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सर्वकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 137, कुल 506 में से

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पृष्ठ 137

५२ हर्षचरितम्
ल्लगोलाङ्गूललिह्यमानमधुगोलचलितसरघासंघातै रोमाञ्चितमिव दग्ध-
स्थलीरूढस्थूलाभीरुकन्दलशतैः शनैश्चण्डिकायतनकाननमतिक्रम्य मल्ल-
कूटनामानं ग्राममगात् । तत्र च हृदयनिर्विशेषेण भ्रात्रा सुहृदा च जग-
त्पतिनाम्ना संपादितसपर्यः सुखमवसत् । अथापरेद्युरुत्तीर्य भगवतीं
भागीरथीं यष्टिगृहकनाम्नि वनग्रामके निशामनयत् । अन्यस्मिन्दिवसे
स्कन्धावारमुपमणिपुरमन्वजिरवति कृतसन्निवेशं समाससाद । अतिष्ठच्च
नातिदूरे राजभवनस्य ।
निर्वर्तितस्नानाशनव्यतिकरो विश्रान्तश्च मेखलकेन सह याममात्रा-
वशेषे दिवसे भुक्तवति भूपुजि प्रख्यातानां क्षितिभुजां बहूनिशिबिरसंनि-
वेशान्वीक्षमाणः शनैः शनैः पट्टबन्धार्थमुपस्थापितैश्च डिण्डिमाधिरोहणा-
याहूतैश्चाभिनवबद्धैश्च विद्वेषोपार्जितैश्च कौशलिकायतैश्च प्रथमदर्शनकु-
वितमिवेत्युत्प्रेक्षा । जिह्वैव लता, दीर्घत्वात् । गोलाङ्गुलः कृष्णमुखो वानरः ।
मधुगोलं माक्षिककरण्डः । सरघा मधुमक्षिकाः । अभीरुः शतावरी । कन्दलानि
नवनालानि । भ्रात्रेति चन्द्रसेनेन । हृदयत्याद्यभिप्रायेण सुखमित्युक्तम् । उपमणिपुरं
पत्तनभेदम् । अन्वजिरवति नदीभेदनिकटे । संनिवेशो गृहादिरचना ।
निर्वर्तितस्त्यादौ राजद्वारमीदृशमगमदिति संबन्धः । निर्वर्तितेत्यादि । राज-
दर्शनेऽकातरत्वमात्मनः प्रतिपादयति । वारणेन्द्रैः श्यामायमानमिति राजद्वारवि-
वहाँ कहीं जल का ठिकाना न था और न घनी छाया वाले पेड़ ही मिले । कहीं-कहीं
वन के वृक्षों पर कात्यायनी की मूर्तियाँ खुदी हुई थीं जिन्हें रास्ते में आते जाते पथिक
नमस्कार करते थे । वह वन सूख गया था, फिर भी श्वापद जन्तुओं की लपलपाती जीभें
उस वन को मानों पल्लवित कर रही थीं । भालू और लंगूर मधुमक्खियों के छत्ते को
चाटने लगते तो ये भन्नाकर उड़ने लगतीं मानों वन इस दृश्य से पुलकित हो रहा था ।
दावाग्नि से जली हुई वनभूमि में सतावर के पौधे इस तरह निकल आये थे मानों
वह जंगल रोमाञ्चित हो उठा हो । मल्लकूट ग्राम में बाण के परममित्र और भाई जगत्पति
ने उसकी आवभगत की और सुखपूर्वक ठहराया । दूसरे दिन बाण ने गङ्गा पार कर
यष्टिगृहक नाम के वन गाँव में रात बिताई । फिर राप्ती ( अजिरवती ) के किनारे मणिपुर
नामक ग्राम के समीप छावनी में पहुँचा और राजभवन के पास ही ठहरा ।
बाण ने स्नान-भोजन आदि से निवृत्त होकर विश्राम किया और जब एक पहर दिन
रहा और हर्ष भी भोजन आदि से निवृत्त हो चुके थे तब मेखलक को साथ लेकर उनसे