलैं बाँहीं।।
इहि विधि खेलत कलप विहाने।
परम रसिक कबहूँ न अघाने।।
–श्रीहित ध्रुवदास जी
यह हुआ इस नित्य मिलन का विलक्षण नित्य विरह। अब देखिये इस
नित्य विहार मिलन में साहित्य के नवों रस किस प्रकार इस एक मिलन में
समाकर एक हो गये हैं। रसिक श्रीहित ध्रुवदासजी महाराज कहते हैं–
१ प्रथमहिं चतवनि लाज की, शृङ्गार रस
२ दुतिय मधुर मृदु बैन। करुणा रस
१२८ • • हित चौरासी
३ तृतिय परस अंगनि सरस,
उरजनि छबि सुख दैन ।। वीर रस
४ परिरंभन चुंबन चतुर, रौद्र रस
५ पंचम भाइ तरंग। हास्य रस
६ षट रस विंजन स्वाद जिमि,
उठत अनंग तरंग ।। भयानक रस
७ विविध भाँति रति केलि कल,
सप्त समुद्र अपार। वीभत्स रस
८ वचन रचन अष्टम, अद्भुत रस
९ नवम रस निधि रंग विहार ।। शान्त रस
कुछ ऐसे ही श्रीभगवत रसिक जी ने भी नव रसों को एक ही शृङ्गार
विहार में समावेशित कर दिखाया है। वे कहते हैं-
पायँन परि विनती करें, सो रस मुख्य सिंगार१।
मान छाँड़ि मृदु वचन कहि, करुणा२ रस निरधार।।
सैना बैनी हास रस३, हथ्या बाँही वीर४।
कंप भयानक५ जानिये, रौद्र६ छुड़ावै धीर।।
रद छद में वीभत्स७ रस, अद्भुत८ प्रेम कौं देत।
बूड़ि रहे सुख सिंधु में परम सांति रस९ हेत।।
'अनन्य निश्चयात्म' से
इस प्रकार रस की मूर्त्ति श्रीलाड़िली लालजी रस में ओत प्रोत हुए अपनी
समस्त क्रियाएँ रस वृद्धि पूर्वक रस सेवन के ही लिये करते रहते हैं। वे रस भरे
नयनों से रस भरी चितवनों का विक्षेप करते और फिर रस के अनन्त
आनन्दाम्बुधि में ही डूब जाते हैं तब उनके अन्तर्वहिः सिवाय रस-प्रेम के और
कुछ रह ही नहीं जाता। श्रीहित ध्रुवदास जी कितनी सुन्दर शैली से इसका
वर्णन करते हैं-
प्यार ही की कुंज तामें प्यार की लै सेज रची,
प्यार ही सौं प्यारो लाल प्यारी बातें करहीं।
हित चौरासी • • १२६
प्यार ही की चितवनि, मुसकनि प्यार ही की,
प्यार ही सौं प्यारीजू कौं प्यारो अंक भरहीं।।
प्यार सौं लटकि रहैं प्यार ही सौँ-मुख चहैं,
प्यार ही सौं प्यारो प्रिया अंक भुज धरहीं।
'हित ध्रुव' प्यार भरी प्यारी सखी देखें खरी
प्यारै प्यार रह्यौं छाइ प्यार रस ढरहीं।।
'आनन्द दसा विनोद' से
और इस रस की पराकाष्ठा है तल्प विहार। जिसका वर्णन श्रीहिताचार्य्य
चरण ने यत्र तत्र सर्वत्र 'हित-चौरासी' में किया है। रसज्ञ पाठकगण उन
प्रसङ्गों को देखें। हम अपनी असमर्थता चाचा श्रीहित वृन्दावन दास जी के
शब्दों में प्रकट करते हैं-
कुंज महल कौतिक जु अलौकिक दृग अनुरागी जानें।
रसना लोचन हीन वापुरी कैसे छवि जु बखानै।।
भाव हीन भावुक के हिय कौ मरम कहा पहिचानै।
वृन्दावन हित रूप देसरा मती रसिक उर आनै।।
- ३१ -
अवतरण - कलिन्द नन्दिनी के सुरम्य तट वर्त्ती मञ्जुल निकुञ्ज भवन
में श्रीयुगल किशोर ने आज की सम्पूर्ण रात दिव्य अनिर्वचनीय सुरत रस
विहार में व्यतीत की है। अब प्रातः काल हो आया है। दोनों उठे से बैठे हैं परस्पर
एक दूसरे के स्कन्धों पर अपनी सुकोमल भुज लताएँ अलस भाव से डाले
हुए। श्रीअङ्गों के समस्त वस्त्राभूषण अस्त व्यस्त हैं सम्पूर्ण शृङ्गार विगलित है।
दोनों तल्लीन हैं, एक दूसरे की मुख माधुरी का पान करने में। ऐसे कि जैसे दो
चन्द्रमाओं पर चार चकोर। अतृप्ति का ओर छोर नहीं।
इसी दशा में कभी-कभी युगल किशोर मधुर स्वरों में गान करने लगते
हैं और कभी भवनान्तर से निकल कर बाहर श्रीवन की ओर डगमगाते हुए
चल पड़ते हैं। इस प्रातः कालीन छवि छटा को देख कर सखियों को परम
आनन्द प्राप्त है। तथा स्वयं श्रीहित युगल के सुख से कितना सुख मिलता है
१३० • • हित चौरासी
इसका वर्णन वे स्वयं करती हैं। इस पद में प्रेम का अन्तिम सिद्धान्त 'तत्सुख
सुखित्वम्' अर्थात् 'प्रियतम के ही सुख में सुखी होना' का सजीव और जागृत
चित्रण है-
देव गंधार
मूल-आजु अति राजत दंपति भोर।
सुरत रंग के रस में भीनें नागरि नवल किसोर॥
अंसनि पर भुज दियें विलोकत इंदु वदन विवि ओर।
करत पान रस मत्त परसपर लोचन तृषित चकोर॥
छूटी लटनि लाल मन करष्यौ ये याके चित चोर।
परिरंभन चुंबन मिलि गावत सुर मंदर कल घोर॥
पग डगमगत चलत बन विहरत रुचिर कुंज घन खोर।
(जै श्री) हित हरिवंश लाल ललना मिलि हियौ सिरावत मोर॥३१॥
भावार्थ- आज प्रातः काल युगल किशोर दम्पति अत्यधिक शोभा पा
रहे हैं। नागरी श्रीप्रिया और नवल किशोर श्रीलाल जी दोनों ही सुरतानन्द के
रस में सराबोर हैं। दोनों परस्पर (एक दूसरे के) स्कन्धों पर अपनी अपनी
भुजा दिये (अर्पित किये) एक दूसरे की मुख माधुरी का ऐसे पान कर रहे हैं
जैसे प्यासे लोचन चकोर। श्रीप्रियाजी की विखरी हुई केश लटों ने श्रीलालजी
का मन अपनी ओर आकर्षित कर रखा है, तो वे भी उनके चित चोर बन गये
हैं। आलिङ्गन एवं चुम्बन पूर्वक कभी तो मन्द मन्द स्वर में कभी उच्च स्वर में
दोनों मिले मधुर गान करने लग जाते हैं।
पश्चात् डगमगाते हुए चरणों से कभी श्रीवन की कुओं, उपवनों और
सघन गलियों में विचरण करने लगते हैं। श्रीहित हरिवंश चन्द्र (महाप्रभु) कहते
हैं कि इस प्रकार श्रीलाल ललना (युगल किशोर) मिलकर मेरे हृदय को
शीतल कर रहे हैं-शान्ति और सुख प्रदान कर रहे हैं।
टिप्पणी- 'हियौ सिरावत मोर'
युगल किशोर के सुख विहार से श्रीहित सखी किंवा अन्यान्य सखियों
को सुख मिलता है, यही इस विहार की अपनी विशेषता है कि यहाँ भोजन एक