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सर्वकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 72, कुल 600 में से

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पृष्ठ 72

३४ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० १९
उदान+पांच इन्द्रिय अर्थात् श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, रसना और घ्राण+पांच भूत अर्थात् भूमि,
जल, अग्नि, वायु और आकाश ] इन पन्द्रह पदार्थ वाले (स्तोमम्) स्तुति योग्य
व्यवहार, (प्रतीचीं दिशम्) पश्चिम वा पीछे वाली दिशा, (ग्रीष्मम् ऋतुम्) ग्रीष्म
ऋतु, (अध्यात्मम्) आत्मा के जताने वाले यन्त्र [अर्थात्] (प्राणम्) प्राण वा
श्वास, (नासिके) दो नथने, (गन्धघ्राणम् इति) गन्ध सूंघने के सामर्थ्य (इन्द्रि-
याणि) इन्द्रियों [ज्ञान और कर्म के साधनों] को (अन्वभवत्) उस [ब्रह्मा] ने
बनाया ॥ १८ ॥
भावार्थ:--अन्तरिक्ष, वायु आदि को परमेश्वर ने बनाया है ॥ १८ ॥
कण्डिका १९ ॥
तस्य तृतीयया स्वरमात्रया दिवमादित्यं सामवेदं स्वरिति १व्याहृतिं जागतं
छन्दः सप्तदशं स्तोममुदीचीं दिशं वर्षा ऋतुं ज्योतिरध्यात्मं चक्षुषी दर्शनमिती-
न्द्रियाण्यन्वभवत् ॥ १९ ॥
कण्डिका १९ ॥ ओम् की तीसरी स्वरमात्रा से सूर्य आदि की रचना ॥
(तस्य) उस [ओम्] की (तृतीयया स्वरमात्रया) तीसरी स्वरमात्रा [ओकार]
से (दिवम्) प्रकाश लोक (आदित्यम्) सूर्यमण्डल, (सामवेदम्) सामवेद [मोक्ष-
विद्या], (स्वः इति) स्वः [सुखरूप परमात्मा है] (व्याहृतिम्) व्याहृति,
(जागतम्) जगत् के हितकारक (छन्दः) आनन्ददायक कर्म, (सप्तदशम्) सत्रहवें
[चार दिशा, चार विदिशा, एक ऊपर को और एक नीचे की-दश दिशायें सत्त्व रज
और तम, ईश्वर, जीव और प्रकृति इन सोलह के सहित सत्रहवें संसार-का० ५]
से संबन्ध वाले (स्तोमम्) स्तुति योग्य व्यवहार, (उदीचीं दिशम्) उत्तर वा बाईं
दिशा, (वर्षाः ऋतुम्) वर्षा ऋतु (अध्यात्मम्) आत्मा के जताने वाले यन्त्र
[अर्थात्] (ज्योतिः) ज्योति, (चक्षुषी) दो आंख, (दर्शनम् इति) देखने के सामर्थ्य
(इन्द्रियाणि) इन्द्रियों [ज्ञान और कर्म के साधनों] को (अन्वभवत्) उस [ब्रह्मा]
ने बनाया ॥ १९ ॥
भावार्थ:--सूर्य आदि लोक और अनेक व्यवहार के साधन परमेश्वर ने
बनाये हैं ॥ १९ ॥
संख्येये (पा० २ । २ । २१) इति पश्चाधिको दश यत्र ते पञ्चदशाः। बहुव्रीहौ
सङ्ख्येये डजबहुगणात् (पा० ५ । ४ । ७३) पञ्चदशन्-डच् । पञ्चप्राणेन्द्रियभूतानि
यस्मिन् तत् तथाभूतम् (गन्धघ्राणम्) गन्धग्रहणसामर्थ्यम् ॥
१९-(जागतम् तस्मै हितम् (पा० ५ । १ । ५) जगत्-अण् । संसारहित-
करम् । अन्यद्गतम् ॥
१ क. १७, १८, १९ इत्यत्र पुं. सं. 'व्याहृतिः' इति पाठः । सम्पा०