हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 250, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें( २१८ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
कुटजपुटपाक ।
तुलामथार्द्रागिरिमल्लिकायाः संकुट्य कर्षञ्च समादधीत॥ तस्मि-
न्सपूते पलसंसितञ्च देयञ्च पिष्ट्वा सह शाल्मलेन॥ ३८॥ पाठा
समङ्गातिविषा समुस्ता बिल्वञ्च पुष्पाणि च धातकीनाम् ॥
प्रक्षिप्य भूयो विपचेच्च तावद्दर्वीप्रलेपः स्वरसस्तु यावत्॥ ३९॥
पीतस्त्वसौ कालविदा जलेन मण्डेन वाजापयसाऽथवापि ॥
निहन्ति सर्वमतिसारमुग्रं कृष्णं सितं लोहितपीतकञ्च ॥४०॥
दोषं ग्रहण्यां विविधं च रक्तपित्तं तथार्शांसि सशोणितानि ॥
असृग्दरं चैवमसाध्यरूपं निहन्त्यवश्यं कुटजाष्टकोऽयम्॥४१॥
कूड़ाकी गीली छालको ४०० तोलेभर ले और कूट पानीमें अग्निपै पकावे जब चौथाई-
भाग शेष रहे तब वस्त्रमें छान फिर अग्निपै धर मोचरस ॥ ३८ ॥ श्योनापाठा, मँजीठ,
अतीरा, नागरमोथा, बेलगिरी, धवके फूल, ये सब चार-चार तोले भर ले पूर्वोक्तमें मिलाके
पकावे जब कड़छीपै चिपने लगे और स्वरस ही हो तब उतारै ॥ ३९ ॥ पीछे कालको
जाननेवाले रोगीने मंड, बकरीका दूध, इनके संग पीनी । यह-कृष्ण, सफेद, लाल,
पीला, ऐसे वर्णके सब अतिसारोंको नाशता है ॥ ४० ॥ और ग्रहणी दोष, अनेक प्रकारकी
रक्तकी बवासीर और असाध्यरूप प्रदर रोग इनको निश्चय हरता है । इसको 'कुटजाष्टक'
कहते हैं ॥ ४१ ॥
अथ पित्तातिसारका लक्षण और चिकित्सा ।
घर्मेण चोष्णान्नविभोजनेन घर्मेण तप्तोदकसेवनेन ॥ शोकेन
तापेन रुषा कटुत्वे क्षारेण पित्तासृक्सारकः स्यात्॥४२॥तेनारुणं
पीतमथातिनीलं दुर्गन्धशोषज्वरपाण्डुयुक्तम् ॥ भ्रमारर्त्तिमूर्च्छा
च तृषाङ्गदाहः पित्तातिसारस्य च लक्षणानि ॥ ४३ ॥
घामसे और गरम अन्नके भोजनसे और घामसे तप्तहुए जलके सेवनेसे शोक और तापसे
क्रोधसे कडुआ और क्षाररस सेवनेसे पित्तातिसार उपजता है ॥ ४२ ॥ लाल, पीला,
अत्यंतनीला, ऐसा मल उतरे और दुर्गंध, शोष, ज्वर, पांडुरोग, भ्रम, मूर्च्छा, तृषा, ये उपजें
और अंगोंमें दाह हो उसको पित्तातीसार जानिये ॥ ४३ ॥
१ यही हा० सं० पृ० २२२ में कुटजाष्टकके नामसे है। वहां “संकुट्य पत्त्वा रसमाददीत” का
पाठभेद है ।