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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

पृष्ठ 260, कुल 275 में से

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पृष्ठ 260

२५४ • • हित चौरासी
शृङ्गार रस के दो भेद हैं-
विप्रलम्भ (वियोग) शृङ्गार और सम्भोग (संयोग) शृङ्गार। श्रीहिताचार्य्य
चरण की उपासना का मूल सिद्धान्त है मिलन या सम्भोग शृङ्गार। इस रस
सम्भोग की पुष्टि के लिये अनेकों उद्दीपन स्वीकार किये गये हैं; यों तो यहाँ
सभी परिकर दिव्य रस का ही विकसित रूप है। इस सिद्धान्त के अनुसार यहाँ
जो मान, विरह आदि देखे जाते हैं वे भी विलास के लिये स्वीकार किये गये हैं,
वस्तुतः वे हैं नहीं, उनका तो भ्रम भी नहीं है। युगल किशोर नित्य निरन्तर मिले
सम्भोग लीलाओं में मग्न रहते हैं।
इस मिलन में अन्तर के लिये कोई स्थान ही नहीं है-
"तिन बिच अन्तर पलकौ नाँही।"
यह नित्य मिलन किञ्चिन्मात्र भी विरह या अन्तर नहीं सह सकता वरं पूर्ण
लालच के साथ वह एक दूसरे को आत्म सात कर देना चाहता है परस्पर में-
"चाहत प्रान में प्रान समाई।"
प्रेमी और प्रेमास्पद का आत्म सात हो जाना, द्वैत की सृष्टि का लय कर
देना ही रस की, मिलन की या सम्भोग शृङ्गार की पराकाष्ठा है-
रस की अवधि इहाँ लौं माई।
विवि तन मन एकै हो जाई॥
-हित ध्रुवदासजी
इस महामधुर मिलन की परिभाषा करनी कठिन है। उसकी ओर केवल
सङ्केत किया जा सकता है । कितना विलक्षण है यह मिलन रस ?
मधुर ते मधुर अनूप ते अनूप अति,
रसनि कौ रस सब सुखनि कौ सार री।
विलास कौ विलास निज प्रेम की है राज दसा,
राजै एक छत दिन विमल विहार री।।
छिन छिन त्रिषित चकित रूप माधुरी में,
भूले से ही रहें कछु आवै न विचार री।