सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 447, कुल 548 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 447

॰अ० ३९] भाषाटीकासमेता । (४१५)
अथ रक्तस्थ कुष्ठ ।
रूक्षं तथा सकण्डु त्वक्स्थितञ्च मृदु शीतलम् ॥
आस्रावदाहरक्ताभं रक्तस्थं रक्तगं विदुः ॥ १५ ॥
जो रूखाहो, खाजहो, कोमलहो, शीतलहो वह त्वचा में स्थित कुष्ठ जानना और जिसमें
झिरनाहो, रक्तसरीखी कांतिहो वह रक्तमें स्थित हुआ कुष्ठ जानना ॥ १५ ॥
अथ मांसस्थ मेदःस्थ तथा अस्थिस्थ कुष्ठ ।
सुस्निग्धं तोदगम्भीरं मांसगञ्च विनिर्दिशेत्॥मेदःस्थं तोदवेष्टत्वं
सुस्निग्धं रक्तलोचनम् ॥अस्थिसंस्थञ्च गम्भीरं विसर्पे नासि-
कामुखे ॥ १६ ॥
स्निग्धहो गम्भीर व्यथावाला वह मांसमें प्राप्त हुआ कुष्ठ जानना जो मेदमें स्थितहो
उसमें पीडाहो और ऐंठन चिकनाहो, रक्तनेत्रहों और जो अस्थिमें स्थितहो वह गंभीर होता है
मुखमें तथा नासिकामें विसर्परोग दीखता है ॥ १६ ॥
अथ मज्जास्थ तथा शुक्रस्थ कुष्ठ ।
मज्जसंस्थश्च विकलो मज्जास्रावश्च जायते॥विशीर्यते च सर्वाङ्गे
तथैव शुक्रगं विदुः ॥ १७ ॥ अतो वक्ष्ये समासेन प्रतिकर्म
भिषग्वर ॥ १८॥
मज्जामें स्थितहोनेसे विकल होजावे, और मज्जास्राव होता है और जिसमें सब अंग शिथिल
होजावें वह वीर्यमें प्राप्त हुआ कुष्ठ जानना ॥ १७ ॥ हे उत्तम वैद्य ! अब संक्षेप मात्रसे
इनकी चिकित्साको कहेंगे ॥ १८ ॥
अथ कुष्ठचिकित्सा ।
त्वक्स्थे स्वेदस्तथालेपो रक्तस्रावश्च रक्तगे॥विरेकं मांसगे प्रोक्तं
मेदोगे क्वाथपाचनम् ॥१९॥ अथ तानि च त्रीण्येवमस्थिमज्जा-
गतानि च ॥ वातिके स्वेदनं पथ्यं पित्त शीतोपचारणम्॥२०॥
कष्टसाध्यमिदं प्रोक्तमसाध्यं सान्निपातिकम् ॥ रोगकारणमा-
लोच्य तदा कम समारभेत् ॥ २१ ॥
त्वचामें स्थितहुए कुष्ठमें पसीना दिलावे, लेप करे, रक्तमें प्राप्तहुएमें स्राव करावे, मांसमें
प्राप्तहुए कुष्ठमें जुलाब देवे और मेदमें प्राप्तहुएमें क्वाथ पाचन देवे ॥ १९ ॥ और यही उप-
चार अस्थि, मज्जा, इनमें प्राप्तहुएमें भी करना चाहिये, वातसे उपजे कुष्ठमें पसीना दिवाना