हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ० १३ ] भाषाटीकासमेता । (७९)
क्षुद्र अन्नकी कांजी ग्लानिको और मूर्च्छाको शीघ्र हरती है, वातल है, पित्तको भी करती है
श्लीपदको और गुल्मको करती है और जुकाम आदिको कोपती है ॥६॥ इति वेरीनिवासि-
बुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां प्रथमस्थाने मंडवर्गो नाम
द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
त्रयोदशोऽध्यायः १३.
अथ यूषवर्ग।
प्रथम कुलथीके यूषका लक्षण ।
कुलत्थयूषो मधुरः कषायो भवेच्च रक्तस्य कफस्य हन्ता ॥
महाश्मरीपायुजमेदहन्ता सन्दीपनो मेहविशोषणश्च ॥ १ ॥
कुलथीका यूष मधुर है, कसैला है, रक्तसहित कफको नाशता है और पथरी, बवासीर,
मेद इनको नाशता है, अग्निको जगाता है और प्रमेहको शोषता है ॥ १ ॥
अथ हरडके यूषका गुण ।
भवेत्तुवर्या मधुरं च यूषं विशोषणं वातनिवारणं च ॥
श्लेष्मापहं पित्तहरं ज्वराणां पृथक्पृथग्हत्क्रिमिदारुणं च ॥२॥
अरहरका यूष मधुर है, शोषता है, वातको दूर करता है, कफको और पित्तको हरता है,
समस्त ज्वरोंको शांत करता है, कृमिरोगको नाशता और दारुण अर्थात् गर्म है ॥ २ ॥
अथ मूँगके यूषका गुण ।
शीतलं मधुरं मौद्गयूषं पित्तविकारजित् ॥
तच्च वातहरं प्रोक्तं ज्वराणां शमनं परम् ॥३॥
मूँगका यूष शीतल है, मधुर है, पित्तके विकारको जीतता है, वातको हरता है और
ज्वरोंको निश्चय शांत करता है ॥ ३ ॥
अथ चनाके यूषका गुण ।
कषायं कटुकं चोष्णं वातघ्नं कफदोषकृत् ॥
रक्तपित्तं निहन्त्याशु चणानां यूषमुच्यते ॥ ४ ॥
चनाका यूष कसैला है, चरचरा है, गरम है, वातको नाशता है, कफको करता है और रक्त-
पित्तको निश्चय नाशता है ॥ ४ ॥
१ “आढकी तु तुवर्या स्त्री” इति मेदिनी ।