हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ३ ] भाषाटीकासमेता । (२१७)
तस्यादौ लङ्घनं चैकमल्पे वा नैव लंघनम्॥ तस्माद्देयं कषायं
तु पानभोजनमेव च ॥ ३२ ॥
झागोंसे मिलाहुआ गाढा और रूखा मल उतरे और थोड़ा वारवार आमसहित आवे और
दिशाजानेके समय शब्द और शूलको उपजावे और शरीर आदि कृष्णवर्ण होजावे उसको
वातातीसार कहते हैं ॥ ३१ ॥ उसके आदिमें एक लंघन करना और अल्पस्वरूप वाताति-
सारमें लंघन नहीं करना उससे क्वाथ, पान, भोजन ये देने चाहिये ॥ ३२ ॥
अतिसारका पाचक कल्क ।
उदीच्यधान्यस्य जलेन कल्कं पाने हितं पाचयेतेऽतिसारम्॥
तृष्णापहं दाहविनाशनञ्च सशूलहिक्कासु विनाशनं स्यात्३३॥
नेत्रवाला, धनियां इनको पानीमें पीस कल्क बना खानेसे अतिसारको पकाता है और
तृषा, दाह, शूल, हिचकी इनको नाशता है ॥ ३३ ॥
वालकादि कल्क ।
वालकद्वयमोचहरीतकीपर्पटेन सहितं जलेन च ॥ क्वाथपान-
मिदमेवातिसारे नाशमाशु कुरुते च विट्छान्तिम् ॥ ३४ ॥
नेत्रवाला, खश, मोचरस, हरड़े, पित्तपापड़ा, इनका पानीमें क्वाथ बना अतीसार रोगी
पीवे । यह विष्ठाको शांत करता है ॥ ३४ ॥
शालिपर्ण्यादिपानक ।
शालिपर्णी पृश्निपर्णी बृहती कण्टकारिका॥बालाश्वदंष्ट्रा बिल्वा-
नि पाठा नागरधान्यकम् ॥३५॥एतदाहारसंयोगे हितं सर्वा-
तिसारिणाम् ॥
शालवन, पिठवन, बडी कटेहली, छोटी कटेहली, नेत्रवाला, गोखरू, बेलगिरी, श्योनापाठा,
-सोंठ, धनियां ॥ ३५ ॥ यह द्रव्य भोजनके संयोगमें अतीसार रोगियोंको हित हैं ॥
तिंदुकादिरसपानक ।
तिन्दुकत्वचमाहृत्य काश्मरीपत्रवेष्टिताम्॥३६॥मृदा विलिप्य
विधिवद्दहेन्मृद्वग्निना भिषक् ॥ रसं गृहीत्वा मधुसंयुक्तं पानं
सर्वातिसारघ्नञ्च ॥ ३७ ॥
और तेंदूआवृक्षकी छालको ले कंभारीके पत्तोंसे वेष्टित करे ॥ ३६॥ पीछे माटीसे विधिपू-
र्वक लीपा कोमल अग्निसे दग्ध करे पीछे रस निकाल शहदसे संयुक्त कर पीवे यह सबप्रकारके
अतीसारोंको नाशता है ॥ ३७ ॥
Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu