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सर्वकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 269

अ० ५ ] भाषाटीकासमेता । ( २३७ )
अथ छः प्रकारके अंतर्गत कृमि ।
षड्विधास्ते समुद्दिष्टास्तेषां वक्ष्यामि लक्षणम्॥ कफकोष्ठे मला-
धाराः विसर्पन्ति सुसर्पवत्॥९॥ पृथुमुण्डा भवन्त्येके केचित्कि-
ञ्चुकसन्निभाः॥ धान्याङ्कुरनिभाः केचित्केचित्सूक्ष्मास्तथाणवः
॥१०॥ सूचीमुखाः परिज्ञेयाश्चान्त्राणि सीदयन्ति ते॥ वक्ष्यामि
लक्षणं तेषां चिकित्साञ्च शृणुष्व मे ॥ ११ ॥
जो छः प्रकारके बाह्यकृमि कहे हैं उनके लक्षणोंको कहता हूं, मलके आधारवाले कफके
कोष्ठमें कृमि सर्पकी तरह चलते हैं ॥ ९ ॥ कितनेक पृथुमुंडनामसे विख्यात हैं और
कितनेक केंचुवोंके समान कांतिवाले होते हैं, कितनेक अन्नके अंकुरके समान कांतिवाले
होते हैं, कितनेक सूक्ष्म होते हैं, कितनेक अत्यंत सूक्ष्म होते हैं ॥ १० ॥ कितनेक
सूचीमुख नामसे विख्यात हैं ये आंत्रोंको शिथिल करते हैं, उनके लक्षण और चिकित्साको
कहता हूं सुनो ॥ ११ ॥
अथ कृमिरोगका लक्षण ।
ज्वरो हृद्रोगशूलं वा वमिहृत्क्लेदनं भ्रमः ॥ रुचिबन्धो विवर्णत्व-
मतीसारः सफेनिलः॥१२॥ गर्जनं जठरे चैव मन्दाग्नित्वं च
जायते॥ पिपासा पीतता नेत्रे किञ्चुकैः पीडितस्य च ॥१३॥
ज्वर हो, हृदयरोग, शूल, छर्दि, हृदयमें ग्लानि, भ्रम ये उपजें और रुचिबंध हो जावे, वर्ण
बदल जावे, झागोंवाले मलसे सहित अतिसार उपजे ॥ १२ ॥ पेटमें शब्द होवे, मंदाग्नि
उपजे और अत्यंत तृषा होवे और नेत्रोंमें पीलापन हो ये सब लक्षण हों तब समझना कि
पेटमें केंचुवे हो गये ॥ १३ ॥
अथ सूचीमुखकृमिका लक्षण ।
सूचीवत्तुद्यतेऽन्त्राणि रक्तं चैवातिसार्यते ॥ यकृद्वा भक्षय-
न्त्यन्ये रक्तं वा वमते भृशम् ॥१४॥ क्लेदो मुखेऽरुचिर्जाड्यं
मन्दाग्नित्वं च वेपथुः ॥ क्षुत्तृष्णा च ज्वरो ज्ञेयाः सूचीमुख-
कृमीरुजः ॥ १५ ॥
सूईकी तरह आंत्रोंको पीडित करे और रक्तको अत्यंत गुदाके द्वारा निकाले और यकृत्
स्थानको भक्षण करे और रक्तकी अत्यंत छर्दि आवे ॥ १४ ॥ मुखमें ग्लानि हो, अरुचि और
जड़पना उपजे ।मंदाग्नि और कंप उपजे और भूख,तृषा,ज्वर ये भी उपजें ये सब लक्षण हों तब
सूचीमुखकृमिरोगके लक्षण जानिये ॥ १५ ॥