हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 446, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें( ४१४ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
अथ गोजिह्वक कुष्ठ लक्षण ।
यद्रूक्ष्यपारुष्यसकर्कशञ्च गोजिह्वकं स्यात्खलु भेद्योग्यम् ॥
यवासरक्तानि च मण्डलानि सकण्डुकानि व्रणसंयुतानि॥ ९ ॥
जो रूषा हो कठोर हो कड़ा हो गौकी जिह्वाके समान वर्णवालाहो वह गोजिह्वककुष्ठ कहाता
है और रक्त मंडलहो कुंडलसरीखेहों व्रणसे संयुक्तहो वह लोहित मंडल कुष्ठ जानना ॥ ९ ॥
अथ विपादिका कुष्ठ लक्षण ।
ज्ञेयं तु तल्लोहितमण्डलञ्च रक्तोद्भवं तद्रुधिराश्रितञ्च ॥
सवेदनार्त्तस्य परिस्फुटञ्च विपादिका सा कथिता विधेया १०॥
जो रक्तसे उत्पन्न हो रक्तके आश्रय हो पीड़ायुक्त हो प्रकटहो वह विपादिका कुष्ठ कहाता है॥१०॥
कोपेन रक्तानिलयोश्चजातातथैवविस्फोटकसन्निभा वा॥तथापरं
नाम बहुव्रणं च सूक्ष्मा च सा वै विदिता नरस्य॥११॥ कण्डू-
र्विचर्चीभुवने प्रतीता श्वेतानि सूक्ष्माणि च पाटलानि॥विसर्पते
यस्य नरस्य रक्तं युवा न केनापि भवेच्च सिद्धः ॥ १२ ॥
जो रक्तवातके कुपित होनेसे उत्पन्न हो और विस्फोटके समान हो और बहुतसे व्रण हों वह
सूक्ष्मा विपादिका नामक कुष्ठ जानना ॥ ११ ॥ कंडू विचर्चिका ये संसारमें प्रसिद्ध हैं और
जिसके सूक्ष्मवर्णवाले तथा सफेदवर्णवाले और पीले वर्णवाले ऐसे चिह्न दीखें, रक्त दुष्ट होके
फैलाता है ऐसा तरुणरोग किसी प्रकारसेभी सिद्ध नहीं होता है ॥ १२ ॥
अथ वातादिजन्य कुष्ठका लक्षण ।
शिरीषपुष्पाणि शिरीषकाणि सन्त्यक्तभावः पुरुषश्च सूक्ष्मः॥
तोदस्तथा वेपथुवातलिङ्गं पित्तेन शोषभ्रमदाहतृष्णाः ॥१३॥
श्लेष्मोद्भवे कठिनशीतलपाण्डुरञ्च नेत्रे नखेषुचवपुष्यभिलाषता
च॥ मित्रेण संश्रुतभवानि भवन्ति यस्य स्यात्सान्निपातिकभवं
बहुभिश्च लिङ्गैः ॥ १४ ॥
शिरसके पुष्पोंके समान और शिरसके समान वर्ण हो, कठोर हो, सूक्ष्म हो, व्यथा हो
कंपना हो ये वातसे उपजे कुष्ठके लक्षण हैं और पित्तसे उपजे कुष्ठमें शोषहो, भ्रम हो दाह हो
तृषाहो ॥ १३ ॥ कफसे उपजा कुष्ठ कठिन, शीतल होता है और नेत्र, नख, शरीर
ये पीले होजाते हैं इनमें खाज करनेकी इच्छा रहे और सब मिलेहुए दोषोंसे मिलेहुए लक्षण
होते हैं, सन्निपातसे उपजे कुष्ठमें बहुतसे लक्षण मिलते हैं ॥ १४ ॥