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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 247

अ० ३ ] भाषाटीकासमेता ( २१५ )
मूल्पतिसामान्या योज्या पित्ते कनीयसी ॥ महती पञ्चमूली तु
वातश्लेष्मज्वरे हिता ॥ १९ ॥
पञ्चमूल, खरैहंटी, बेलगिरी, गिलोय, नागरमोथा, सोंठ, श्योनापाठा, चिरायता, नेत्रवाला, कूड़े-
की छाल, इन्द्रजव इन्होंका क्वाथ ॥ १७ ॥ सबप्रकारके अतीसार, छर्दि, श्वास्ररोग, ज्वर
शूल, इन्होंको नाशता है ॥ १८ ॥ पित्तदोषमें लघुपञ्चमूल वर्तना। वात और कफदोषमें बृहत्प-
ञ्चमूल वर्तना ॥ १९ ॥
अथ उत्पलादिपाचन ।
उत्पलं दाडिमत्वक्च केशरं तथा मधु पद्मकम् ॥
धात्री पिष्टा तण्डुलतोयैः पाचनं ज्वरातिसारघ्नम् ॥ २०॥
नीला कमल, अनारकी छाल, केशर, कमल, मौरेठी आंवला इन्होंको चावलोंके पानीसे पीस
शहद मिला पीवे । यह पाचन ज्वरातिसारको नाशता है ॥२० ॥
अथ उशीरादि क्वाथ ।
उशीरं धान्यकं मुस्तं सबिल्वं बालकं बला ॥ तथा च धातकी-
पुष्पं कषायस्य प्रशस्यते ॥२१ ॥ ज्वरातिसारशमनं सहशो-
णितपैत्तिकम् ॥निहन्ति शोफं सकलं रुचिप्रदविपाचनम्॥२२॥
खश, धनियां, नागरमोथा, बेलगिरी, नेत्रवाला, खरैहंटी, धवके फूल इन्होंका क्वाथ श्रेष्ठ है
॥ २१ ॥ ज्वरातिसार, रक्तातिसार, पित्तातिसार, सब प्रकारका शोजा इन्होंको शांत करता है
और रुचिको देता है और पाचन है ॥ २२ ॥
विगतामातिसारं चिरोत्थितं रक्तसहितमतिवृद्धम्॥
मधुना सहितः शमयत्यरलुः पुटपाकनिर्यासितः॥२३॥
श्योनापाठाको पुटपाककी विधिसे पकाके रसको निचोड़ उसमें शहद मिला पीवे यह
पक्कातिसार और पुराना अतीसार और बढे हुए रक्तातिसारको भी नाशता है ॥ २३ ॥
जम्ब्वादिस्रवरस ।
जम्बूवटोदुम्बरप्लक्षको हि नागश्च प्रपौण्डरिकं शमी च॥गुन्द्रः
सचूतोऽम्बुदजीविकाया आसां हि पुत्रञ्च सदा विदध्यात्२४॥
प्रस्थद्वयेन प्रपिबेद्वि तावद्यावद्विशेषांशमिदं प्रजायते ॥पुनः
कटाहे विपचेच्च सम्यग्दार्वाप्रलेपः स्वरसश्च यावत् ॥ २५ ॥
उत्तार्य नूनं भिषगुत्तमेन क्षौद्रेण मिश्रं हरतेऽतिसारम्॥२६॥
Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu