हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 136, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय उच्छ्वासः ६१
दिब भगवत्या महाश्वेतया मालत्याख्यया कृतसकलगमनमङ्गलः, दत्ता-
शीर्वांदो बान्धववृद्धाभिः, अभिनन्दितः परिजनजरतीभिः, वन्दितचर-
णैरभ्यनुज्ञातो गुरुभिः, अभिवादितैराघ्रातः शिरसि कुलवृद्धैः, वर्धित-
गमनोत्साहः शकुनैः, मौहूतिकमतेन कृतनक्षत्रदोहदः, शोभने मुहूर्ते
हरितगोमयोपलिप्ताजिरस्थण्डिलस्थापितमसितेतरकुसुममालापरिक्षिप्तक-
ण्ठं दत्तपिष्टपञ्चाङ्गुलपाण्डुरं मुखनिहितनवचूतपल्लवं पूर्णकलशमीक्ष-
माणः, प्रणम्य कुलदेवताभ्यः कुसुमफलपाणिभिरप्रतिरथं जपद्भिनिर्जद्वि-
जैरनुगम्यमानः, प्रथमचलितदक्षिणचरणः, प्रीतिकूटाद्विनिर्गात् ।
प्रथमेऽहनि तु घर्मकालकष्टं निरुदकं निष्पत्रपादपविषमं पथिकजन-
नमस्क्रियमाणप्रवेशपादपोत्कीर्णकात्यायनीप्रतियातनं शुष्कमपि पल्लवित-
मिव तृषितश्वापदकुललम्बितलोलजिह्वालतासहस्रैः पुलकितमिवाच्छभ-
त्यन्ये । दत्तंत्यादिभागो बान्धववृद्धाभिप्रायेण समुचित एव । अभिनन्दित इति ।
प्रतिपदं द्वयमुह्यम् । जरत्यो वृद्धाः । आघ्रातः शिरसि चुम्बितः । मौहूर्तिका
गणकाः । नक्षत्रदोहदं प्रतिनक्षत्रप्राशनम्, नक्षत्रविषयोऽभिलाषो वा । अजिर-
मङ्गणम् । स्थण्डिलं भूः । परिक्षिप्तो वेष्टितः । पिष्टपञ्चाङ्गुलमाजकोक्ताभिः पञ्च-
भिरङ्गुलीभिमङ्कल्याय दीयते । अप्रतिरथं प्रास्थानिकं मन्त्रम् । निजैस्त्यादिना
स्वस्य दातृत्वमुक्तम् ।
उत्कोर्णां निखाता । कात्यायनी दुर्गा । प्रतियातना प्रतिमा । काननत्वात्पह-
की छोटी बहन मालती ने जो माता के समान स्नेह॒ भरे हृदयवाली, मानो भगवती महाश्वेता
हों, बाण के प्रस्थान-समय के लिये उचित मङ्गलाचार किया। सगी वृद्धाओं ने आशीर्वाद
दिया और परिवार की वृद्धाओं ने अभिनन्दन किया । पूजितचरण गुरुओं ने जाने की
अनुमति दी और अभिवादित कुलवृद्धों ने मस्तक सूँघा। शकुनों से जाने का उत्साह
बढ़ा। फिर ज्योतिषी के अनुसार नक्षत्र-देवताओं को प्रसन्न किया । इस प्रकार शुभ
मुहूर्त में हरित गोबर से लिपे हुए आँगन के चौतरे पर स्थापित पूर्ण कलश के दर्शन करके
कुलदेवताओं को प्रणाम करके, हाथ में फल-फूल लिए हुए और अप्रतिरथ सूक्त के मन्त्रों
का पाठ करते हुए अपने पुरोहित ब्राह्मणों द्वारा अनुगत होकर बाण दाहिना पैर पहले
उठाकर प्रीतिकूट से निकले ।
पहले दिन चण्डिका वन पार किया और मल्लकूट नामक गाँव में पड़ाव किया।
चण्डिका वन के मार्ग में घाम हो जाने के कारण बाण को चलने में कष्ट हुआ, क्योंकि