सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 397, कुल 548 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 397

अ० २१] भाषाटीकासमेता । ( ३६५ )
तम् ॥ सर्वाङ्गे चामवाते हि श्रेष्ठमेतद्विरेचनम् ॥३१॥ नागरस्य
भागमेकं द्वौ भागौ क्रिमिजस्य तु ॥ त्रिवृद्भागत्रयं क्षिप्त्वा चूर्णं
गुडसमं वटम् ॥ ३२ ॥ भक्षयेत्तथोष्णतोयेन पुनश्चोष्णं पयः
पिबेत् ॥ एतेन जायते वामे विरेकः सुखकारकः ॥ ३३ ॥
विडङ्गशुण्ठी रास्ना च पथ्या त्रिकटुकान्विता॥ क्वाथमष्टावशेषं
च कारयेद्भिषजांवरः ॥३४॥ दुग्धं क्वाथार्द्धकं तैलं तथैवैरण्डजं
क्षिपेत् ॥ कर्षमात्रं सुपातव्यो विरेकश्चानुपानतः॥३५॥गुडूची
त्रिफला पथ्या गुडेन सह भक्षयेत्॥विरेको ह्यामवातेषु श्रेष्ठमे-
तत्सुखावहम् ॥ ३६ ॥
आमवातमें पीपल, दशमूल इनका क्वाथ बना पीना हित है और गिलोय, सोंठ इनके चूर्णमें
गुड़ मिला खाना ॥ २४ ॥ तथा धनियां, सोंठ, अमलतास, देवदार, हरडै इनका चूर्ण आम-
वातमें पाचन है और सुखको करनेवाला है ॥२५॥ पीपलोंके चूर्णको गरम जलके संग पीनेसे
आमवात, मंदाग्नि, शूल, गुल्म इनका नाश होता है ॥ २६ ॥ और २५६ तोले खरेहटीका
क्वाथ, दही, तक्र इनको २५६ तोले लेवे कुलथीका यूष २५६ तोले, कांजी २५६ तोले
॥ २७ ॥ इनको एक जगह मिलाके पकावे और इन आगे कही औषधोंको गेरे । सौंफ,देवदार,
पीपल,गजपीपल॥ २८॥ त्रिसुगंधि अर्थात् दालचीनी,तेजपात, इलायची,मुरामांसी,कूठ, दशमूल
इनका चूर्ण गेरे पीछे सिद्ध हो जावे तब उतार लेवे॥२९॥यह पीनेमें और निरूहवस्तिमें उदरके-
भीतर युक्त करना चाहिये । यह संपूर्ण वातररोगोंको नाशता है,श्रेष्ठ है,गुणको देनेवाला है ॥३०॥
और अरंडीके तेलको गुड़ तथा दूधके संग पीवे।सर्वांगवातमें और आमवातमें यह जुलाब श्रेष्ठ है
॥ ३१ ॥ और सोंठ एक भाग, अगर दो भाग, निशोत तीन भाग इन सबोंके समान गुड़ मिला
गोली बांध लेवे ॥ ३२ ॥ पीछे गरम जलके संग भक्षण करे और ऊपरसे गरम दूध पीवे इससे
आमवातमें सुखका करनेवाला जुलाब होता है ॥ ३३ ॥ और वायविडंग, सोंठ, रास्ना, हरडै
इनको जलमें चढ़ा अष्टमांश बाकी रहे तबतक क्वाथ बनावे ॥ ३४ ॥ पीछे क्वाथसे आधा दूध
और अरंडीका तैल मिलावे पीछे यह एक तोला प्रमाण पीना चाहिये । इसमें जुलाबका अनुपान
करे ॥ ३५ ॥ गिलोय, त्रिफला, हरडै इनको गुड़के संग भक्षण करे । यह जुलाब आमवातमें
हित है, सुखको करनेवाली है ॥ ३६ ॥
अथ आमवातरोगको शमन करनेवाली औषध ।
अभया मस्तुना पिष्टा मधुशर्करयान्विता ॥आमातिसारं स्त-
म्भेत्तु गुडामलकमेव च ॥३७॥ वत्सकं जीरके द्वे च दध्ना पिष्टं