सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 109, कुल 548 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 109

अ० १२ ] भाषाटीकासमेता । ( ७७ )
तेलसे युक्त हुई कांजी पीनेसे आमको जराती है, शरीरके बाहिरके दाहको और परिश्रमको
हरती है, कुष्ठको और खाजको तथा वायुको नाशती है ॥ ५ ॥
अथ युगंधरकांजीका गुण ।
युगन्धराम्लं कफवातहन्तृ शूलामयानां जरणप्रकर्त्तृ ॥
तीक्ष्णं तथाम्लं श्रमदोषहन्तृ मेहार्शसो रक्तहितं मतं च ॥ ६ ॥
जवारकी कांजी कफको और वातको हरती है, शूल रोगोंको जलाती है, तीक्ष्ण है, खट्टी
है, श्रम दोषको हरती है, प्रमेहमें बवासीरमें और रक्तमें हित कही गयी है ॥ ६ ॥
अथ कांजीका परिहार ।
शोषे मूर्च्छाज्वरार्त्तानां भ्रमके दुर्विषाद्दिते ॥ कुष्ठानां रक्तपित्तानां
काञ्जिकं न प्रशस्यते ॥ ७ ॥ पाण्डुरोगे राजयक्ष्मे तथा शोफा-
तुरेषु च ॥ क्षतक्षीणे पथि श्रान्ते मन्दज्वरनिपीडिते ॥ नरे नैव
हितं प्रोक्तं काञ्जिकं दोषकारकम् ॥ ८ ॥
शोषमें, मूर्छा और ज्वरसे पीडितको भ्रममें, दुष्ट विषकी पीडामें, कुष्ठ और रक्तपित्तमें कांजी
अच्छी नहीं है ॥ ७ ॥ पांडुरोगमें, राजरोगमें और शोजासे पीडित रोगीको और क्षतसे क्षीण
हुएको और मार्गमें थके हुए और मंद ज्वरसे पीडितको कांजी अच्छी नहीं है किंतु दोषोंको
करती है ॥ ८ ॥
अथ कांजीकी प्रशंसा ।
शूलवातार्द्दितानां तु तथा जीर्णविबन्धिनाम् ॥ श्रेष्ठं प्रोक्तं तथा-
म्लं च गुणाधिक्यं नरेषु च ॥ ९ ॥ इति आत्रेयभाषिते हारीतो-
त्तरे काञ्जिकवर्गो नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
शूल और वातसे पीडितोंको, अजीर्ण और बद्धकोष्ठवालोंको कांजी श्रेष्ठ है और मनुष्योंमें
गुणोंकी अधिकता करती है ॥ ९॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्राह्यनुवादित-
हारीतसंहिताभाषाटीकायां कांजिकवर्गो नाम एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
द्वादशोऽध्यायः १२.
अथ चावलोंके मंडका गुण ।
धान्यमण्डं पित्तहरं श्रमघ्नं चाश्मरीहरम् ॥
वातलं रक्तशमनं ग्राहि सन्दीपनं वरम् ॥ १ ॥