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सर्वकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 351, कुल 506 में से

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पृष्ठ 351

३०४ हर्षचरितम्

कण्ठे मुक्तकण्ठं पुनः पतितक्षौमे क्षामे वक्षसि पुनः कण्ठे पुनः स्कन्ध-
भागे पुनः कपोलोदरे निधाय तथा तथा रुरोद यथा संबन्धनानीवोत्पा-
ट्यन्त हृदयानि। अश्रुस्रोतःशिरा इवामुच्यत लोचनेषु लोकेन स्मृत-
नृपतिना राजवल्लभैनापि प्रतिशब्दकनिभेन निर्भरमिवारुद्यत । सुचिराच्च
कथं कथमपि निर्वृष्टनयनजलः पर्जन्य इव शरदि स्वयमेवोपशशाम ।
उपविष्टश्च परिजनोपनीतेन तोयेन तरत्करनखमयूखपुञ्जतया महाजलप्ल-
वजायमानफेनलेखमिव पुनः पुनः प्रमृष्टमपि पक्ष्माग्रसंगतबाष्पबिन्दुवृन्द-
मन्दोन्मेषमुषितदर्शनं कथं कथमपि चक्षुरक्षालयत् । ताम्बूलिकोपस्था-
पितेन च वाससा चन्द्रातपशकलेनेवोष्णोष्णबाष्पदग्धं वदनमुन्ममार्ज ।
तूष्णीमेव च चिरं स्थित्वोत्थाय स्नानभूमिमगात् । तस्यां च स्थित्वा
विभूषं वित्रस्तव्र्यस्तकुन्तलं मौलिमनादरान्निष्पीड्य सावशेषमन्युस्फुरितेन
जिजीविषतेव जलधौतसुभगमात्मानमपि चुचुम्बिषतेवाधरेण क्षालितस्य

'पर्जन्यो रसदभ्रेन्दौ' इत्युक्तेः । स हि मेघान्वर्षति । वित्रस्ता ऊर्ध्वं क्षिप्ताः ।
निर्गता इत्यन्ये । व्यस्ता विक्षिप्ताः । कुन्तलाः केशाः । उक्तं च—'चिकुरः कुन्तलो बालः
कचः केशः शिरोरुहः ।' इति । 'चूडा किरीटं केशाश्च संयता मौलयस्त्रयः' इत्युक्तम् ।

भुजाएँ फैलाई और कुमार को गले से लगा कर फिर गिरे वस्त्र वाले क्षीण उनके वक्ष में,
फिर कंठ में, फिर स्कन्धभाग में, फिर कपोल में लग-लग कर गला फाड़ कर उस प्रकार
रोने लगे मानों हृदय की परतें उत्पाटित की जा रही हों । उस समय राजा का
स्मरण करके लोगों ने शिरा के समान आँसू की धार बहाई और राजा के प्रिय लोगों ने
भी राज्यवर्धन के रुदन की प्रतिध्वनि के रूप में जोर-जोर से रोना आरम्भ किया ।
जैसे शरत्काल में मेघ जल बरसा देता है उसी प्रकार देर तक रो-धो कर किसी किसी
प्रकार वे स्वयं शान्त हो गए । आसन पर बैठ कर परिजन द्वारा लाए गए जल से नख
की किरणों का फेन उत्पन्न करते हुए बार-बार साफ किए गए चक्षु को भी, जिसकी
पपनियों पर आंसू के कतरे लग जाने के कारण खुलना और देखना न हो पाता था,
किसी-किसी प्रकार धोया। ताम्बूलिक द्वारा दिए गए चाँद के टुकड़े की भाँति रूमाल से
गरम आँसू से जला अपना मुंह पोंछा । बहुत देर तक चुप-चाप ही बैठे रहे और फिर
वहाँ से उठ कर स्नानभूमि में पहुँचे । वहाँ ठहरे और अलंकारहीन, अस्तव्यस्त बाल
वाले अपने सिर को अनादर से पोंछा । बचे हुए शोक से उनका अधर फड़कड़ा रहा था,
मानों उसमें जान आ रही थी, पानी से धुले हुए अपने आपको ही मानों चूमना चाहता