हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २१४ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
॥ ११ ॥ पीछे उसमें धानकी खीलोंका मड बना शीतल कर पीवे । यह ज्वरातीसारको शांत
करता है और जठराग्निको बल देता है ॥ १२ ॥
अथ शुण्ठ्यादि क्वाथ ।
शुण्ठीविषातलधरामृतवत्सकानां तिक्ताह्वयं कनकशीतलकः
कषायः ॥ पाने विधेयमधुना प्रतिसाधितस्तु ज्वरातिसारशम-
नाय सदा प्रदेयः ॥ १३ ॥
सोंठ, अतीस, कलौंजी, जीरा, गिलोय, इन्द्रजव, कुटकी, पीला कमल, चन्दन इन्होंका काथ
पीना । यह सब कालमें ज्वरातीसारको नाशता है ॥ १३ ॥
अथ पाठादि क्वाथ ।
पाठेन्द्रभूनिम्बघनामृतानां सपर्पटः क्वाथ इह प्रशस्तः ॥
आमातिसारं च जयेद्द्रुतं वा ज्वरेण युक्तं सहजं च तीव्रम् ॥ १४ ॥
श्योनापाठा, इन्द्रजव, चिरायता, नागरमोथा, गिलोय, पित्तपापडा, इन्होंका काथ आमाती-
सारको और ज्वरातीसारको जीतता है इसवास्ते श्रेष्ठ है ॥ १४ ॥
अथ शुंठादि पाचन ।
शुण्ठी बालकमुस्ता बिल्वं पाठा विषा च धान्यानि ॥
पाचनमरुचौ छर्दिज्वरातिसारं विनाशयति ॥ १५ ॥
सोंठ, नेत्रवाला, नागरमोथा, बेलगिरी, श्योनापाठा, अतीस, धनियां इन्होंका काथ पाचन है ।
अरुचि, छर्दि और ज्वरातीसारको नाशता है ॥ १५ ॥
अथ वत्सकादि क्वाथ ।
वत्सकश्च सुरदारुरोहिणीधान्यबिल्वमगधात्रिकण्टकम् ॥
निम्बबीजगजपिप्पलीवृकीक्वाथ एवमतिसारभेषजम् ॥ १६ ॥
इन्द्रजव, देवदार, हरडं, धनियां, बेलगिरी, पीपल, गोखुरू, गल्ला, गजपीपल, काश्मीरी पाठा
इन्होंका काथ अतिसारमें अति उत्तम औषध है ॥ १६ ॥
अथ पञ्चमूली क्वाथ ।
पञ्चमूलीबलाबिल्वगुडूचीमुस्तनागरैः ॥ पाठाभूनिम्बह्रीबेरकुट-
जत्वक्फलैर्भृतः ॥ १७॥ इति सर्वानतीसारान्वमिश्र्वासज्वरार्द्दि-
तान् ॥ सशूलोपद्रवांश्चासौ हन्याच्चासुरदारुणम् ॥ १८ ॥ पञ्च-