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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

पृष्ठ 259, कुल 275 में से

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पृष्ठ 259

हित चौरासी • • २५३
चलों, बहुत हो चुका मान। मान छोड़ो और मान लो मेरी बात। शीघ्र
चलकर मधुरिपु की समस्त बाधाओं को दूर कर दो और प्राप्त कर लो अपना
स्वत्व-उन पर एकाधिकार।"
दूतिका की बात सुनकर श्रीराधा चल पड़ीं और अपने प्राण प्रियतम से
जा मिलीं। पश्चात् वहाँ मिलन काल में क्या हुआ उसका वर्णन कौन करे ?
उसका वर्णन करने में समस्त कवि कुल मण्डली थकित है क्योंकि मिलन सुख
अवर्णनीय है।
उक्त वर्णन में श्रीजयदेव कविराज ने भावी मिलन सुख की कल्पना के
रूप में दूतिका के मुख से उस दिव्य रस का सङ्केत किया फिर भी वह बात न
कही जा सकी जो दोनों के अन्तर में भर रही थी किंवा युगल किशोर की
रसानुभूति थी।
विरह का गान सबने किया है। इसी विरह गान से समस्त ब्रज़ भाषा
साहित्य भरा पड़ा है। 'सूर' को सूर (सूर्य) की उपाधि से इसी विरहगान ने
विभूषित किया, क्योंकि उन्होंने गोपियों के विरह गीत गाने में कलम तोड़ दी है।
विरह में वेदना है, पीड़ा है, प्यार है उपालम्भ है, आशा है, अभिलाषा है और
बहुत कुछ है किन्तु मिलन में क्या है ? दो सृष्टियों का एकीकरण दो प्राण, दो
मन, विविध इन्द्रियों की एकता, तल्लीनता और दो सृष्टियों का लय प्रलय।
यहाँ अनुभव अनुभावक एवं अनुभाव्य का एकीकरण है त्रिपुटी का विनाश है।
यहाँ प्रेमी प्रेमास्पद और प्रेम रूप गङ्गा यमुना एवं सरस्वती का सङ्गम है। इस
त्रिवेणी में तीन धाराओं का ही जब विश्लेषण कठिन है, तब अन्य किन्हीं बातों
की वहाँ गुंजाइश ही कहाँ है ?
इस प्रेम सङ्गम त्रिवेणी का वर्णन किया श्रीहित हरिवंश चन्द्र प्रकट
प्रेमावतार ने। क्योंकि वही सफल हो सकते थे। प्रेम स्वयं अपनी लीला एवं
अपना स्वरूप लखा दे यह सम्भव है। उस अवर्णनीय केवल अनुभव गम्य प्रेम
विलास का वर्णन है-
वल्लवी सु कनक वल्लरी ....
......राधिका सुनामिनी।