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सर्वकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 398

( ३६६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
तु दापयेत्॥ आमातिसारशमनं बस्तिशूलं नियच्छति॥३८॥
गुग्गुलुं च रसो नं च हिङ्गु नागरसंयुक्तम्॥क्वाथं वामविनाशाय
शमनं मारुतस्य च ॥ ३९ ॥ अजमोदोग्रगन्धा च कुष्ठं त्रिक-
टुकं शटी॥फलत्रिकं च भार्ङ्गी च पुष्करं लवणाष्टकम् ॥४०॥
जीरके द्वे विडङ्गानि तुम्बुरू द्वे च दारु च॥तथा बिल्वा शिला
भेदो रोध्रं वत्सकवासकम् ॥४१॥ धातकीकुसुमं चैव शाल्मली
त्वक् च दाडिमम् ॥ एतानि समभागानि सूक्ष्मचूर्णानि कार-
येत् ॥ ४२ ॥ घृतेन संयुक्तं वातं नाशयत्याशु निश्चितम् ॥
सहिङ्गु चारनालेन पीतं शूलार्त्तिनाशनम् ॥४३॥ तथा चोष्ण-
जलेनापि वामवातं नियच्छति ॥ गृध्रसीकटिशूले च दशमूल-
जलेन तु ॥४४ ॥ विबन्धैरण्डतैलेन शोफे वापि सुदारुणे ॥
गुल्मगोमूत्रसंयुक्तं गुडेन पाण्डुरोगजित् ॥ ४५ ॥ प्रमेहे मधुसं-
युक्तं यक्ष्मणि शर्करायुतम् ॥ हन्ति सर्वामयान् घोरान् यथा-
योगेन योजितम् ॥ ४६ ॥
हरडको दहीके पानीमें पीस शहद और खांड मिला पीनेसे अथवा गुड आंवला इनके
पीनेसे आमातिसार बन्द होता है ॥ ३७ ॥ कूडाकी छाल, दोनोजीरे इनको दहीमें पीस
देनेसे आमातिसार, बस्तिशूल ये शांत होते हैं ॥ ३८ ॥ गूगल, लहसन, हींग, सोंठ,
इनका काथ बना पीनेसे आमवातका नाश होता है ॥ ३९ ॥ अजमोद, वच, कूठ, सोंठ,
मिरच, पीपल, कचूर, त्रिफला, भारंगी, पोहकरमूल, लवणाष्टक ८ नमक ॥ ४० ॥ दोनों
जीरे, वायविडंग, धनियां दो भाग, देवदार, बेलगिरी, पाषाणभेद, लोध, कुडाकी छाल, वांसा
॥ ४१ ॥ धायके फूल, सालवनकी छाल, अनारदाना इनको समान भाग ले बारीक चूर्ण
बना लेवे ॥ ४२ ॥ पीछे घृतमें मिला खानेसे आमवातका नाश होता है और हींग, कांजी
इनके संग पीनेसे बस्तिशूलकी पीडाका नाश होता है ॥ ४३ ॥ और गरम जलके संग
पीनेसे आमवातका नाश होता है और गृध्रसीवात, कटिशूल इन रोगोंमें दशमूलके काथके
संग पीवे ॥ ४४ ॥ और मलका बन्धा, दारुण शोजा इनमें अरंडीके तैलके संग पीवे, पांडु-
रोगमें गुडके संग और पेटके गोलेमें गोमूत्रके संग पीवे ॥ ४५ ॥ प्रमेहमें शहदके संग,
राजयक्ष्मारोगमें खांडके संग पीवे । यह चूर्ण इस प्रकार यथायोगके संग देनेसे संपूर्ण घोर वात-
रोगोंको नाशता है ॥ ४६ ॥