सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 196, कुल 548 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 196

( १६४ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
सो दोषको पाकके बलको जान पीछे पाचन देना चाहिये ॥ १७ ॥ निदानके लक्षणोंसे
युक्तहुएको जान पीछे संशमनक्रिया करनी ॥
अथ धातुगतदोषोंका पाचनकाल ।
सप्ताहेनापि पच्यन्ते सप्तधातुगता मलाः ॥१८॥ चिरादपि हि
पच्यन्ते सन्निपातज्वरे मलाः॥विरामश्चाप्यतः प्रोक्तो ज्वरः प्रा-
योऽष्टमेऽहनि ॥ भवेत्सप्तमेऽहनि विरामज्वरकारणम् ॥ १९ ॥
और सात धातुओंमें प्राप्त हुए दोष सात दिनोंमें पकजाते हैं ॥१८॥ किन्तु सन्निपात ज्वरम
मल देरसे भी पकते हैं । इसी लिये ज्वरका विराम आठवें दिन कहा गया है । सातवें दिन
ज्वरकी शांतिका कारण नहीं होता है ॥ १९ ॥
अथ अपक्कदोषमें औषधका निषेध ।
विचार्य भेषजं दद्यादजीर्णे मतिमान्भिषक् ॥
मन्दो हि सुतरामग्निर्भेषजं न विपाचयेत् ॥ २० ॥
तव विचार कर बुद्धिमान् वैद्य औषधको नवीनज्वरमें देवे क्योंकि, अतिमंदहुआ अग्नि औषधको
नहीं पकाता है अर्थात् नवीनज्वरमें औषध विना विचारे नहीं देना ॥ २० ॥
अथ लंघनका उपचार ।
सर्वेषु दोषसामेषु पाचनं लङ्घनं स्मृतम् ॥
सम्पूर्ण कच्चे दोषोंके पचानेवाला लंघन ही कहा गया है ॥
अथ लंघनप्रकरण ।
लङ्घितं मध्यलङ्घितं स्यादातिलङ्घितमेव च॥ २१ ॥
लक्षणं वक्ष्यते चैषां मनुष्याणां शृणुष्व हि ॥ २२ ॥
मनुष्योंके लंघन, मध्यलंघन, अतिलंघन इन भेदोंसे लंघन, तीन प्रकारका है ॥ २१ ॥ इन्होंके
लक्षण कहेजाते हैं वे मुझसे सुनो ॥२२ ॥
अथ शुद्धलंघितका लक्षण ।
गतक्लमोऽरुचिम्लानिरिन्द्रियाणां प्रसन्नता ॥
लङ्घने दोषपाकस्तु शुद्धलङ्घितलक्षणम् ॥ २३ ॥
ग्लानि जातीरही है, रुचि उपजे और इन्द्रियोंकी प्रसन्नता रहे और लंघनमें दोष पकजावे ये
शुद्धलंघनके लक्षण हैं ॥ २३ ॥
अथ मध्यमलंघितका लक्षण ।
किञ्चित्क्लमोऽरुचिग्लानिरिन्द्रियाणां विवर्णता ॥ बहुतृष्णालप-