हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 198, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें( १६६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
शरीरके अंग अत्यंत चिकने हो जावे और पेट अत्यन्त बोले, शिरमें पीड़ा हो और पेटपै
अफारा उपजे और निरंतर कंठ जलता और बोलता रहे ॥३२॥ और अरुचि हो,नेत्रोंमें पीला-
पन उपजे,नींद और तंद्रासे रोगी पीडित होवे ये आमज्वरके लक्षण हैं । इस रोगवालेको कुशल
वैद्य लंघन करवावे ॥ ३३ ॥
अथ छःप्रकारके लंघन ।
अनशनवमनविरेचनरक्तस्रुतिंतप्ततोयपानैः ॥
स्वेदनकर्मसहितैः षड्विधं लंघनं गदितम् ॥ ३४ ॥
नहीं खाना,वमन,जुलाब,रक्तका निकालना,गरम पानीको पीना,स्वेद अर्थात् पसीनाका देना
इन भेदोंसे लंघन छः प्रकारका कहा है ॥ ३४ ॥
अथ विरतज्वरलक्षण ।
क्षुत्क्षामं श्रमशैथिल्यं भ्रमवेगज्वरातुरम् ॥
अन्तर्दाहं रक्तमूत्रं विरामज्वरलक्षणम् ॥ ३५ ॥
भूख थोड़ी लगे हलकापन हो,श्रमसे शिथिलपना हो और भ्रम,वेग, ज्वर इनसे रोगी पीड़ि-
त होवे और शरीरके भीतर दाह रहे और लाल मूत्र उतरे ये विरामज्वरके लक्षण हैं अर्थात् ये
लक्षण उपजें तब जानना कि, ज्वर उतरनेवाला है ॥ ३५ ॥
अथ दोषपरत्वसे लंघनकी मर्यादा ।
वातिको लंघनैः षड्भिः पैत्तिकस्तु दिनत्रयम् ॥ सप्तभिःपचते
श्लेष्मा दृष्ट्वा लंघनमाचरेत् ॥ ३६ ॥ त्रिदोषो दशरात्राणि पचते
लंघनैस्तु सः ॥ दिने पञ्चदशे प्राप्ते पचते सान्निपातिकः ॥३७॥
मुञ्चेद्वा आतुरं हन्ति भवेद्वा विषमज्वरः ॥
वातदोष छः लंघनोंसे पकता है,पित्तदोष तीन दिनमें पकता है,कफदोष सात लंघनोंसे पकता
है ऐसे देखके लंघनका आचरण करे ॥ ३६ ॥ त्रिदोष लंघनोंसे दशदिनकरके पकता है
और पंद्रहदिनोंकरके सन्निपातदोष पकता है ॥ ३७ ॥ इनकालोंमें ये दोष रोगीको छोड़ देते
हैं अथवा मारते हैं,किंवा विषमज्वरको उपजाते हैं ॥
अथ वयपरत्वसे दोषोंके कोपका प्रकार ।
बाल्ये रक्तमया दोषाः कफपित्तादनंतरम् ॥ ३८ ॥ षोडशे तु
समे प्राप्ते त्रिदोषप्रभवा गदाः ॥ पञ्चविंशतिमे प्राप्ते ज्वरो वै
सान्निपातिकः ॥ ३९ ॥
Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu