हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 240, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें(२०८) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
अथ चार वर्णवाले ज्वरोंके चिह्न ।
पुनश्चात्र प्रवक्ष्यामि ज्वराणां रूपलक्षणम् ॥ २२० ॥
ज्वरोंके रूप और लक्षणको फिर कहता हूं ॥ २२० ॥
अथ ब्राह्मणज्वर ।
संतप्तकाञ्चनाभासो हुताशनसमप्रभः ॥
उद्दीनयज्ञोपवीती च रौद्रो ब्राह्मणरूपकः ॥ २२१ ॥
अच्छी तरह तपाये हुए सोनाके समान कांतिवाला, अग्निके समान प्रकाशित
और भयंकर यज्ञोपवीत अर्थात् जनेऊवाला ऐसा रौद्रसंज्ञक ब्राह्मणवर्णवाला ज्वर होता है ॥ २२१ ॥
अथ क्षत्रियज्वर ।
जपाकुसुमसदृशाशो रौद्रदंष्ट्रान्वितस्तथा ॥
खड्गहस्तो महारौद्रो माहेन्द्रः क्षत्रियो मतः ॥२२२॥
जपाके फूलके समान प्रकाशवाला, भयंकर डाढ़ोंसे अन्वित और तलवारको हाथमें
लिये हुए और महादारुण ऐसा माहेंद्रसंज्ञक ज्वर क्षत्रियवर्णवाला होता है ॥ २२२ ॥
अथ वैश्य ज्वर ।
पञ्चकप्रसवाभासतप्तकाञ्चनभूषितः ॥
दण्डहस्तो मध्यवेगी वैश्यो ज्वरेश्वरो मतः ॥२२३ ॥
पांच प्रकारके फूलोंके समान आकृतिवाला और तपायेहुये सोनासे भूषित हुआ, दंडको हाथमें
लेनेवाला और मध्यमवेगवाला ऐसा ज्वरेश्वरसंज्ञक ज्वर वैश्यवर्णवाला कहाता है ॥ २२३ ॥
अथ शूद्र ज्वर ।
कृष्णमेघाञ्जनाकारस्तीक्ष्णदंष्ट्रोज्ज्वलाननः ॥
त्रिनेत्रो ज्वलनप्रभः कालः शूद्रो मतस्तथा ॥ २२४ ॥
काले मेघ और पर्वतके समान आकृतिवाला, तीक्ष्ण डाढ़ोंसे प्रकाशित मुखवाला,
तीन नेत्रोंवाला, अग्निके समान कांतिवाला और कालरूप ऐसा ज्वर शूद्रवर्णवाला
होता है ॥ २२४ ॥
अथ ब्राह्मणज्वरका लक्षण और शांति ।
तीक्ष्णवेगः क्षुधायुक्तः शुचिद्वेष्टा व्रतप्रियः॥ मूत्रञ्च किंशुका-
भासं पाठशीलोऽतिजल्पकः ॥ २२५॥ बहुश्वासी तृषाक्रान्तो