हस्त्यायुर्वेद: गजशास्त्र (पालकाप्य मुनि - सम्पूर्ण गज-चिकित्सा, शरीर-रचना एवं मत्त-गज प्रबन्धन)
Hastyayurveda Gajashastra of Palakapya Muni with Commentary
पालकाप्य मुनि (सम्पादक: पं. शिवदत्त शर्मा) द्वारा
पृष्ठ 722, कुल 742 में से
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हु - ता - श - ना - र्चि - ष्प्र - ति - मै - र्व्या - प्पै - रूर्ध्व - मूर्ध - जैः
Wait! Look at "हुताशनाचींष्":
It has 'ना', then 'र्वि' or 'र्चि'?
It has: 'चि' with a repha! But wait, is there an anusvara? There is a repha 'र्' on चि: 'र्चि'!
Wait, look above 'चि': there is a hook, which is the repha of र्चि!
So it is "हुताशनाचिंष्प्रतिमैर्व्याप्तैरूर्ध्वमूर्धजैः" or "हुताशनाचिष्प्रतिमैर्व्याप्तैरूर्ध्वमूर्धजैः"? There is a dot or blob, let's write "हुताशनाचिष्प्रतिमैर्व्याप्तैरूर्ध्वमूर्धजैः" or "हुताशनाचिंष्प्रतिमैर्व्याप्तैरूर्ध्वमूर्धजैः".
Wait, look at 'र्व्याप्तै':
Is it 'र्व्याप्तै' or 'र्व्यापै'? It's 'र्व्याप्तै' (va + ya with repha, then pta with ai-matra).
Then 'रूर्ध्वमूर्धजैः' - र्ध्व + मूर्ध + जैः.
लम्बभ्रूर्वक्त्रमांसश्च