हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २१६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
जामुन, बड़, गूलर, पकरिया, नागकेशर, कमल, जाठी, मोथा, तृण, आंब, नागरमोथा,
जीवंती इन्होंने फूलोंको सबकालमें लेवे ॥ २४ ॥ पीछे १२८ तोले पानीमें पकावे । जब
चौथाईभाग शेष रहे तब छानके फिर कढ़ाईमें घालि फिर पकावे जब कड़छीपर चेपनेलगे ॥
॥ २५ ॥ तब उतार उत्तमवैद्यको निश्चय शहद मिला रोगीको देना चाहिये यह अतिसारको
हरता है ॥ २६ ॥
काकमाचीका प्रयोग ।
हारीतेन तथा प्रोक्ता काकमाची सुपूजिता ॥
आलोक्यानेकशास्त्राणि आत्रेयेणापि पूजिता ॥ २७ ॥
जैसे अनेक शास्त्रोंको देख आत्रेयजीने काकमाची अर्थात् भोलणीनामसे प्रसिद्ध मकोह-
विशेष ओषधी पूजित की है तैसे ही हारीतने भी यही ओषधी पूजी है अर्थात् अतिसारमें श्रेष्ठ
समझी है ॥ २७ ॥
जंबृत्वगादिका अवलेह ।
जम्बूत्वचं वत्सकवल्कलं च निष्क्वाथ्य नूनं सलिले समीरणम्॥
चतुर्विभागेष्वपि शोषितेषु उत्तार्य्य वस्त्रेष्वथ गालयेच्च ॥ २८ ॥
पुनः कटाहै विपचेच्च सम्यग्दार्वांप्रलेपः स्वरसस्तु यावत् ॥
उत्तार्य्य शीते मधुना विमिश्रं लीढं हरेदप्यतिसारमुग्रम् ॥२९॥
जामनकी छल, कुड़ाकी छाल, इनका पानीमें क्वाथ बना जब चौथाई भाग शेष रहे तब
उतारि वस्त्रसे ॥ २८ ॥ छान फिर कड़ाहीमें घाल अच्छीतरह पकावे । जब कड़छीपै चिपकने
लगे और स्वरसरूप रहे तब अग्निसे उतार शीतलकर शहद मिला चाटे । यह दारुण
अतीसारको हरता है ॥ २९ ॥
अतिसारका पूर्वरूप ।
कुक्षौ दरे वक्षसि नाभिदेशे पायुप्रदेशे सततं निरुद्धे ॥
वातस्य रोधश्च शकृद्विभङ्गो भवन्ति सर्वेष्वतिसारकेषु॥३०॥
सर्व अतिसाररोगमें कुक्षि,उदर, छाति,नाभिदेश,गुदामण्डल, ये सब स्थान रुकंकर अधोवा-
युका रोध और विष्ठाका भंग होता है ॥ ३० ॥
अथ वातातिसारका लक्षण और चिकित्सा ।
सफेनिलं पिच्छलमेव रूक्षमल्पं शकृदामसशब्दशूलम् ॥कृष्णं
भवेद्गात्रविचेष्टनञ्च वातातिसारे प्रवदन्ति तज्ज्ञाः ॥ ३१ ॥