हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 239, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० २ ] भाषाटीकासमेता । ( २०७ )
वानरेन्द्रमुखं दिव्यं तरुणादित्यतेजसम् ॥ ज्वरमेकाहिकं घोरं
तत्क्षणादेव नश्यति ॥ २१७ ॥
तुलसीकी जड़को शुभदिनमें लाके हाथपर बांधे तब वेलाज्वर और भूतज्वरआदि नाशको
प्राप्त होते हैं ॥ २०९ ॥ नागरमोथा, गिलोय, आंवला, सूंठ, कटेली इनका क्वाथ
पीपलका चूर्ण और शहद मिला पीवे ॥ २१० ॥ इससे एकाहिकज्वर, वेलाआदिज्वर दूर
होता है ॥ २११ ॥ लहसनके बीजोंको निकास और रात्रिमें टुकड़े बना तक्रके बीचमें
स्थापित कर पीछे प्रभातमें घृतसे संयुक्त कर ॥ २१२ ॥ सेवे । यह वेलाआदि और देहके
धातुगत आदि ज्वरोंको नाशता है ॥ २१३ ॥ वर्द्धमान पीपल, दूध, रसायन औषध,
इनको पीवे और सूंठ, सफेद लहसन, धनियां, चंदन, नेत्रवाला इनको अलग अलग सेवे ये
विषमज्वरको नाशते हैं ॥ २१४ ॥ गिलोयका रस तृतीयकज्वरको नाशता है, ऊंगाकी जड़को
अथवा नीलकी जड़को ॥ २१५ ॥ शिरके प्रमाण लालसूत्रमें बांध पीछे वामे कानमें और
कटीपर बांधनेसे तृतीयकज्वरका नाश होता है ॥ २१६ ॥ तरुणसूर्यके तेजके समान तेजवाला
सुग्रीव नामक वानरोंका राजा उसके दिव्यमुखको देख घोररूपी एकाहिकज्वर शीघ्र नष्ट
होजाता है ॥ २१७ ॥
अथ ज्वरनाशक हनुमान्का पूजन।
वानराकृतिमालिख्य खटिकायाः पुनः शृणु ॥
गन्धपुष्पाक्षतैर्धूपैरर्चयन्ति भिषग्वराः ॥ २१८ ॥
खड़ियासे वानरकी आकृतिको लिख गंध, पुष्प, चावलोंके अक्षत इनसे ज्वर हटानेके लिये
वैद्यवर पूजा करते हैं ॥ २१८ ॥
अथ ज्वरनाशक मन्त्र ।
ओं ह्रां ह्रीं क्लीं सुग्रीवाय महाबलपराक्रमाय सूर्य्यपुत्रायामितत-
जसे ऐकाहिकद्वयाहिकत्र्याहिकचातुर्थिकमहाज्वरभूतज्वरभय-
ज्वरक्रोधज्वरवेलाज्वरप्रभृतिज्वराणां दह दह पच पच अवत
अवत वानरराज ज्वराणां बन्ध बन्ध ह्रां ह्रीं हूं फट् स्वाहा ।
नास्ति ज्वरः । ज्वरापगमनसमर्थज्वरस्त्रास्यते ॥ २१९॥
( मंत्र ) “ओंह्रांह्रींक्लीं सुग्रीवाय महाबलपराक्रमाय सूर्य्यपुत्रायामिततेजसे ऐकाहिकद्व्याहिक-
त्र्याहिक चातुर्थिक महाज्वर भूतज्वर भयज्वर क्रोधज्वरवेलाप्रभृतिज्वराणां दहदह पचपच अवत
अवत वानरराज ज्वराणां बंधबंध ह्रांह्रींहूं फट्स्वाहा । नास्ति ज्वरः । ज्वरापगमनसमर्थज्वर-
स्त्रास्यते” इसमंत्रसे विषमज्वर दूर होजाता है ॥ २१९ ॥