हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
शींगवालोंमें हरिण श्रेष्ठ है, बलमें हित है, रुचिको देता है, अग्निको जगाता है, त्रिदोषको
हरता है, हलका है, पाककालमें मधुर है, ज्वरवालोंको हित है ॥ १७ ॥
अथ कृष्णमृगके मांसका गुण ।
क्षते क्षयार्शसोः पाण्ड्वावरोचकनिपीडिते ॥
कासश्वासातुराणां च एणमांसं सुखावहम् ॥ १८ ॥
छातीका फटजाना, क्षय, बवासीर, पांडु, अरुची, खाँसी और श्वास इनसे पीडित रोगि-
योंको कृष्णमृगका मांस हित है ॥ १८ ॥
अथ चित्रांगके मांसका गुण ।
चित्राङ्गो वातशमनो बृंहणो बलकृन्मतः ॥
श्लेष्मलः कथितो वापि दुर्जरो मेदवर्द्धनः ॥ १९ ॥
चित्तलका मांस वातको शांत करता है, धातुओंको पुष्ट करता है, बलको बढ़ाता है, कफको
करता है, दुर्जर है और मेदको बढ़ाता है ॥ १९ ॥
अथ छिक्करके मांसका गुण ।
छिक्करो लघु वृही च मधुरो दोषनाशनः ॥
तुल्यो हरिणमांसस्य ज्वरेष्वपि प्रशस्यते ॥ २० ॥
छिकरका मांस हलका है, धातुओंको पुष्ट करता है, मधुर है, दोषको नाशता है, मृगके
मांसके समान है और ज्वरमें भी श्रेष्ठ है ॥ २०॥
अथ रक्तमृगके मांसका गुण ।
रोहितो बृंहणश्चैव विबन्धी दुर्जरो घनः ॥
ज्वरिणां विषमाग्नीनामतीसारेण त्रासयते ॥ २१ ॥
रक्त मृगका मांस धातुओंको बढ़ाता है, विशेष करके कब्ज करता है, दुर्जर है, कठिन है
और ज्वर, विषमज्वर, अग्नि, इन रोगवालोंको अतीसार करके त्रासित करता है ॥ २१ ॥
अथ गेंडा, रोझ, भैंसा, ऊट, घोड़ा इनके मांसोंके गुण ।
तथैव गण्डगवय महिषोष्ट्रतुरङ्गमाः ॥
विबन्धिगुरवः स्निग्धा वातालस्ये प्रकीर्त्तिताः ॥ २२ ॥
गेंडा, नीलीगाय, भैंसा, ऊंट, घोड़ा इन पाँचोंके मांस विशेष करके कब्ज करते हैं, भारी हैं
चिकने हैं, वातमें और आलस्यमें हित हैं ॥ २२ ॥
अ० २० ] भाषाटीकासमेत। ( १०७ )
अथ शूकरके मांसका गुण ।
वातघ्नं रोचनं वृष्यं दुर्जरं श्रमनाशनम्॥
सौकरं पित्तशमनं रुचिदं धातुवर्द्धनम् ॥ २३ ॥
सुअरका मांस वातको नाशता है,रुचिमें हित है, वीर्यमें हित है, दुर्जर है, परिश्रमको नाश-
ता है, पित्तको शांत करता है, कांतिको देता है,धातुओंकों बढ़ाता है, ॥ २३ ॥
अथ शशाके मांसका गुण ।
शशको जाङ्गलश्रेष्ठो लघुर्वृष्यश्च दीपनः॥रुचिकृत्तर्पणो बल्य-
स्त्रिदोषशमनो मतः ॥ २४ ॥ ज्वरे च पाण्डुरोगे च क्षये कासे
गुदामये॥राजयक्ष्मणि पाण्डौ च तथातीसारिणां हितः॥२५॥
शशाका मांस जांगलजीवोंके मांसोंमें श्रेष्ठ है, हलका है, वीर्यमें हित है, अग्निको जगाता है,
रुचिको करता है, तृप्तिको करता है, बलमें हित है और त्रिदोषको शांत करता है ॥ २४ ॥
और ज्वर, पांडुरोग, क्षय, खांसी बवासीर, राजरोग, पांडुरोग, अतीसार, इन रोगवालोंको
हित है ॥ २५ ॥
अथ साहीके मांसका गुण ।
शल्लकी बृंहणो बल्यः स्निग्धो वष्यो रुचिप्रदः ॥
वातश्लेष्महरो हृद्यो मधुरो धातुवर्द्धनः ॥२६ ॥
साहीका मांस धातुओंको पुष्ट करता है, वीर्यमें हित है, बलको करता है, चिकना है, रुचिको
देता है, वातको और कफको हरता है, सुन्दर है, मधुर है और धातुओंको बढ़ाता है ॥२६॥
अथ गोह सरीखे शल्यकनामवाले जीवके मांसका गुण
शल्यको बृंहणो बल्यःस्निग्धो वृष्यो रुचिप्रदः ॥
वातलः किञ्चिद्धातूनां वर्द्धनो मधुरो घनः॥ २७ ॥
गोह सरीखे जीवका मांस धातुओंको पुष्ट करता है, बलमें हित है, चिकना है, वीर्यमें
हित है,रुचिको देता है, वातको करता है, धातुओंको कुछ बढ़ाता है, मधुर है और
कठिन है ॥ २७ ॥
अथ गोहके मांसका गुण ।
रक्तपित्तहरा वृष्या स्निग्धा मधुरशीतला ॥
श्वासकासहरा प्रोक्ता गोधा चार्शोहिता बला॥२८॥
गोहका मांस रक्तपित्तको हरता है, वीर्यमें हित है, चिकना है,मधुर है, शीतल है, श्वासको
और खांसीको हरता है और बवासीरमें हित है बलप्रद है ॥ २८ ॥
( १०८ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने-
अथ मूषाके मांसका गुण ।
स्निग्धो बलकरः शुक्रवर्द्धनो मधुरो लघुः॥ दुर्नामकृमिदोषघ्नो
वातहारी च मूषकः ॥ २९ ॥ इति आत्रेयभाषिते हारीतोत्तरे
चतुष्पदानां मांसवर्गो नाम विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥
मूसेका मांस चिकना है, बलको करता है, वीर्य्यको बढ़ाता है, मधुर है, हलका है और
बवासीरको और कृमिदोषको हरता है और वातको भी नाशता है ॥ २९ ॥
इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां
प्रथमस्थाने मांसवर्गो नाम विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥
एकविंशोऽध्यायः २१.
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अथ स्थलमें विचरनेवाले जीवोंका मांसवर्ग ।
( प्रथम लावापक्षीके मांसका गुण )
पक्षिणां च महाश्रेष्ठो लावको जाङ्गलात्मजः ॥ संग्राही दीपनः
प्रोक्तः कषायो मधुरो लघुः ॥ १ ॥ तथा विपाके मधुरः सन्नि-
पातेऽतिपूजितः ॥ २ ॥
जांगलदेशमें विचरनेवाले लावापक्षीका मांस अन्य पक्षियोंके मांससे श्रेष्ठ है । यह कब्जको
करता है, अग्निको जगाता है, कसैला है, मधुर है और हलका है ॥ १ ॥ और पाककालमें
मधुर है और सन्निपातमें अतिपूजित है ॥ २ ॥
अथ तीतरके मांसका गुण ।
तथैव तित्तिरो वृष्यो मेधाग्निबलवर्द्धनः॥सर्वदोषहरो बल्यो ब-
लाका समता गुणैः ॥३॥वार्त्ताको विशदो वृष्यो यथा लावस्त-
थैव च ॥ कृष्णगौरप्रभेदाश्च श्रेष्ठो गौरश्च तित्तिरः॥४॥ तृती-
यतित्तिरोऽन्योऽपि सामान्यो गुणलक्षणैः॥सवातलोऽतिबलकृ-
द्धनः किञ्चिद्रसायनः ॥ ५ ॥
तीतरका मांस वीर्य्यमें हित है और बुद्धि, अग्नि, और बल, इनको बढ़ाता है, सब दोषोंको
हरता है, बलमें हित है और बगलाके मांसके समान गुणोंवाला है ॥ ३ ॥ वार्त्ताकसंज्ञक
तीतरका मांस सुन्दर है, वीर्य्यमें हित है और लावाके मांसके समान गुणोंवाला है, कृष्ण और
अ० २१ ] भाषाटीकासमेता । (१०९)
गौर तीतरोंमें गौर वर्णका तीतर श्रेष्ठ है ॥ ४ ॥ इन्हींके गुण और लक्षणोंके समान तीसरे,
रंगका तीतर अन्य भी होता है परंतु वह वातल है, अतिबलको करता है, उसका मांस कठिन
है और कुछ रसायन है ॥ ५ ॥
अथ नीले मोरके मांसका गुण ।
मेधावृद्धिं स्रोतसां च करोत्युत्पाटनं शिखी ॥
सवातलोऽतिबलकृद्धनः किञ्चिद्रसायनः ॥ ६ ॥
नीले मोरका मांस बुद्धिको बढ़ाता है और नाड़ियोंको शुद्ध करता है, वातल है, अतिब-
लको करता है, कठिन है और कुछ रसायन है ॥ ६ ॥
अथ साधारण मोरके मांसका गुण ।
सुस्निग्धो श्लेष्मलो वृष्यो घनः शुक्रविवर्द्धनः॥
मांसवृद्धिकरो बल्यो द्वितीयश्च मयूरकः ॥७॥
साधारण मोरका मांस सुन्दर चिकना है, कफको करता है, वीर्यमें हित है, कठिन है, वीर्य-
को बढ़ाता है, मांसको बढ़ाता है, बलमें हित है ॥ ७ ॥
अथ मुर्गाके मांसका गुण ।
तथैव कौक्कुटो ज्ञेयो मधुरश्च गुणात्मकः ॥८॥
वैसे ही मुर्गाका मांस भी मोरके मांसके समान गुणोंवाला है और मधुर है ॥ ८ ॥
अथ कपोतके मांसका गुण ।
कापोतो बृंहणो बल्यो वातपित्तविनाशनः ॥
तर्पणः शुक्रजननो हितो नृणां रुचिप्रदः ॥९॥
कपोतका मांस धातुओंको पुष्ट करता है, बलमें हित है, वातको और पित्तको नाशता है,
तृप्तिको करता है, वीर्यको बढ़ाता है और मनुष्योंको हित है, रुचिको देता है ॥ ९ ॥
अथ परेवाके मांसका गुण ।
तथा पारावतो ज्ञेयो वातश्लेष्मकरो गुरुः॥बल्यो वृष्यो रुचिकृच्च
तथा हारीतको मतः ॥ १० ॥ पोतकी भङ्गिका क्षुद्रा तथा च
कुनटी तथा ॥ एते तुल्यगुणा ज्ञेया लघुवातापहारिणः ॥११॥
परेवाका मांस वातको और कफको करता है, भारी है, बलमें हित है, वीर्यमें हित है, रुचिको
करता है और ऐसे ही गुणोंवाला तिलजिरुपक्षीका मांस है ॥ १० ॥ और पोतक, इन्द्रगोप,
मधुमाखी, कुनटी इन चारोंका मांस समान गुणोंवाला है, हल्का है और वातको हरता है॥ ११ ॥
अथ ककेराके मांसका गुण ।
लघुश्च कृकरो ज्ञेयः कायाग्निवर्द्धनो भृशम् ॥ १२ ॥
ककेराका मांस हलका है, शरीरकी अग्निको बढ़ाता है ॥ १२ ॥
( ११० ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने-
अथ खाती चिड़ाके मांसका गुण ।
तथा लघुर्वातहरः काष्ठकूतोऽग्निवर्द्धनः ॥ वातश्लेष्माधिको ज्ञेयः
शीतलः शुक्रवर्द्धनः ॥ १३ ॥ अश्मरीं हन्ति विशदो बलकृन्मां-
सतक्षणः ॥१४॥
खातीचिड़ाका मांस हलका है, वातको हरता है और जठराग्निको बढ़ाता है, वात और
कफकी अधिकतासे संयुक्त है, शीतल है और वीर्यको बढ़ाता है ॥ १३ ॥ पथरीको हरता है
सुन्दर है, बलको करता है, मांसको काटता है ॥ १४ ॥
अथ चकोर, तोता, मैना इनके मांसका गुण ।
चकोरोऽथ तथा शारी समदोषौ गुणागुणैः ॥ १५ ॥
चकोर, तोता, मैना इन्होंका भी मांस गुण और दोषोंसे समान है ॥ १५ ॥
अथ कुंजके मांसका गुण ।
क्रौंचो वृष्योऽतिरुचिकृदश्मरीं हन्ति नित्यशः ॥
शोषमूर्च्छाहरो वृष्यो हन्ति कासमरोचकम् ॥ १६॥
क्रौंचका मांस वीर्यमें हित है, अधिक रुचिको करता है, निश्चय पथरीको हरता है और शोष,
मूर्च्छा, खांसी, अरुचि इनको नाशता है वीर्यमें हित है ॥ १६॥
अथ कोयलके मांसका गुण ।
कोकिलः श्लेष्मलो ज्ञेयः पित्तसंशमनो मतः ॥ १७॥
कोयलका मांस कफको करता है, पित्त शांत करता है ॥ १७ ॥
अथ विवृताक्षके मांसका गुण ।
वैवृताक्षस्त्रिदोषघ्नो बल्यः शुक्रविवर्द्धनः ॥ १८॥
विवृताक्षका मांस त्रिदोषको नाशता है, बलमें हित है और वीर्यको बढ़ाता है ॥ १८॥
अथ घरके चिड़ेके मांसका गुण ।
गृहस्य चटको वृष्यो बलशुक्रविवर्द्धनः ॥ सर्वदोषहरश्चापि दीपनो
मांसवर्द्धनः॥ १९ ॥ इति आत्रेयभाषिते हारीतोत्तरे स्थलच-
राणां मांसवर्गो नाम एकविंशोऽध्यायः ॥ २१ ॥
घरकी चिड़ियाका मांस वीर्यमें हित है, बल और वीर्यको बढ़ाता है, सब दोषोंको हरता है,
अग्निको जगाता है और मांसको बढ़ाता हैं ॥ १९ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसू-
नुवैद्यरत्निरत्नसाह्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां प्रथमस्थाने स्थलचराणां मांसवर्गो नाम
एकविंशोऽध्यायः ॥ २१ ॥
अ० २२ ] भाषाटीकासमेता । ( १११ )
द्वाविंशोऽध्यायः २२.
अथ जलचरोंका मांसवर्ग ।
प्रथम हंस आदि जलके पक्षियोंकें मांसका गुण ।
हंसः श्लेष्मकरो बलातिरुचिदो वृष्योगुरुः शीतलस्त द्वत्कण्ठ सु-
जाड्यशुक्रजननो वृष्योऽतिरुच्यो मृदुः ॥ ज्ञेयः सारसकः कफा-
निलहरो वृष्यो गुरुश्चोच्यते वृष्यो वीर्यविवर्द्धनः कफहरः कङ्क-
स्तथा भासकः ॥ १ ॥
हंसका मांस कफको करता है, बलको और अति रुचिको देता है, वीर्यमें हित है, भारी है
और शीतल है । और सारसका मांस हंसके मांसके समान गुणोंवाला है, कंठमें जडपनेको और
वीर्यको करता है, वीर्यमें हित है, रुचिमें हित है और कोमल है, और कंक पक्षीका मांस कफ-
को और वातको हरता है, वीर्यमें हित है और भारी है और भासपक्षीका मांस वीर्यमें हित है
और वीर्यको बढ़ाता है, कफको नाशता है ॥ १ ॥
आडी आदि पक्षीक मांसका गुण ।
आडी वातविकारकासहननी बल्या वृषा दीपनी क्रौञ्ची चासुरि-
शुक्रदोषहननी तुल्यस्तथा कर्कटः ॥ दात्यूहो मरुतस्यनाश-
नकरो वृष्यो बलः शुक्रदश्चैष श्रेष्ठगुणः श्रमोपशमनः शुक्रप्रदो
वातहा ॥ २ ॥
आड़ीका मांस, बातका विकार और खाँसीको हरता है, बलमें और वीर्यमें हित है और
अग्निको जगाता है । क्रौंचका मांस और आसुरीका मांस वीर्यके दोषको हरता है, और इसीके
समान गुणोंवाला कांकडपक्षीका मांस है और करढोंक पक्षीका मांस वातको नाशता है, वीर्यमें
हित है, बलको और वीर्यको देता है और यह श्रेष्ठ गुणोंवाला है, परिश्रमको शांत करता है॥२॥
अथ मकर मच्छके मांसका गुण ।
मत्स्यानां मकरः श्रेष्ठो दीपनो वातनाशनः ॥
रुचिप्रदः शुक्रकरश्चाश्मरीदोषनाशनः ॥ ३ ॥
सब प्रकारके मच्छोंके मांसोंमें मकरमच्छका मांस श्रेष्ठ है, अग्निको जगाता है,वातको नाशता-
है, रुचिको देता है, वीर्यको करता है और पथरीदोषको नाशता है ॥ ३ ॥
( ११२ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने-
.अथ मच्छके मांसका गुण ।
शृङ्गी वातविनाशनो रुचिकरो वृष्यः कफघ्नो मतस्तस्माद्रोहित-
को हितो बलकरो वातात्मकः श्लेष्मकः ॥ ४ ॥ श्लेष्माकरी तु
शफरी नलमीनः कफात्मकः ॥ शकुली च विशाला च ज्ञेयौ
वातकफात्मकौ॥बिलं विमत्स्यं ज्ञेयं च वातपित्तकफाकरम्॥५॥
शृङ्गी मछलीका मांस वातको नाश करता है, रुचिकर है,वीर्यमें हित है और कफको नाश
करनेवाला माना गया है। रोहू मछलीका मांस शृङ्गीसे अधिकहित करनेवाला है,बल करता है,
वात प्रकृतिवाला है और कफको बढ़ाता है ॥४॥ शफरी मछली कफ करती है, नल मछली
कफ प्रकृतिवाली है, शकुली मछली वातप्रकृतिवाली है, विशाला मछलीका मांस कफस्वभाव
वाला है, बिल और विमत्स्य नामक मछलीका मांस वात, पित्त,कफ इन तीनोंको करता है॥५॥
अथ कछुवाके मांसका गुण ।
कच्छपो मधुरः स्वादुःशुक्रवृद्धिकरो मतः ॥
वातश्लेष्मप्रजननो बृंहणो रूक्ष एव च ॥ ६ ॥
कछुवेका मांस मधुर है, स्वादु है, वीर्यको बढ़ाता है ,वात और कफको उपजाता है, धातु-
ओंको पुष्ट करता है और रूखा है ॥ ६ ॥
अथ केकड़ाके मांसका गुण ।
कुलीरोऽतिबलो वृष्यः पाण्डुक्षयविनाशनः ॥
शोफातिसारग्रहणीस्थविराणां स्त्रियां हितः ॥ ७ ॥
केकड़ाका मांस अधिक बलको करता है वीर्यमें हित है,पाण्डु और क्षय रोगको नाश करता
है और शोजा,अतीसार,संग्रहणी दोष,इनसे पीडित और बूढे और स्त्रियोंको हित है ॥ ७ ॥
अथ मांसविशेषता ।
मकरो दीपनो हृद्यो ग्राही चोष्णविकारहा ॥
मूत्राश्मरीणां शमनो गुल्मातीसारनाशनः ॥ ८ ॥
मकर मच्छका मांस अग्निको जगाता है, सुन्दर है, कब्जको करता है, गरम विकारको ना-
शता है, मूत्ररोग और पथरीको शांत करता है, गुल्म और अतीसारको नाशता है ॥ ८ ॥
अथ वर्जनाय मांसका गुण ।
काकश्येनखगारिसारसशुका यूकाः कलिङ्गा बकाः ।
भल्लूकोष्ट्रवराहधेनुतनयव्यालास्तथा गर्दभाः ॥
१ अस्मिन् श्लोके शार्दूलविक्रीडितस्य चरणद्वयमेवास्ति ।
मण्डूकादिसरीसृपादिगणा येऽन्ये मता ईदृशस्ते भक्ष्या न
शुभावहा ननु नृणां वर्ज्या भिषग्भिर्बुधैः ॥ ९ ॥ गृहचटकच-
कोराः काकजात्याः खगाश्च पिकशुकमघशारीभृङ्गदात्यूहमा-
ङ्गाः ॥ जलकरंटकपोताः पोटकीखअरीटाः कुकुरमघमलिङ्गन
यूकपिङ्गादयश्च ॥ १० ॥ एते भक्ष्या नैव भक्ष्या नचेष्टा ये
चान्येऽप्यज्ञातनामाण्डजाश्च ॥ अन्ये चापि श्वापदा ये च
निंद्यास्ते खाद्ये वै वर्जिताश्चात्र सर्वे ॥११॥ इति आत्रेयभाषिते
हारीतोत्तरे मांसवर्गो नाम द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥
काक, बाज, शिकरा, सारस, तोता, यूक, कलिङ्ग और बक पक्षी तथा रीछ, ऊंट, सूकर,
बैल, भेडिया और गर्दभ तथा मण्डूक आदि सरीसृप जीवोंका समूह तथा और भी जो इन्हींकी
भांति माने गयेहैं वे सब भक्ष्य मनुष्योंका कल्याण करनेवाले नहीं इसी लिये पंडित वैद्योंको अवश्य
इनका त्याग करना चाहिये ॥ ९ ॥ घरमें रहनेवाली चिड़िया, चकोर, काककी जातिके पक्षी,
शिकराकी जातिके पक्षी, कोयल, तोताकी जातिके पक्षी, मघा, शारी, भंवरा, करढौकपक्षी,
मांग, शंखका जीव, कबूतर, पोटकी, खंजना कुत्ता, मघ, मलिंग, जूम, पिंगापक्षी ॥१०॥ इनके
मांस खानेके योग्य नहीं हैं और श्रेष्ठ भी नहीं हैं तथा जो जो हिंसक तथा निंदित जीव हैं
उनके भी मांस वर्जने चाहिये॥ ११ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवा-
दितहारीतसंहिताभाषाटीकायां प्रथमस्थाने मांसवर्गो नाम द्वाविंशोध्यायः ॥ २२ ॥
त्रयोविंशोऽध्यायः २३.
————————
अथ अन्नपानवर्ग ।
प्रथम मँडका गुण ।
मण्डः परिस्रवो भक्तस्तर्पणो वातनाशनः ॥ मूत्रमेहसमीरघ्नो
रुचिकृन्मूत्रलो मतः ॥ १ ॥ आशुमण्डो भवेद्ग्राही मधुरो वा
कफात्मकः ॥ तर्पणः क्षयदोषघ्नः शुक्रवृद्धिकरः परः ॥ २ ॥
मण्ड झरनेवाला है, खानेयोग्य हैं तृप्तिको करता है, वातको नाशता है, मूत्र, मेह और वातको
नाशता है, रुचिको करता है और मूत्रको उपजाता है ॥१॥ शीघ्र किया मण्ड कब्जको करता है,
मधुर है, कफकी प्रकृतिवाला है, तृप्तिको करता है, क्षय दोषको नाशता है और वीर्यको बढ़ाता है २
८
( ११४ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने-
अथ भातका गुण ।
अप्रसाधितभक्तो युगन्धराणां भक्तश्च घनो विशदमधुरश्च ॥
कफे त्रिदोषशमनश्च कथ्यते कासश्च श्वासात्मक एव स स्मृतः॥३॥
नहीं साधित किया ऐसा युगन्धर चावलोंका भात कठिन है, सुन्दर है, मधुर है, कफमें
हित है, त्रिदोषको नाशता है, खांसीको और श्वासरोगको हरता है ॥ ३ ॥
अथ यवागूका गुण ।
सन्दीपनो स्वेदकरा यवागूः सम्पाचनी दोषमलामयानाम् ॥
सन्तर्पणी धातुबलेन्द्रियाणां शस्ता भवेत्स्याज्ज्वररोगिणां च॥४॥
यवागू पसीनाको लाती है, अग्निको जगाती है, दोष, मल और रोग इनको पकाती है
और धातु, बल और इन्द्रियोंको तृप्त करती है और ज्वररोगवालोंको श्रेष्ठ है ॥ ४ ॥
अथ यवागूका लक्षण ।
भागैकञ्च भवेद्द्रव्यं द्विभागन जलं क्षिपेत् ॥ चित्रकं पिप्पली-
मूलं पिप्पलीचव्यनागरम् ॥५॥ धान्यकस्य समांशानि पिष्ट्वा
श्वेतांश्च तण्डुलान्॥संशुद्धा शिथिला किञ्चित् सा यवागूर्निग-
द्यते ॥ ६ ॥ यवागूमुपभुञ्जानो जनो नारुचिमाचरेत्॥ शाक-
माषफलैर्युक्ता यवागूः स्याच्च दुर्जरा ॥ ७ ॥
एक भाग द्रव्य और दो भाग पानी मिलावे और चीता, पीपलामूल, पीपल, चव्य, सोंठ
॥ ५ ॥ धनियां ये सब समभाग लेने, सफेद और दूसरे रंगके चावल इन सबोंको पीस मिलाके
पकावे कुछ पतली रहे तिसको यवागू कहते हैं ॥ ६ ॥ यवागूका भोजन करता हुआ मनुष्य
अरुचिको नहीं प्राप्त होता और शाक, उड़द, फलसे युक्त यवागू दुर्जर होती है ॥ ७ ॥
अथ मंडका गुण ।
पञ्चकोलैकधान्याकैर्युक्तो रास्नान्वितः पुनः ॥
मण्डस्त्रिदोषशमनो ज्वराणां पाचनः परः॥ ८ ॥
पीपल, पीपलामूल, चव्य, चीता, सोंठ, धनिया, रायसनसे युक्त किया मंड त्रिदोषको नाशता
है और ज्वरोंको पकाता है ॥ ८ ॥
अथ खीरका गुण ।
पायसं गुरु विष्टम्भजननं श्लेष्मवातलम् ॥
पित्तसंशमनं बल्यं वृष्यं श्रेष्ठं रसायनम् ॥ ९॥
खीर भारी है, विष्टंभको करती है, कफ और वातको करती है, पित्तको शांत करती है,
बलमें और वीर्यमें हित है, श्रेष्ठ है और रसायन है ॥ ९ ॥
१ “पिप्पली चव्य विश्वाह्वा पिप्पलीमूलचित्रकैः। पञ्चकोलमिति ख्यातं सद्यो दीपनपाचनम्”॥ शार्ङ्गधरे ।
अ० २३ ] भाषाटीकासमेता । (११५)
अथ खीचडीका गुण ।
गुर्वीविष्टम्भजननो वातश्लेष्मकरः स्मृतः ॥ पित्तसंशमनो बल्यो
वृष्यश्चैव बलप्रदः ॥ १० ॥ मुहुस्तण्डुलसंयुक्तो माषतण्डुल-
वान् पुनः ॥ अन्यथा धान्यगुणवांल्लक्ष्यते च भिषग्वर ॥११॥
तिलानां संयुतो हृद्यो धातुपुष्टिविवर्द्धनः ॥ गुरुर्विष्टम्भमलकृद्
दुर्जरः श्लेष्मकोपनः ॥ १२ ॥
खीचडी भारी है, विष्टम्भको करती है, वातको और कफको करती है, पित्तको शांत करती है,
बलमें और वीर्य्यमें हित है और बलको देती है ॥ १० ॥ फिर चावलोंसे युक्त हुई अथवा चावल
और उड़दोंसे युक्त हुई खीचडीके भी वही गुण हैं। अन्य तरहकी खीचडी अन्नके गुणको देती
है ॥ ११ ॥ तिलोंकी खीचडी सुंदर है, धातुओंकी पुष्टिको बढाती है, भारी है, विष्टंभको और
मलको करती है, दुर्जर है, कफको कोपती है ॥ १२ ॥
अथ दालका गुण ।
सूपश्चोक्तस्त्रिदोषघ्नो व्यञ्जितश्चैव सर्पिषा ॥
धातुपुष्टिकिरः श्रेष्ठो बृंहणो बलवर्द्धनः ॥ १३ ॥
दाल त्रिदोषको नाशती है और घृतमें भूनी अथवा छोंकी हुई दाल धातुओंकी पुष्टिको करती
है, श्रेष्ठ है, धातुओंको और बलको बढ़ाती है ॥ १३ ॥
अथ खलका गुण ।
कफवातकरो हृद्यः खलको बलकारकः ॥ १४ ॥
तिलोंका खल वातको और कफको करता है, सुन्दर है और बलको करता है ॥ १४ ॥
अथ अनारका पना ।
कफानिलहरो हृद्यो दीपनो दाडिमाम्लकः ॥ १५ ॥
अनारका पना कफको और वातको हरता है, सुन्दर है और अग्निको जगाता है ॥ १५ ॥
अथ पापड़का गुण ।
पर्पटस्तैलसम्भृष्टो दोषाणां च ज्वरापहः ॥
रुचिकृद्बलकृच्चैव दाहशोषतृषापहः ॥ १६ ॥
तेलमें भुना हुआ पापड दोषोंसे उपजे ज्वरको नाशता है, रुचिको और बलको करता है,
दाह, शोष, तृषाको नाशता है ॥ १६ ॥
अथ संड़ाकीका गुण ।
सण्डाकी च गुरुः स्निग्धा दुर्जरा अतिशीतला ॥
पित्तश्लेष्मकरा बल्या धातूनां च बलप्रदा ॥ १७ ॥
( ११६ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने-
संडाकी भारी है, चिकनी है, दुर्जर है, अति शीतल है, पित्तको और कफको करती है, बलमें
हित है और धातुओंके बलको देती है ॥ १७ ॥
अथ उड़द आदिके बड़ोंका गुण ।
दुर्जरा मधुरा रुच्या वटिका माषकादिभिः ॥ १८ ॥
उड़द आदिके बड़े दुर्जर हैं, मधुर हैं, रुचिमें हित हैं ॥ १८ ॥
अथ शिखरनका गुण ।
गुडदधिप्रमुदिता हिता शिखरिणी नृणाम् ॥
धातुवृद्धिकरा वृष्या वातपित्तविनाशिनी ॥ १९ ॥
गुड़ और दहीसे बनी हुई शिखरन मनुष्योंको हित है, धातुओंको बढ़ाती है, वीर्यमें
हित है, वातको और पित्तको नाशती है ॥ १९ ॥
अथ घृतयुक्त दहीके पतले शिखरनके गुण ।
शीतलः पित्तशमनो भ्रममूर्च्छातृषापहः ॥
खण्डेन संयुक्तः श्रेष्ठो घृतयुक्तो जलाधिकः॥ २० ॥
यह शीतल है, पित्तको शांत करता है और भ्रम, मूर्च्छा, तृषाको नाशता है, खांड तथा
घृतसे संयुक्त और पानीकी अधिकतासे संयुक्त ऐसा शिखरन श्रेष्ठ है ॥ २० ॥
अथ मन्थका लक्षण और गुण ।
सक्तवः सर्पिषाभ्यक्ताः शीतवारिपरिप्लुताः॥ नातिद्रवा नाति-
सान्द्रा मन्थ इत्यभिधीयते॥२१॥ मन्थः सद्यो बलच्छर्दिपि-
पासादाहनाशनः॥साम्लस्नेहश्च सगुडो मूत्रकृच्छ्रस्य साधनः२२
घृतमें भुने हुए सत्तूओमें पानी मिलाके ऐसा बनावे जो न अति पतला और न अति कठिन
हो तिसको मन्थ कहते हैं ॥२१॥ तत्कालका बनाया मन्थ बल, छर्दि, पिपासा और दाहको
नाशता है, तेल, खटाई और गुड़युक्त मन्थ मूत्रकृच्छ्रको साधता है ॥ २२ ॥
अथ सिद्धमांसका गुण ।
सिद्धं मांसं वेसवारेण युक्तं बाल्यं श्रेष्ठं स्वादु संदीपनं च ॥
त्रिदोषशमनं गुरु लवणस्नेहयुक्तं दुर्जरं दीपनं स्मृतम् ॥ २३ ॥
सिद्ध किया और वेसवारसंज्ञक मसालासे संयुक्त किया मांस बलमें हित है, श्रेष्ठ है, स्वादु है,
अग्निको जगाता है, त्रिदोषको शांत करता है, भारी है, नमक और स्नेहसे संयुक्त किया मांस
दुर्जर है और अग्निको जगाता है ॥ २३ ॥
१ आर्षत्वेनात्र छंदोभङ्गत्वदोषो नास्ति ।
अ० २३] भाषाटीकासमेता । (११७)
अथ मांसकी श्रेष्ठता ।
नहि मांससमं किञ्चिदन्यद्देहमहत्त्वकृत् ॥
मांसादमांसं मांसेन संभृतत्वाद्विशिष्यते ॥ २४ ॥
शरीरके बढानेके वास्ते मांससरीखा दूसरा कोई पदार्थ नहीं है, उस मांसमें भी जो प्राणी
मांस खाते हैं उन प्राणियोंका मांस मांससे भरा रहता है, इसलिये वह बहुत अच्छा
होता है ॥ २४ ॥
अथ भूंजेहुए मांसका गुण ।
अङ्गारैः परिपक्वं च दीपनं श्लेष्मनाशनम्॥
बल्यं च स्नेहसंयुक्तं घनं घनगुणात्मकम् ॥ २५ ॥
शूल आदिके द्वारा अंगारोंसे पकाया मांस दीपन है, कफनाशक है, बलमें हित है, स्नेह-
युक्त रहता है कड़ा है, और कड़े गुणवाला है ॥ २५ ॥
अथ मंडका गुण ।
अत्युष्णं मण्डकं पथ्यं लघु चैव यथोत्तरम् ॥ त्रिकशूलपार्श्वशू-
लपरिणामापहं तथा॥तृष्णामारुतछर्द्दिघ्नमामाशयकरं तथा॥२६॥
मंड अति गर्म है, पथ्य है और हलका है, यह त्रिकशूल, पसलीशूल, परिणामशूलको
नाशता है, तृष्णा, वायु, छर्दि इनको नाशता है, आमको बढ़ाता है ॥ २६ ॥
अथ मांडका गुण ।
तप्तकर्परपक्वा या रोचनी मधुरा घना ॥
कफवृद्धिकरी बल्या पित्तरक्तप्रदायिनी ॥ २७ ॥
तप्त किये तवेपर पकाया मांडा रुचिको करता है, मधुर है, कठिन है, कफको बढ़ाता है,
बलमें हित है, पित्त और रक्तको देता है ॥ २७ ॥
अथ पूरी और घेवरका गुण ।
पूरिका घृतपूरन्तु त्रिदोषशमनं परम् ॥
वृष्यं संबृंहणं स्वादु क्षतक्षयनिवारणम् ॥ २८ ॥
पूरी और घेवर त्रिदोषको शांत करता है, वीर्यमें हित है, धातुओंको पुष्ट करता है, स्वादु
है, क्षत और क्षयको नाशता है ॥ २८ ॥
अथ मालपुवाका गुण ।
गुरूष्णो दुर्जरो ज्ञेयो वातश्लेष्मकरो गुरुः ॥
पूपकः श्लेष्मको हृद्यो वृष्यो वातानुलोमकः ॥ २९ ॥
१ मांसमत्ति भक्षयति असौ मांसादः तस्य मांसमिति मांसभक्षकस्य मांसम् ।
( ११८ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने-
मालपुआ भारी है, दुर्जर है, वातकफको करता है और कफको करता है, सुंदर है,
वीर्यमें हित है, वातको अनुलोम करता है ॥ २९ ॥
अथ सोमालिकाका गुण ।
सोमालिका घना स्वादू रोचनी बलवर्द्धनी ॥
दुर्जरा दोषशमनी वृष्यानुकरणी मता ॥ ३० ॥
सोमालिका (पक्वान्न) कठिन है, स्वादु है, रुचिको उपजाती है, बलको बढ़ाती है, दुर्जर है,
दोषको शांत करती है और वीर्यमें हित है ॥ ३० ॥
अथ फेनिका गुण ।
बृंहणी वातपित्तघ्नी पथ्या लघुतरा मता ॥
फेनिका रोचनी बल्या सर्वधातुबलप्रदा ॥ ३१ ॥
फेनी बल बढाती है, वात पित्तको शांत करती है, पथ्य है, बहुत हलकी है, रुचिको उप-
जाती है, बलमें हित है और सब धातुओंमें बलको देती है ॥ ३१ ॥
अथ भिन्न वड़ाका गुण ।
विष्टम्भी मधुरो हृद्यो घनो वातकफात्मकः ॥
ससिक्तो वा त्रिदोषघ्नो दुर्जरो जायते पुनः ॥ ३२ ॥
भिन्न किया बड़ा विष्टंभको करता है, मधुर है, सुंदर है, कठिन है,वातकी और कफकी प्रकृ-
तिवाला है, सेचित किया बड़ा त्रिदोषको नाशता है, फिर दुर्जर हो जाता है ॥ ३२ ॥
अथ अभिन्न वड़ाका गुण ।
अभिन्नो दुर्जरो बल्यो घनतृष्णाप्रदः स्मृतः ॥
तीक्ष्णो विपाके विष्टम्भी दुर्जरो जायते पुनः ॥ ३३ ॥
नहीं भिन्न किया बड़ा दुर्जर है, बलमें हित है, अधिक तृषाको देता है, तेज है, पाककालमें
विष्टंभी है, फिर दुर्जर हो जाता है ॥ ३३ ॥
अथ लड्डूकां गुण ।
कटुकास्तर्पणा बल्या दुजराः शोषकारकाः॥ मन्दाग्नौ न प्रश-
स्यन्ते मोदका बहुवर्णकाः ॥ द्रव्यं गुणविशेषेण सारस्वादेन
वा पुनः॥ ३४ ॥
लड्डू चर्चरे हैं, तृप्तिको करते हैं,बलमें हित हैं,दुर्जन हैं,शोषको करते हैं और मन्दाग्निमें हित
नहीं हैं, बहुत वर्णवाले हैं, अथवा द्रव्यका गुणविशेष करके व सारस्वाद करके लड्डू कहे हैं ३४
अ० २३] भाषाटीकासमेता । (११९)
अथ यवपोलिकाका गुण ।
पोलिका कथिता बल्या कफदोषकरी मता ॥
वृष्या वीर्य्यप्रदा ज्ञेया दोषला वीर्य्यवर्द्धिनी ॥ ३५ ॥
विदलान्नस्य या पर्णा सिद्धा कर्परकेण तु ॥
रुच्या वान्नविशेषेण दोषान् सर्वान् विभावयेत् ॥ ३६ ॥
जवोंकी पोली बलमें हित है, कफदोषको करती है, वीर्यमें हित है, वीर्यको देती है, दोषोंको
उपजाती है और वीर्य्यको बढ़ाती है ॥ ३५ ॥ और तंदूरपर पकायी हुई रोटी रुचिमें हितहै,
ऐसे ही अन्नके दोषके अनुसार सब पदार्थोंको विचारे ॥ ३६ ॥
अथ अन्नके गुणोंका उपसंहार ।
अन्यानि चान्नपानानि नैवोक्तानि महामते ॥
ग्रन्थविस्तारभीरुश्च लोको वक्तुं न च क्षमः ॥ ३७ ॥
हे महामते ! अन्य अन्न और पान नहीं कहे हैं, क्योंकि ग्रन्थके बढ़ जानेसे संसारके लोक
विचारनेको समर्थ नहीं हो सकेंगे ॥ ३७ ॥
अथ थके हुए मनुष्यका भोजननिषेध ।
श्रमात्तु भोजनं यस्तु पानं वा कुरुते नरः ॥
ज्वरः संजायते तस्य छर्दिर्वा तत्क्षणाद्भवत् ॥ ३८ ॥
जो मनुष्य परिश्रम करके शीघ्र भोजनको अथवा पानको करता है, उसके शीघ्र ही ज्वर
अथवा छर्दि उपजती है ॥ ३८ ॥
अथ भोजनके उपरांत मेहनत और सुरतका निषेध ।
कृत्वा तु भोजनं सद्यो व्यायामं सुरतं तथा ॥
यः करोति विपत्तिः स्यात्तस्य गात्रस्य निश्चितम्॥ ३९॥
जो मनुष्य भोजनको करके तत्काल कसरतको अथवा मैथुनको करता है उसके शरीरमें
निश्चय दुःख हो जाता है ॥ ३९ ॥
अथ ठंडा और गरम भोजनका निषेध ।
न चातिशीतं भुञ्जीत नात्युष्णं भोजने हितम् ॥
कुर्य्याद्वातकफौ शीतमुष्णं भवति सारकम् ॥ ४० ॥
अतिशीतल पदार्थको खावे नहीं और अति गरम भोजन भी हित नहीं है, क्योंकि शीतल
भोजन वातको और कफको करता है, गरम भोजन दस्तावर है ॥ ४० ॥
श्रमित आदिकोंके भोजनका निषेध ।
न श्रान्तो भोजनं कुर्य्यान्न व्यायामसमाकुलः ॥
विषमासने न भोक्तव्यं करोति विविधान्गदान् ॥ ४१ ॥
( १२० ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने-
परिश्रमसे थका हुआ और कसरतसे थका हुआ मनुष्य भोजनको करे नहीं और विषम
आसनपर बैठके भोजनको करे नहीं ये अनेक प्रकारके रोगोंको करते हैं ॥ ४१ ॥
भोजनमें फलादिकोंका नियम।
आदौ फलानि भुञ्जीत वर्जयित्वा तु कर्कटीम् ॥
न नक्तं दधि भुञ्जीत भोजनाद्धे न धावनम् ॥४२ ॥
काकडीके बिना सब फलोंको आदिमें खावे रात्रिमें दहीको नहीं खावे और भोजनके
बीचमें उठकर नहीं भागे ( अर्थात् आधा भोजन करके उठना फिरना फिर भोजन करना
उचित नहीं ) ॥ ४२ ॥
भोजनके पीछे बैठनेका नियम ।
भोक्तोपविशति स्थौल्यं बलमुत्तानशायिनः ॥
आयुर्वामकटिस्थितस्य मृत्युर्धावति धावतः ॥ ४३ ॥
जो भोजनको करके बैठता है वह स्थूलपनेको प्राप्त हो जाता है और भोजन करके सीधा
शयन करनेवालेका बल बढ़ता है, भोजन करके बायें करवट शयन करनेसे आयु बढता
है और भोजन करके दौड़नेसे मृत्यु दौड़ती है ॥ ४३ ॥
भोजनमें पानीका नियम ।
नचादौ सलिलं पेयं भोजने पानमाचरेत्॥अर्द्धाहारेण भुञ्जीत तृ-
तीयं व्यञ्जनेन तु॥४४॥चतुर्थं तोयपानेन पूर्णाहारःसुजायते॥४५॥
भोजनके आदिमें पानीको नहीं पीवे भोजन करते हुए पानीको पीवे दो भागके कोष्ठको
भोजनसे पूरित करे और तीसरे भागको व्यंजनसे पूरित करे ॥ ४४ ॥ और चौथे भागको
पानीसे पूरित करे ऐसे पूर्ण भोजन होता है ॥ ४५ ॥
भोजनके ऊपर व्यायाम ।
भोजनोध्वं चंक्रमेत शतपादं शनैः शनैः ॥
पश्चादुत्तानशयनं ततो वामे क्षणं स्वपेत् ॥ ४६ ॥
और भोजन करके सौ १०० पैर हौले हौले चले, पीछे सीधा शयन कर पीछे बायें करवट
दो घडी शयन करे ॥ ४६ ॥
अथ भोजनके उपरांत नेत्रादिकोंका मार्जन।
भुक्त्वोपरि समाचम्य मार्जयेद्दक्षिणाकरैः ॥
पुनर्दक्षिणहस्तेन मार्जयेदुदरं सुधीः ॥ ४७ ॥
भोजन करके पीछे आचमन ले, दाहिने हाथसे मुखको शुद्ध कर पीछे दाहिने हाथ करके
बुद्धिमान् पेटको शोधित करे ॥ ४७ ॥
अ० २३ ] भाषाटीकासमेता । ( १२१ )
अथ अङ्कारका नियम ।
उद्गीरयेत्समुद्गारं न चोद्गारस्य धारणा ॥ ४८ ॥
अङ्कारको अच्छी तरह लेवे, क्योंकि अङ्कारको धारित करना अच्छा नहीं ॥ ४८ ॥
अथ व्यायामादिकोंका नियम ।
व्यायामं च व्यवायं च धावनं पानमेव च ॥ युद्धं गीतं च पाठं च
क्षणमुक्तो विवर्जयेत् ॥ ४९ ॥ न सद्यः पीते पठनं गमनं च न
कारयेत् ॥ न वा वाहनमारोहं विवादं न च कारयेत् ॥ ५० ॥
और भोजन करके दो घडीतक कसरत, मैथुन, दौडना अदि शुद्धि, जलआदिका पान और
कुस्ती आदि युद्ध, गाना, पढ़ाना, इनको वर्जे ॥ ४९ ॥ और तत्काल पानीको पीके पठन और
गमनको न करे । बोझाको उठावे नहीं, सवारी आदिपर चढ़े नहीं, विवादको करेनहीं ॥५०॥
अथ दिनमें शयन करनेका निषेध ।
दिवास्वापं न कुर्य्यात्तु भुक्त्वोपरि च विश्रमेत् ॥ अकालशय-
नाच्छ्लेष्मा प्रतिश्यायः प्रपीनसः ॥५१॥ क्षयशोफशिरोऽर्त्तिश्च
जायते चाग्निमान्द्यता ॥ ५२ ॥
और दिनमें शयनको करे नहीं किंतु भोजनकरके विश्राम करे, अकालमें शयन करनेसे कफ,
जुकाम, पीनसरोग ॥ ५१ ॥ क्षय, शोजा, शिरमें पीड़ा, मंदाग्नि ये उपजते हैं ॥ ५२ ॥
अथ दिनमें शयन कराने लायक मनुष्य ।
मद्यपीते परिश्रान्ते हिक्काश्वासाहुरेषु च ॥ भयशोकक्षुधार्त्तानां
पठानान्मैथुनेन च ॥ ५३ ॥ तथैव वृद्धबाले च भाराक्रान्ते
तथातुरे ॥ अतीसारे च शोफे च तृष्णापानात्ययेऽपि च ॥ ५४ ॥
ग्रीष्मे बाल्ये निशाह्रस्ते दिवा स्वप्नं हितं भवेत् ॥ ५५ ॥ इति आ-
त्रेयभाषिते हारीतोत्तरे अन्नपानवर्गो नाम त्रयोविंशोऽध्यायः
॥ २३ ॥ प्रथमस्थानं समाप्तम् ॥ १ ॥
मद्यपान करनेमें, परिश्रमसे थकनेमें, हिचकी और श्वासकी पीड़ामें, भय, शोक और भूख
इनमें, पठन और मैथुनमें ॥ ५३ ॥ वृद्धपना, बालकपना इनमें, बोझेसे थकनेपर, रोगमें
अतीसार और शोजामें, तृषा और पानात्यय रोगमें ॥ ५४ ॥ ग्रीष्मऋतुमें, बाल्यावस्थामें, रात्रि-
के जागनेमें दिनको शयन करना हित है ॥ ५५ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरवि-
दत्तशाह्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां प्रथमस्थाने अन्नपानवर्गो नाम त्रयोविंशोऽध्यायः २३
यहां प्रथमस्थान समाप्त हुआ ।
अथ द्वितीयस्थानम् ।
प्रथमोऽध्यायः १.
आत्रेय उवाच ॥ अथातः संप्रवक्ष्यामि द्वितीयस्थानमुत्तमम् ॥
शुभाशुभानि स्वप्नानि स्वास्थ्यारिष्टानि मानुषे ॥ १ ॥ शृणु
पुत्र समासेन यथा वत्स प्रकाश्यते ॥ २ ॥
आत्रेयजी कहते हैं—अब उत्तम द्वितीयस्थानको कहता हूं । मनुष्योंके शुभ-
अशुभ, स्वप्न, स्वस्थपना, अरिष्ट ॥ १ ॥ इनको हे पुत्र ! विस्तारसे सुनो । जैसे हे वत्स !
प्रकाशित किया जाता है ॥ २ ॥
हारीत उवाच ॥ ज्ञातं मया महाप्राज्ञ अन्नपानं तथोत्तमम् ॥
इदानीं ज्ञातुमिच्छामि रोगाणां रोगविज्ञताम् ॥ ३ ॥ कर्मजा
व्याधयो य च तान्वद त्वं महामते ॥ ४ ॥
हारीत बोले—हे महाप्राज्ञ ! अन्नपानकी विधि मैंने जानी । अब रोगवालोंके
रोगोंको जाननेकी इच्छा करता हूं ॥ ३ ॥ हे महामते ! कर्मसे जो व्याधियां उपजतीं हैं
उन्हें आप कहें ॥ ४ ॥
आत्रेय उवाच ॥ कर्मजा व्याधयः सर्वे भवन्ति हि शरीरिणाम्॥
सर्वे नरकरूपाः स्युः साध्यासाध्या भवन्त्यमी ॥५॥ अज्ञातं
यत्कृतं पापं पश्चात्कृच्छ्रं समाचरेत्॥प्रायश्चित्तबलेनापि साध्य-
रूपो भवेद्गदः ॥६॥ क्रियते ज्ञातरूपेण यत्पश्चात्कृच्छ्रमाचरेत्॥
प्रायश्चित्तेन प्रान्ते तु कष्टसाध्यो भवेद्गदः ॥७॥ ब्रह्मघ्नगोध्न-
धरणीपतिघातकश्च आरामतोयधरनाशकपारदाराः ॥ स्वाम्य-
ङ्गनागुरुवधूकूलजामिगामी एते त्रयोदशविधाः प्रबला गदाश्च
॥८॥ पाण्डुः कुष्ठं राजयक्ष्मातिसारो मेहो मूत्रं चाश्मरी मूत्र-
कृच्छ्रम् ॥ शूलः श्वासः कासशोफव्रणाश्च दोषाश्चैते पापरूपा
अ० १ ] भाषाटीकासमेता । ( १२३ )
नृणां स्युः ॥९॥ ज्वरो जीर्णं तथा छर्दिभ्रममोहाग्निमान्द्यताः॥
यकृत्प्लीहार्शःशोषाश्च एते चैवोपदूषकाः ॥ १० ॥ व्रणं शूलं
शिरःशूलं रक्तपित्तं तथोर्द्धगम्॥एते रोगा महाप्राज्ञ अभिशा-
पाद्भवन्ति हि ॥११॥ अन्येऽपि बहुधा रोगा जायन्ते दोषस-
म्भवाः ॥ अतो वक्ष्य समासेन शृणु त्वं च महामते ॥१२ ॥
आत्रेयजी कहते हैं-शरीरधारियोंके कर्मसे उपजनेवाली सब व्याधियां हैं और
सब दुःखरूप हैं साध्य और असाध्य होती हैं ॥५॥ बिना जाने जो किये हुए पापके पीछे कृच्छ्र
चांद्रायण करे, क्योंकि प्रायश्चित्तके बलसे वह पाप साध्य हो जाता है॥६॥जानके पाप करनेके पीछे
कृच्छ्रचांद्रायण करनेसे कष्टसाध्य रोग हो जाता है ॥ ७ ॥ ब्राह्मणको मारनेवाला, गायको
मारनेवाला, राजाको मारनेवाला और बाग तथा जलके स्थानको नाशनेवाला और पराई स्त्रीको
अपनी स्त्री बनानेवाला और स्वामीकी भार्या, गुरुकी भार्या,अपने कुलमें उपजी ऐसी स्त्रियोंसे
भोग करनेवाला ऐसे मनुष्योंके तेरह प्रकारके रोग होते हैं॥ ८ ॥ पांडु, कुष्ठ, राजरोग,
अतीसार, प्रमेह, मूत्ररोग, पथरीरोग, मूत्रकृच्छ्र, शूल, श्वास, खांसी, शोजा, घाव ये पापरूपरोग
उन मनुष्योंके उपजते हैं ॥ ९ ॥ और ज्वर,अजीर्ण छर्दि,भ्रम,मोह,मंदाग्नि, यकृतरोग,तिल्लीरोग,
बवासीर, शोष ये उपरोग कहाते हैं ॥ १० ॥ घाव,शूल, शिरका शूल, शरीरके ऊपरले अंगोंमें
प्राप्त हुआ रक्तपित्त ये रोग हे महाप्राज्ञ ! अभिशापसे होते हैं ॥ ११ ॥ अन्य भी बहुतसे रोग
दोषोंसे उपजते हैं इसवास्ते विस्तारसे मैं कहूँगा । हे महामते तुम सुनो ॥ १२ ॥
अथ कर्मविपाक ।
ब्रह्मघ्नो जायते पाण्डुः कुष्ठी गोवधकारकः॥राजघ्नो राजयक्ष्मी
स्यादतिसार्योपघातकः ॥ १३ ॥ स्वाम्यङ्गनाभिगमने मेहा
रोगा भवन्ति हि॥गुरुजायाप्रसङ्गेन मूत्ररोगोऽश्मरीगदः ॥१४॥
स्वकुलजाप्रसङ्गाच्च जायते च भगंदरः॥शूली परोपतापी च पैशू-
न्याच्छ्वासकासिनः॥१५॥मार्गे विघ्नकरा ये तु जायन्ते पादरो-
गिणः ॥ अभिशापाद्व्रणोत्पत्तिर्यकृद्धापि प्रजायते ॥ १६ ॥
सुरालये जले चापि शकृद्दृष्टिं करोति यः॥गुदरोग़ा भवन्त्यस्य
पापरूपातिदारुणाः ॥१७॥ परतापिद्विजानां च जायन्ते हि
( १२४ ) हारीतसंहिता । [ द्वितीयस्थाने-
महाज्वराः॥परान्नविघ्नजननादजीर्णमपि जायते ॥१८॥ गरद्-
श्चर्दिरोगी स्यात्पादाष्टविभ्रमी तथा॥धूर्त्तोऽपस्माररोगी स्या-
त्कदन्नदेऽग्निमान्द्यकम्॥१९॥यकृत्प्लीहो भवेद्रोगो भ्रूणपातकपा-
तकात्॥व्रणं शूलं शिरःशूलं परतापोपकारणात्॥२०॥अपेयपा-
नरतको रक्तपित्ती प्रजायते ॥ दावाग्निदायको यस्तु जायते च
विसर्पवान्॥२१॥बहुवृक्षोपच्छेदी च जायते च बहुव्रणः ॥ पर-
द्रव्यापहाराच्च जायते ग्रहणीगदः ॥२२ ॥ कुनखी स्वर्णस्तेयाच्च
प्रसूतिस्तस्य जायते ।। रौप्यस्तेयाच्चित्रकुष्ठं ताम्रचौराद्विपा-
दिका ॥२३॥ त्रपुश्चौरः सिध्मलश्च मुखरोगी च सीसहृत्॥वर्वरो
लोहचौरः स्यात्क्षारचौरोऽतिमूत्रलः ॥२४॥ घृतचौरोऽन्तरोगी
च तैलचौरोऽतिकण्डुकः॥एतैश्चिह्नैस्तु काणाक्षो वक्रोक्तो वक्र-
लोचनः॥२५॥ दोषवान्स्याच्छ्यावदन्तो दुष्टवाक्कुष्ठदूषणः ॥
रसनाशाज्जिह्वारोगी गोत्रहा लूतिकाव्रणी॥२६॥एते चैव महा-
दोषा अतो वक्ष्यामि निष्कृतिम् ॥कृच्छ्रेण येन सिध्यन्ति पाप-
रूपा इमे गदाः ॥ २७ ॥
ब्राह्मणको मारनेवाला पांडुरोगी होता है,गायको मारनेवाला कुष्ठी होता है, राजाको मारने-
वाला राजरोगी होता है, मनुष्यको मारनेमें सलाह देनेवाला अतीसाररोगी होता है ॥१३॥
स्वामीकी स्त्रीसे भोग करनेसे प्रमेह रोग उपजता है और गुरुकी स्त्रीसे भोग करनेमें मूत्ररोग और
पथरी रोग उपजता है॥१४॥ अपने कुलसे उपजी स्त्रीके संग भोग करनेसे भगंदर रोग उपजता
है, पराये सुखको देख दुःख पानेवालेको शूलरोग होता है, चुगली करनेसे श्वास रोग और खांसी
उपजती है ॥१५॥ मार्गमें विघ्न करनेवालोंके पैरोंमें रोग उपजता है,अभिशापसे घावकी उत्पत्ति
अथवा यकृत् रोग उपजता है ॥ १६ ॥ देवताओंके स्थानमें और पानीमें जो विष्ठाको गेरता है
उसके पापरूपी और दारुण ऐसे गुदाके रोग उपजते हैं ॥१७॥ ब्राह्मणको दुःख देनेसे महा-
ज्वर उपजता है और पराये भोजनमें विघ्नको करनेसे अजीर्ण रोग उपजता है ॥ १८॥ विषको
देनेवालेके छर्दिरोग उपजता है अथवा वह रोगी घुटनोंसे आठ दिशातक भ्रमनेवाला होता है,
धूर्त मनुष्यके मृगीरोग उपजता है और कुत्सित अन्नको देनेवाला मन्दाग्निसे
पीडित होता है ॥ १९ ॥ गर्भको गिरानेवाला यकृत्रोगसे और तिल्लीरोगसे
पीडित होता है, ॥ दूसरेको देख दुःख पानेसे घाव, शूल, शिरका शूल ये उपजते हैं ॥२०॥
नहीं पीनेके योग्य चीजको पीनेवाला रक्तपित्तसे पीडित होता है और वनमें अग्निको
अ० १ ] भाषाटीकासमेता । ( १२५ )
लगानेवाला विसर्परोगी हो जाता है ॥ २१ ॥ बहुतसे वृक्षोंको छेदनेवाला बहुत घावोंसे पी-
ड़ित होता है और पराये द्रव्यको हरनेसे ग्रहणी रोग उपजता है ॥ २२ ॥ सोनेकी चोरी कर-
नेसे कुत्सित नखोंवाला हो जाता है, चांदीको चोरनेसे चित्रकुष्ठ उपजता है, तांबको चुरानेसे वि-
पादिका कुष्ठ उपजता है ॥ २३ ॥ रांगको चुरानेसे सेपरोग होता है, सीसाके चुरानेसे मुखरोग
उपजता है, लोहाको चुरानेसे बर्बर संज्ञक रोगको प्राप्त होता है, क्षारको चोरनेवालेको अति-
मूत्ररोग उपजता है ॥ २४ ॥ घृतको चोरनेसे आंतरोग होता है, तेलको चोरनेसे खाजरोग उप-
जता है, दूसरोंमें छिद्रको काढ़नेवाला नेत्रोंसे काणा होता है और टेढ़ा बोलनेवाला टेढ़े नेत्रों-
वाला होता है ॥ २५॥ दोषवालेके काले दंत होते हैं, दुष्टकर्मको करनेवाला कुष्ठरोगी होता है,
रसको नाशनेवाला जीभरोगी होता है, गोत्रके मनुष्योंको नाशनेवाला भूत और घावसे पीड़ित
होता है ॥ २६ ॥ ये सब महादोष हैं इसलिये इनकी निष्कृतिको कहता हूँ जिस कृच्छ्रसे ये
पापरूपी रोग सिद्ध होते हैं ॥ २७ ॥
अथ पाप दोषोंका प्रतिकार ।
गोदानं भूमिदानं च स्वर्णदानं सुरार्चनम् ॥ कृत्वा पश्चात्प्रती-
कारं कुर्यात्पाण्डूपशान्तये ॥२८॥ महापापेषु सर्वस्वं तदर्द्ध-
मुपदोषजे॥ आत्रेयाद्दशषष्ठांशात्कल्प्यं व्याधिबलाबलम्॥२९॥
नवषष्टिकृतं कर्म कुष्ठरोगोपशान्तये ॥ गोभूहिरण्यदानं च तथा
मिष्टान्नभोजनम् ॥ ३० ॥ चतुर्विधं दानमिदं दत्त्वा कुर्यात्प्र-
तिक्रियाम्॥ कदाचिदपि सिध्येत आयुषश्च बलक्रियाम्॥३१॥
मेहे सुवर्णदानं च शूले श्वासे भगन्दरे॥आश्वानडुहदानेन श्वास-
कासाद्विमुच्यते॥३२॥ज्वरे चेश्वरपूजा च रुद्रजाप्यं समाचरेत् ॥
अतिपानान्नदानं च शस्त्रदानं अमातुरे ॥ ३३ ॥ अग्निहोमं
चाग्निमान्द्ये कन्यादानं च गुल्मके॥ मेहाश्मरीविनाशाय
लवणं च प्रदीयते ॥ ३४ ॥ बहुभोजनदानेन शूलरोगाद्विमु-
च्यते ॥ महाज्वरे शान्तिकं च सहस्रं गण्डुकं शिवम् ॥३५ ॥
स्नापयेत्तेन सिद्धिः स्याज्ज्वररोगाद्विमुच्यते॥ घृतमधुप्रदानेन
रक्तपित्तं प्रशाम्यति ॥ ३६ ॥ वनस्पतिसिञ्चनेन विसर्पात्परि-
मुच्यते ॥ विटपिसिञ्चनेनाथ नात्र याति बहुव्रणः ॥ ३७ ॥
चतुर्विधेन दानेन साध्यः स्याद्ग्रहणीगदः ॥ सुवर्णदानात्कुनखी