हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 352, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंषष्ठ उच्छ्वासः ३०५
चक्षुषः श्वेतिम्ना च शारदशशिकरविकसितविशदकुमुदवनदलावलिबलि-
विक्षेपैरिव दिग्देवतार्चनकर्म कुर्वाणश्चतुःशालवितर्दिकाविनिवेशितायाम-
प्रतिपादिकायां चापाश्रयविनिहितैकोपबर्हणायां पर्यङ्किकायां निपत्य जोष-
मस्थात् ।
देवोऽपि हर्षस्तथैव स्नात्वा धरणीतलनिहितकुथाप्रसारितमूर्तिरदूर
एवास्य तूष्णीमेव समवातिष्ठत । दृष्ट्वा दृष्ट्वा दूयमानमानसमग्रजन्मानं
समस्फुटदिवास्य सहस्रधा हृदयम् । औरसदर्शनं हि यौवनं शोकस्य ।
लोकस्य तु नरपतिमरणदिवसादपि दारुणतरः स बभूव दिवसः । सर्व-
स्मिन्नेव च नगरे न केनचिदपाचि न केनचिदस्नायि नाभोजि । सर्वत्र
सर्वेणारोदि । केवलमनेन च क्रमेणातिचक्राम दिवसः । स च प्रत्यग्रत्व-
ष्ट्टंकतक्षततनुरिव वमद्बहलरुधिररसमांसच्छेदलोहितच्छविरपरपारावारप-
यसि ममज्ज मञ्जिष्ठारुणोऽरुणसारथिः । मुकुलायमानकमलिनीकोशवि-
कलं चकाण चञ्चरीककुलं कमलसरसि । सविधविरहव्याधिविधुरवधूबा-
अत्र तूपचारान्मौलिशब्देन शिर उच्यते । वितर्दिका वेदिका । उपबर्हणमुपधा-
नम् । जोषं तूष्णीम् ।
कुथो वर्णकम्बलः । औरसो भ्राता । त्वष्टा विश्वकर्मा तस्य टङ्कश्छेदनशस्त्रम्
तेन तनूकृता तनुर्यस्य सः । पुरा स्वभर्तृतेजोविसरोद्विग्नया सूर्यभार्ययावमानितः
सूर्यस्त्वष्टारमवोचन्मम तेजस्तनु कुरु । तेनाप्यारोप्य चक्रभ्रमं टंकेनासौ तष्ट इति
वार्ता । अपरः पश्चिमः । पारावारः समुद्रः । चकाण जुगुञ्ज । चञ्चरीका भ्रमराः ।
था । धुली हुई अपनी आँखों की सफेदी से उन्होंने शरत्काल के चन्द्रमा की किरणों से
खिले हुए कुमुद के दलों की बलि भेंट करके मानों दिग्देवताओं की अर्चना की । चतुः-
शाल की वितर्दिका में रखी हुई बड़े-बड़े पावे वाली, सिरहाने रखे हुए तकिये से युक्त
चौकी पर चुपचाप पड़ गए ।
देव हर्ष भी उसी प्रकार स्नान करके जमीन पर बिछे हुए कम्बल पर फैल कर
उनके कुछ ही दूर पर मौन होकर बैठे । दुःख से भरे हुए अपने बड़े भाई को देख-देख
कर उनका हृदय मानों हजारों टुकड़ों में बिखर गया । भाई को देखने से शोक
और भी जवान हो जाता है (बढ़ जाता है) । लोगों के लिए वह दिन राजा के
मृत्युदिवस से भी अधिक दुखद हो गया । सारे नगर में न किसी ने पकाया, न किसी
ने स्नान किया और न किसी ने भोजन किया । सब जगह सबने रुदन किया । केवल
इसी क्रम में वह सारा दिन चला गया । मानों विश्वकर्मा की टाँकी से अभी-अभी छाँटे
२० ह० च०