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हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)

Hindutva: Who is a Hindu? by Veer Savarkar

स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर द्वारा

DevanagariHindipublished167 पृष्ठ

हिन्दू-जातिकी शक्ति १४६
करना हमारा कर्तव्य ही है कि जिससे इस देशके सब लोग हिन्दू,
मुसलमान, पारसी, ईसाई और यहूदियोंके अन्दर यह भाव जाग
उठे कि हम सब पहले हिन्दुस्थानी-भारतवासी हैं और फिर और
कुछ। पर इस ओर हिन्दुस्थानकी जहांतक भी प्रगति हुई हो,
एक बात ऐसी है जिसे भुलानेसे काम न चलेगा। वह बात यही
है कि क्या हिन्दुस्थानमें और क्या संसारके किसी भी देशमें,
किसी राष्ट्रके खड़े होने और ठहरनेके लिये कोई आधारभूमि
होनी चाहिये। यह आधारभूमि क्या है? किसी राष्ट्रका
जीवन उस राष्ट्रके उन नागरिकोंके ही जीवनपर निर्भर करता
है जिनका स्वार्थ, जिनका इतिहास और जिनकी सदभिलाषाएं
उस राष्ट्रके देशके साथ मिली हुई हों। ये ही लोग हैं जिन्हें
हम राष्ट्रकी आधारभूमि कह सकते हैं। उदाहरणार्थ, तुर्कोंको
देखिये। राज्यक्रांति होनेके पश्चात् तरुण तुर्कोंको अपनी
पार्लमेंट और सामरिक संस्थाओंके द्वार आर्मेनियनों और
ईसाइयोंके लिये खोल देने पड़े इस नाते कि ये भी राष्ट्रके
अङ्ग हैं चाहे इनका धर्म-संप्रदाय कुछ भी हो। पर जब सर्विया-
के साथ युद्ध छिड़ा तब ईसाइयों और आर्मेनियनोंके मन
पहले तो चंचल हुए और पीछे उनकी कितनी ही पलटनें शत्रु-
पक्षमें जा मिलीं, क्योंकि राजकीय, जातीय और धार्मिक दृष्टिसे
सर्वियनोंके साथ इनका अधिक सम्बन्ध था। अमेरिकाका उदा-
हरण लीजिये। जब जर्मन महायुद्ध छिड़ा तब जर्मन-वंशके अमे-
रिकन अमेरिका छोड़कर जाने लगे और अमेरिकापर यह एक

१५० हिन्दुत्व
बड़ा संकट उपस्थित हुआ। अमेरिकाके नीग्रो भी अपने अफ्रिका-
वासी नीग्रो भाइयोंसे जितना प्रेम करते हैं उतना अपने अमेरिका-
वासी यूरोपियनोंसे नहीं। इसलिये अमेरिकाका भाग्य वहांके
ऐंग्लो-सैकसन लोगोंके भाग्यसे ही बंधा हुआ है। यही बात
हिन्दुओंकी है। इनका भूत, भविष्य, वर्तमान तीनों काल
हिन्दुस्थानके साथ दृढ़बद्ध होनेसे यही देश उनकी “पितृभू'
और “पुण्यभू है। इसलिये हिन्दुस्थानी या भारतीय राष्ट्रकी
आधारभूमि हिन्दू ही हैं। इसलिये भारतीय राष्ट्रके नाते भी,
हिन्दू भाइयो, अपनी हिन्दू राष्ट्रीयताको सुदृढ़ और संघटित
करो; अपने अहिन्दु भाइयोंको या संसारके किसी भी प्राणीको
किसी प्रकारका कष्ट पहुंचानेके लिये नहीं बल्कि इसलिये
कि संसारमें चारों ओर जो गुट कायम हुए हैं उनमेंसे
किसीके लिये भी यह संभव न हो कि वह हमारे ऊपर आक्रमण
कर सके। जब हिन्दुस्थानके अन्य समाज हिन्दुस्थानके ही हितको
अपना सबसे श्रेष्ठ हित और धर्म माननेको तैयार नहीं हैं और
जबतक संसारके सभी देश मानव-जातिके हितको अपना व्यव-
हार्य लक्ष्य बनानेको तैयार नहीं हैं, बल्कि ये सब लोग जाति या
धर्म-संप्रदयदाय या राष्ट्रके नाते संकुचित स्वार्थों की बुनियादपर
आक्रमण और संरक्षणके लिये, गुटबंदियां कायम कर रहे हैं, तब-
तक, कमसे कम तबतक तो हिन्दुओ, अपने उन सूक्ष्म बंधनोंको
दृढ़ करो जो तुम्हारे एकीभूत विराट शरीरके ही स्नायु हैं। जो
लोग इन बन्धनोंको तोड़ डालनेकी आत्मघात:करनेवाली चेष्टा

हिन्दू-जातिकी शक्ति १५१
करते या “हिन्दू”नामको ही अस्वीकार करते हैं उन्हें पीछे अनुताप
होगा और यह दिखायी देगा कि हिन्दू-जातिसे अलग होकर
उन्होंने अपने जातीय जीवन और शक्तिके स्रोतसे अपने आपको
अलग कर लिया ।
“हिन्दुत्व” की व्याख्यामें राष्ट्रीयताके जिन लक्षणोंकी मीमां-
सा की गयी उनमेंसे कुछ ही लक्षणोंके होनेसे स्पेन और पुर्तगाल
जैसे राष्ट्र संसारमें सिंह जैसे पराक्रम कर सके । तब, जिस
हिन्दू-जातिमें राष्ट्रीयताके सभी लक्षण मौजूद हैं उसके लिये
संसारमें कौनसी ऐसी बात है जो दुष्प्राप्य हो ?
२२ करोड़ हिन्दू जिनकी कर्मभूमि, पितृभूमि और पुण्यभूमि
हिन्दुस्थान है, जिनका ऐसा दिव्य इतिहास है, जो रक्तसंबंध और
संस्कृतिके बंधनोंसे एक हैं, उनकी तरफ आंख उठाकर कौन देख
सकता है ? सारे संसारको सिर झुकाकर उनकी बात माननी
पड़ेगी । एक दिन वह आनेवाला है जब मानव-जातिको इस
महा-शक्तिका परिचय मिलेगा ।
और यह भी निश्चित है कि जब कभी हिन्दू उस अवस्थाको
प्राप्त करेंगे जब संसारको उनका आदेश सुनना पड़े तब हिन्दू
जातिका वह आदेश गीताके और बुद्धके उपदेशसे भिन्न नहीं
होगा । जब कोई हिन्दू हिन्दुत्वातीत होता है तब उसका हिन्दुत्व
अथाह हो जाता है और भगवान् शङ्कराचार्यकी तरह “वाराणसी
मेदिनी” कहकर समग्र भूमण्डलमें वह अपनी काशीका विस्तार
देखने लगता है, अथवा तुकारामके साथ यह गाने लगता है कि
“आमुचा स्वदेश । भुवनत्रयामध्यें वास । मेरा स्वदेश समग्र
पृथिवीकी चतुःसीमामें व्याप्त है—वही मेरे देशकी चतुः-
सीमा है !”
॥ इति ॥