हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
पृष्ठ 160, कुल 258 में से
संदर्भ में पढ़ें७४ - हम्मीररासो -
छंडूहूँ १ नटेकयह बिरद मम सेख रक्खि २ जंगहिं करयौ ३ ।४१२।
तजै सेस जो भुम्मि मेरु चल्लै ४ घर उप्पर।
उलटि गंग बह नीर सूर उग्गै ५ पच्छिम भर॥
ध्रुव चल्लै आकास समद मरजाद सुछंडै।
सतीसंग पति कढै बहुरि घर आय ६ सुमंडै॥
थिर रह्यौ न यह संसार कोइ सुनो साहि साखी सु ध्रुव ७।
दसकंध धरणि अज्जुन जिसा स्वप्नहिं ८ सम दिखंत ९ मुव ॥४१३॥
दोहरा छंद
कलि मैं अमर जु कोइ १० नहिँ ११, इसम देखि नहिं भूल ।
तुम से किते अलावदी, या धरती १२ पर धूलि १३ ॥४१४॥
अपने कौ सूर न गिने, कायर गिनै न और ।
अपनी कीरति आप १४ मुख, यह कहबौ नहिं जोर ॥४१५॥
लिखे लेख करतार कै, हजरति मेट १५ न कोय ।
को जाणै रणथंभ गढ़, अब यह कैसो १६ होय ॥४१६॥
चौपाई छंद
लिखे हमीर साहि सब १७ वंचे ।
करि मन कोप जंग कौं नंचे ॥
तीन सहस नीसाँन सु बज्जे ।
धर अंबर मग १८ सोर सुगज्जे ॥ ४१७॥
रणतभँवर चहुँ ओर सु घेरिव ।
दल न समात पुहमि सब हेरिव ॥
१ छाडू । २ राखि । ३ मुरौं, करौं अंत्यानुप्रास । ४ चल्लहि ।
५ उग्गाहि । ६ आपु । ७ सुनो साखि यह साखि ध्रुव । ८ सुपन ।
९ दीखंत । १० को । ११ नहीं । १२ धरनी । १३ धूरि । १४ अप्न ।
१५ मौति । १६ साको । १७ सो । १८ मधि ।
CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri