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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

पृष्ठ 122, कुल 275 में से

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पृष्ठ 122

हित चौरासी • • ११७
रसं राधायामाभजति किल भावं व्रज मणौ,
रहस्यं तद्यस्य स्थिति रपि न साधारण गतिम्।।

  • श्रीराधा सुधा निधि।
    अर्थात् जो महानुभाव इस एकान्त रस देश में व्रज मणि श्रीराधा के भाव
    एवं रस का निश्चय रूप से भजन करते हैं, अहो ! वे न तो लोक को जानते
    और न निगम समूह को और न कुल परम्परा को ही जानने की इच्छा रखते हैं।
    उन्हें साधु आचरणों की भी स्पृहा नहीं है, तभी तो उनकी गति-स्थिति साधारण
    नहीं वरं असाधारण है।
    इन अधिकारी गणों के लिये इस रसविहार का सहज सिद्धान्त है-
    यत्राधर्म एव धर्मः स्थापितः।
    श्रीरसिकोतंस जी
    अर्थात् 'जहाँ (प्रेम राज्य में) अधर्म ही धर्म के रूप में स्थापित है।'
    इसीलिये श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु पाद पुनः अन्यत्र कहीं कहते हैं-
    अवनी उदर नाभि सरसी में मनहुँ कछुक मादिक मद घोरी।
    (जै श्री) हित हरिवंश पिवत सुन्दरवर सीवँ सुदृढ़ निगमनि की तोरी।।
    निगमों की सुदृढ मर्यादा को भी तोड़कर सुन्दर वर श्रीलालजी श्रीप्रियाजी
    के उस नाभि कुण्ड का सरस मादक मधु पी रहे हैं।
    ऐसे ही कुछ श्रीदामोदर (सेवक जी) भी कह रहे हैं-
    नवल नवल सुख चैन ऐन आपुने आप बस।
    निगम लोक मर्जाद भंजि क्रीडन्त रंग रस।।
    सुरत प्रसंग निसंक करत जोइ जोइ भावत मन।
    ललित अंग चलि भंगि भाव लज्जित सुकोक गन।।
    अद्भुत विहार हरिवंश हित, निरखि दासि सेवक जियत।
    विस्तरत सुनत गावत रसिक सु नित नित लीला रस पियत।।
    अतएव इस रस राज्य में जो भी कुछ अमर्यादित चेष्टाएँ हैं वे सभी
    उचित हैं और शास्त्र मर्यादातीत हैं। इसी दृष्टि से निकुञ्ज भवन में मादक
    आसवों के सँजोने का वर्णन भी किया गया है, जो शृङ्गार-उज्ज्वल रस की
    दृष्टि से आवश्यक उद्दीपन एवं रस विवर्द्धक है।