हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
पृष्ठ 128, कुल 275 में से
संदर्भ में पढ़ेंहित चौरासी • • १२३
'अनुभाव' हैं। रति की पुष्टि ही स्मृति, चिन्ता, उत्कण्ठा आदि भावों से पुष्ट
होकर 'स्थायी भाव' का नाम ग्रहण करती है, यथा-
विभावैरनुभावश्च सात्त्विकैर्व्यभिचारिभिः।
आनीयमानः स्वाद्यत्वं स्थायीभावों रसः स्मृतः॥
स्थायी भाव की रति ही शृङ्गार रस है यह शृङ्गार रस दो प्रकार का है-
(१) सम्भोग या संयोग शृङ्गार
(२) विप्रलम्भ या वियोग शृङ्गार
सम्भोग शृङ्गार की तीन स्थितिया हैं जो क्रमानुगत हैं-
क: पूर्वानुराग- जहाँ नायिका के हृदय में पहले पहल किन्हीं कारणों से
नायक के प्रति अनुराग की उत्पत्ति हो वह पूर्वानुराग है। यह पूर्वानुराग मुख्यतः
चार कारणों को लेकर ही उदित होता है, वे ये हैं-गुण श्रवन चित्र दर्शन, स्वप्न
दर्शन और प्रत्यक्ष दर्शन। यथा-
पहिलें ही गुन में श्रवन मिले जाइ फिर
रूप सुधा मधि कीनों नैनहू पयान हैं।
हँसनि, नटनि, उजराई, सुघराई सुधा
सुथराई मिश्री मिली कीन्हीं पय पान है॥
मोहि मोहि मोहनमयी री मेरौ मन भयौ,
हरीचंद भेद न परत अब जान है।
कान्ह भये प्रानमय, प्रान भये कान्हमय,
हिय में न जानि परै कान्ह है कि प्रान है॥
खः मिलन- पूर्वानुराग के पश्चात मिलन होता है। यह मिलन ही रस का
जीवन है। यह भी दो प्रकार का है, एक नित्य मिलन, दूसरा अनित्य मिलन।
युगल किशोर निकुअ बिहारी का मिलन पूर्वानुराग और प्रवास से सुदूर एक
रस, नित्य अनादि और अनन्त है अतः इसका रस विलास भी अनन्त है
जिसका वर्णन इस सम्पूर्ण ग्रन्थ में है भी और हम इसी प्रसङ्ग में आगे विशेष
रूप से करेंगे। दूसरा अनित्य मिलन है जो श्रीहित ध्रुवदास जी के शब्दों में प्रेम
ही नहीं है-रस ही नहीं। वे कहते हैं-