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हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)

हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)

Hindutva: Who is a Hindu? by Veer Savarkar

स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर द्वारा

DevanagariHindipublished167 पृष्ठ

पृष्ठ 106, कुल 167 में से

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पृष्ठ 106

६० हिन्दुत्व
बिरादरीसे च्युत होगा पर उससे उसका "हिन्दुत्व" कहीं नहीं
जाता। कोई हिन्दू अपने किसी संप्रदायके विरुद्ध किसी अच्छे-
बुरे नये धर्म-संप्रदायको मान ले, बशर्ते कि वह संप्रदाय इसी
देशका हो, किसी हिन्दू द्वारा ही प्रवर्त्तित हुआ हो; तो वह अपने
पहले संप्रदाय या बिरादरीसे निकाल बाहर हो सकता है पर
उसका हिन्दुत्व कोई नहीं छीन सकता; कारण हिन्दुत्वका एक
महान् और प्रधान लक्षण ही यह है कि जिस मनुष्यमें हिन्दूका
रक्त है वह हिन्दू ही है। इसलिये जो लोग सिन्धु नदीसे सिन्धु
(सागर) पर्यन्त इस विशाल देशको अपनी पितृभूमि मानते हैं
और फलतः यह भी मानते हैं कि हम सप्तसिन्धुओंके वंशजोंकी
सन्तति हैं, उन्हींके रक्तसे यह शरीर बना है उनके बारेमें यह कह
सकते हैं कि वे हिन्दुत्वके सबसे प्रधान लक्षणोंमेंसे जो दो
लक्षण हैं उनसे युक्त हैं।
परन्तु ये दो ही लक्षण हुए। थोड़ा विचार करनेसे यह
मालूम होगा कि एक ही पितृभूमि और एक ही रक्तका होना, इन
दो लक्षणोंसे ही हिन्दुत्वकी पूरी व्याख्या नहीं होती। हिन्दु-
स्थानके मुसलमान यदि अपने अज्ञान-जनित कुसंस्कारोंको त्याग
दें तो वे इस देशको अपनी पितृभूमि मानकर इसपर वैसी श्रद्धा
कर सकते हैं। कई देशभक्त और उदात्तचित्त मुसलमान ऐसे हैं
भी जो इस देशको अपनी पितृभूमि मानते हैं। जिस तरहसे
उनका धर्मान्तर हुआ, जिस तरहसे लाखों करोड़ों हिन्दू जबर्दस्ती
मुसलमान बनाये गये वह बात अभी इतनी ताजी है कि वे चाहें