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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 267

अ० ५ ] भाषाटीकासमेता । ( २३५ )
अथ विषूचिकापर हरीतक्यादि अञ्जन ।
फलत्रयं त्र्यूषणकरञ्जबीजं रसं तथा दाडिममातुलुंग्यः ॥
निशायुतं पेष्यकृता च वर्त्तिस्तदञ्जने हन्ति विषूचिकां च॥३५॥
हरडा, बहेड़ा, आंवला, सोंठ, मिर्च, पीपल, करंजुआके बीज, अनार, बिजौराका रस और
हलदी, इनको पीस बत्ती बना नेत्रोंमें आंजे । यह विषूचिका (हैजा) को हरता है ॥ ३५ ॥
अथ रास्नादि भक्षण ।
रास्ना विशाला च सुराब्दशिग्रुकुष्ठं वचा नागरकं शताह्वम् ॥
आग्नेयपिष्टाहपुषाविदार्य्यः खल्लीं विषूचीं च निवारयन्ति ३६॥
रास्ना, इन्द्रायण, देवदारु, नागरमोथा, सहिंजना, कूट, वच, सोंठ, शतावरी, हाउबेर,
विदारीकन्द इन सबोंको चीताके रसमें पीस खानेसे खल्लीरोग और विषूचिका (हैजा) दूर
होती है ॥ ३६ ॥
अथ स्वेदका उपयोग ।
स्वेदो विधेयो घटकस्य बाष्पमेकैर्घटाभिर्वसनेन चोष्णः ॥
तथोष्णपाणिं प्रतिसेक एवं जयेद्विषूचीं जठरामयानाम् ॥३७॥
कलशेमें अग्निको छोड़कर उसकी भापोंसे अथवा गरम किये वस्त्रसे अथवा गरम किये हाथसे
पसीना देवे तो विषूचिका (हैजा) और पेटका रोग दूर होता है ॥ ३७ ॥
अथ गन्धकादिभक्षण ।
गन्धकं सैन्धवं त्र्यूषं निम्बूरसविमर्दितम्॥आतुरो भक्षयेच्छीघ्रं
विषूचीनां निवारणम् ॥ ३८ ॥ इति आत्रेयभाषिते हारीतोत्तरे
तृतीयस्थाने गुल्मचिकित्सा नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
गन्धक, सेंधानमक, सोंठ, मिर्च, पीपल इनको नींबूके रसमें खरलकर प्रमाणसे रोगी खावें
यह विषूचिका (हैजा) को जल्दी दूर करता है ॥ ३८ ॥ इति वेरीनिवासिबुधशिवसहा-
यसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने गुल्मचिकित्सा नाम
चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
पञ्चमोऽध्यायः ५.
अथ कृमिरोगके प्रकार और उन्होंकें भेद ।
आत्रेय उवाच॥ क्रिमयो द्विविधाः प्रोक्ता बाह्याभ्यन्तरसम्भवाः॥
Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu