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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 268, कुल 548 में से

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पृष्ठ 268

( २३६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
बाह्ययूकाः प्रसिद्धाः स्युराभ्यन्तराश्च किञ्चुकाः ॥ १ ॥ सप्त-
विधो भवेद्वाह्यः षड्विधोऽन्तःसमुद्भवः ॥ तेषां वक्ष्यामि सम्भू-
तिं बाह्याभ्यन्तरे नृणाम् ॥ २ ॥
आत्रेयजी कहते हैं-बाह्य और आभ्यंतरभेदसे कृमि दो प्रकारके कहे हैं। जूमआदि
बाह्यकृमि कहाते हैं, चुन्नाआदि आभ्यंतर कृमि कहाते हैं ॥ १ ॥ बाह्यकृमि सात प्रकारके हैं,
आभ्यंतर कृमि छःप्रकारके हैं, अब उनकी उत्पत्तिकों कहता हूं ॥ २ ॥
अथ जूमकी उत्पत्ति ।
रौक्ष्यादतिमलात्स्वेदाच्चिन्तया शोचनादपि ॥ कफधातुसमुद्भू-
तास्तीक्ष्णा यूका भवन्ति हि ॥ ३ ॥ यूकाः कृष्णाः पराः
श्वेतास्तृतीया चर्मणि स्थिता ॥ सूक्ष्मातिविकटा रूक्षा
चर्मभा चर्मयूकिका ॥ ४ ॥ चतुर्थी बिन्दु की नाम वर्चुला
मूत्रसम्भवा ॥ पञ्चमी मत्कुणा स्याच्च बाह्योपद्रवकारिणी ॥ ५ ॥
यूकामस्तकसंस्थाने श्वेता शिरोनिवासिनी ॥ चर्मयूका नेत्रचर्मे
सूक्ष्मे रोमणि यष्टिका ॥ ६ ॥
रौक्ष्यसे, अत्यंत मलसे, पसीनासे, चिंता और शोचसे, कफ और धातु करके उपजी हुई तीक्ष्ण
जूम होती हैं ॥ ३ ॥ पहली कृष्णा, दूसरी श्वेता और तीसरी चर्ममें स्थित, सूक्ष्म,
अतिविकट, रूखी, चर्मसरीखी कांतिवाली होती है ॥ ४ ॥ चर्मयूकिकानामवाली चौथी
और बिंदुकी नामवाली पांचमी है और मूत्रसे उपजी वर्तुलकानामवाली छठी है और शरीरके
बाहर उपद्रव करनेवाली मत्कुणा सातमी है ॥ ५ ॥ मस्तकके स्थानमें यूका जूम होती है
और सूक्ष्मरोमोंमें भी जूम होती है और नेत्रके चाममें चर्मयूका जूम होती है (इसे कुटकी कहते
हैं) और सूक्ष्मरोमोंमें चर्ममें भी जूम होती है। उसे यष्टिका कहते हैं ॥ ६ ॥
अथ कृमि उत्पन्न होनेका कारण ।
रूक्षान्नगोधूमयवान्नपिष्टैर्गुडेन वा क्षीरविपर्य्ययेण ॥ दिवाशया-
नेन सपिच्छलेन घर्मेण तापोदकसेवनेन ॥ ७ ॥ संजायते तेन
मलाशयेषु क्रिमिव्रजं कोष्ठविकारकारि ॥ ८ ॥
रूखा अन्न, गेहूँ, जब, पीठी, गुड़, दूधका पदार्थ, दिनका सोना, कफकारी पदार्थ, घाम और
गरमपानीके सेवनेसे ॥ ७ ॥ मलाशयमें कृमियोंका समूह उपजता है। यह कोष्ठमें विकारको
करता है ॥ ८ ॥