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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 197, कुल 548 में से

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पृष्ठ 197

अ० १ ] भाषाटीकासमेत। ( १६५ )
क्षुच्चापि श्रमश्चैव भिषग्वर ॥ २४ ॥ किञ्चित्संस्निग्धता
गात्रे रुचिबाधातिबन्धता॥मध्यपाकी च दोषः स्यान्मध्य-
लंघितलक्षणम् ॥ २५ ॥
कुछ ग्लानि रहे, रुचि भी अल्प हो, इन्द्रियोंका वर्ण बदल जावे, बहुत तृषा लगे और
भूख भी थोडी लगे. और परिश्रम उपजे ॥ २४॥और शरीरमें कुछ चिकनाईपना उपजे, रुचिकी
पीड़ा हो और बंधा पड़ जावे और दोष भी कुछ पके और कुछ नहीं पके ये मध्यलंघितके
लक्षण हैं ॥ २५ ॥ अथ अतिलंघितका लक्षण ।
वैकल्यं जायते तन्द्राविङ्भेदश्च विनिद्रता॥वेपथुश्च शिरोऽर्तिश्च
क्षुत्क्षामं शूलमेव च ॥२६ ॥ श्यामास्यं प्लावनं नेत्रे मूर्च्छामोह-
श्रमातुरम् ॥ अतिलंघितमेतैस्तु लक्षणं संविभावयेत् ॥२७ ॥
विकलपना, तंद्रा, विष्टाका पतलापन, ये उपजें और नींद आवे नहीं, शरीरमें कंपन और
शिरमें दर्द हो, अल्प भूख लगे और शूल उपजे ॥ २६ ॥ कालामुख हो जावे और नेत्रोंसे पानी
झिरे और मूर्छा, मोह, परिश्रम इन्होंसे पीडित हो ये सब लक्षण अतिलंघनके हैं ॥ २७ ॥
अथ लंघित करनेमें अयोग्य रोगी ।
वेलाज्वरे भूतज्वरे तथा पित्तज्वरेऽपि च॥आयासे क्रोधज वापि
भयकामज्वरेऽपि च ॥२८॥ एतेषां लंघनं नैव कारयेद्भिषगु-
त्तमः॥ २९ ॥ बालं वृद्धं कृशं क्षीणमतीसारव्रणातुरम्॥गुर्विणीं
सुकुमारञ्च लंघयेन्न कदाचन ॥ ३० ॥
वेलाज्वर (समय बांधकर आनेवाला), भूतज्वर, पित्तज्वर, परिश्रमका ज्वर, क्रोधज्वर, भयज्वर
और कामज्वर ॥२८॥ इनमें वैद्य लंघन नहीं करावे ॥ २९ ॥ बालक, वृद्ध, कृश, क्षीण, अती-
साररोगी, घावरोगी, गर्भवाली स्त्री, कोमल मनुष्य इनको कभी लंघन नहीं कराना ॥३०॥
अथ लंघन करनेयोग्य रोगी ।
सामे मन्दज्वरे तीव्रे रुचिविड्बन्धकेऽपि च ॥
अजीर्णे तु प्रशस्तञ्च लंघनं मात्रयान्वितम् ॥ ३१ ॥
आमसहित मंदज्वर, तीक्ष्णज्वर, अरुचि, विष्टाका बंधा, अजीर्ण इनमें भी मात्रासे लंघन
कराना श्रेष्ठ है ॥ ३१ ॥ अथ आमज्वरके लक्षण ।
स्निग्धत्वञ्चातिगात्राणामुदरं गर्जयेद्भृशम् ॥ शिरोऽर्तिर्जठरा-
ध्मानः प्रततं कण्ठकूजनम् ॥ ३२ ॥ अरुचिः पीतता मूत्रे
निद्रातन्द्रातुरं नरम् ॥ आमज्वरं च विज्ञाय लंघयेद्भिष-
गुत्तमः ॥ ३३ ॥