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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 448

(४१६) हारीतसंहिता । [तृतीयस्थाने-
पथ्य है, पित्तसे उपजेमें शीतल उपचार करना श्रेष्ठ है ॥ २० ॥ यह कुष्ठरोग कष्टसाध्य
कहा है और सन्निपातसे उपजा असाध्य होता है, पहले रोगके कारणको जानके पीछे कर्म कर-
नेका आचरण करे ॥ २१ ॥
पक्षान्नपक्षाञ्छोधनं पाचनञ्च मासान्मासान्कारयेद्रेचनञ्च ॥
मासान्कुष्ठे शोधनाय प्रकर्षात्तिष्ठे षष्ठ मास्यसृग्मोक्षणञ्च
॥ २२ ॥ वासापटोलफलिनीलवणं वचाञ्च निम्बत्वचं क्वथि-
तमाशु पिबेत्कषायम्॥ कुष्ठे करोति वमनं मदनान्विते च
पथ्याकषायवमने मदनान्वितेषु ॥ २३ ॥ फलत्रिकं त्रिवृद्दन्ती
भिषग्वर विरेचकम् ॥ क्वाथो वचोष्णतोयेन पाने स्याद्भिषगु-
त्तम॥२४॥ श्वासप्रश्वासयोर्वेध्या शिरा शिरसि चेद्वहिः ॥ ततः
प्रयोजनीयश्च क्वाथस्नेहस्य भोजनम् ॥ २५ ॥
पक्षपक्षको प्रति शोधन और पाचनकर्म करे । महीना २ को प्रति जुलाव दिलानी
चाहिये और कुष्ठरोगमें छठे २ महीनेके प्रति रक्तको निकसावे ॥ २२ ॥ वांसा, परवल,
मालकांगनी, नमक, वच, नींबकी त्वचा, इनका काथ बना मैनफल मिला कुष्ठमें पीनेसे
वमन होता है और पंचवृक्षोंका काथ बना मैनफूल मिला वमनके वास्ते देना चाहिये ॥ २३ ॥
हे वैद्य ! त्रिफला, निशोत, इनसे जुलाव दिलानी श्रेष्ठ है और वचका काथ बना गरम २
जलके संग पीना श्रेष्ठ है ॥ २४ ॥ कुष्ठमें जो ज्यादा श्वास होवे तो शिरमें रहनेवाली
वाहिरकी नस वींधनी चाहिये, पीछे क्वाथ और स्नेह अर्थात् घृत आदिक भोजन करवाना
चाहिये ॥ २५ ॥
अथ शुण्ठ्यादिक्वाथ ।
शुण्ठीकणाखदिरपाटलिकापटोलीमञ्जिष्ठकंटविषबिल्वयवानि-
कानाम्॥वासाफलत्रिकजलेन कषायसिद्धः पानान्निहन्ति मनु-
जस्य च कुष्ठदोषम् ॥२६॥ वासाविडङ्गपिचुमन्दपटोलपाठा-
शुण्ठीसुदारुतरुपञ्चमूलपथ्याः ॥ क्वाथो निहन्ति च मरुत्प्र-
भवं सुकुष्ठं त्रिःसप्तकेऽहनि महौषधमेव योज्यम् ॥ २७ ॥
सूंठ, पीपल, खैर, पाड़लवृक्ष, परवल, मँजीठ, लघुगोखरू, अतीस, बेलगिरी, अजवायन,
वांसा, त्रिफला, इनका काथ बना पीनेसे मनुष्यका कुष्ठरोग दूर होता है ॥ २६ ॥
वांसा, वायविडंग, नींव, परवल, पाठा, सूंठ, देवदार, बड़ आदि पंचवृक्ष, लाख, मूली,