हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 150, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें( ११८ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने-
मालपुआ भारी है, दुर्जर है, वातकफको करता है और कफको करता है, सुंदर है,
वीर्यमें हित है, वातको अनुलोम करता है ॥ २९ ॥
अथ सोमालिकाका गुण ।
सोमालिका घना स्वादू रोचनी बलवर्द्धनी ॥
दुर्जरा दोषशमनी वृष्यानुकरणी मता ॥ ३० ॥
सोमालिका (पक्वान्न) कठिन है, स्वादु है, रुचिको उपजाती है, बलको बढ़ाती है, दुर्जर है,
दोषको शांत करती है और वीर्यमें हित है ॥ ३० ॥
अथ फेनिका गुण ।
बृंहणी वातपित्तघ्नी पथ्या लघुतरा मता ॥
फेनिका रोचनी बल्या सर्वधातुबलप्रदा ॥ ३१ ॥
फेनी बल बढाती है, वात पित्तको शांत करती है, पथ्य है, बहुत हलकी है, रुचिको उप-
जाती है, बलमें हित है और सब धातुओंमें बलको देती है ॥ ३१ ॥
अथ भिन्न वड़ाका गुण ।
विष्टम्भी मधुरो हृद्यो घनो वातकफात्मकः ॥
ससिक्तो वा त्रिदोषघ्नो दुर्जरो जायते पुनः ॥ ३२ ॥
भिन्न किया बड़ा विष्टंभको करता है, मधुर है, सुंदर है, कठिन है,वातकी और कफकी प्रकृ-
तिवाला है, सेचित किया बड़ा त्रिदोषको नाशता है, फिर दुर्जर हो जाता है ॥ ३२ ॥
अथ अभिन्न वड़ाका गुण ।
अभिन्नो दुर्जरो बल्यो घनतृष्णाप्रदः स्मृतः ॥
तीक्ष्णो विपाके विष्टम्भी दुर्जरो जायते पुनः ॥ ३३ ॥
नहीं भिन्न किया बड़ा दुर्जर है, बलमें हित है, अधिक तृषाको देता है, तेज है, पाककालमें
विष्टंभी है, फिर दुर्जर हो जाता है ॥ ३३ ॥
अथ लड्डूकां गुण ।
कटुकास्तर्पणा बल्या दुजराः शोषकारकाः॥ मन्दाग्नौ न प्रश-
स्यन्ते मोदका बहुवर्णकाः ॥ द्रव्यं गुणविशेषेण सारस्वादेन
वा पुनः॥ ३४ ॥
लड्डू चर्चरे हैं, तृप्तिको करते हैं,बलमें हित हैं,दुर्जन हैं,शोषको करते हैं और मन्दाग्निमें हित
नहीं हैं, बहुत वर्णवाले हैं, अथवा द्रव्यका गुणविशेष करके व सारस्वाद करके लड्डू कहे हैं ३४