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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 110

( ७८ ) हारितसंहिता । [ प्रथमस्थाने-
चावलोंका मांड पित्तको हरता है, परिश्रमको हरता है, पथरीको हरता है, वायुको उपजात
है, रक्तको शांत करता है, कब्जको करता है और अग्निको अच्छी तरह जगाता है ॥ १ ॥
अथ लाल चावलके मांडका गुण ।
रक्तशाल्युद्भवं मण्डं मधुरं ग्राहि शीतलम् ॥
प्रमेहानश्मरीं हन्ति वातलं पित्तहृद्वरम् ॥ २ ॥
लाल चावलोंका मांड मधुर है, कब्जको करता है, शीतल है, प्रमेहोंको और पथरीको हरता
है, वातल है, पित्तको हरता है, सुन्दर है ॥ २ ॥
अथ सफेद चावलोंके मांडका गुण ।
मधुरं शीतलं किञ्चिच्छ्लेष्मलं शोषनाशनम् ॥
अश्मरीमेहसंच्छर्दिवातलं श्वेततण्डुलम् ॥ ३ ॥
सफेद चावलोंका मांड मधुर है, शीतल है, कुछ कफको करता है, शोषको नाशता है और
पथरी, प्रमेह, छर्दि, वात इनको करता है ॥ ३ ॥
अथ जवोंके मांडका गुण !
यवमण्डं कषायं स्याद्ग्राहि चोष्णे विपाकि च ॥
जवोंका मांड कसैला है, कब्जको करता है, गरम पाकवाला है।
अथ गेहूँके मांडका गुण ।
तद्वद्गोधूमसम्भूतं मधुरं पित्तवारणम् ॥ ४ ॥
गेहुँओंका मांड जवोंके मांडके समान गुण देता है, परंतु मधुर है और पित्तको दूर
करता है ॥ ४ ॥
अथ क्षुद्र-अन्नके मांडका गुण ।
अन्येषां क्षुद्रधान्यानां मण्डं वातहरं स्मृतम् ॥
अन्य क्षुद्रसंज्ञक अन्नोंका मांड वातको हरनेवाला कहा है ।
अथ कोदूं अन्नके मांडका गुण ।
ग्लानिमूर्च्छाकरं सद्यः कोद्रवं न हितं मतम् ॥ ५ ॥
कोदूं अन्नका मांड ग्लानिको और मूर्च्छाको शीघ्र करता है और हित नहीं माना है ॥ ५ ॥
अथ क्षुद्र अन्नके कांजीका गुण ।
तद्वच्च क्षुद्रधान्याम्लं वातलं पित्तकारकम् ॥ करोति श्लीपदं
गुल्मं प्रतिश्यायादिकोपनम् ॥ ६ ॥ इत्यात्रेयभाषिते हारी-
तोत्तरे मण्डवर्गो नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥