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सर्वकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 544, कुल 600 में से

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पृष्ठ 544

५०६ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ६ । क० ५
यह [ ब्राह्मण वचन बोलकर ] अपरिमित [ बेगिनती ऋचाओं ] से दोनों पिछले सवनों में
[ माध्यन्दिन और तृतीयसवन में स्तोम बढ़ाकर बोला जाता है ] । ( अपरिमितः वै
स्वर्गः लोकः, स्वर्गस्य लोकस्य समष्टयै ) अपरिमित [ परिमाण रहित ] ही स्वर्ग
लोक है, स्वर्ग लोक की प्राप्ति के लिये [ यह कर्म होता है ] । ( तत् यथा अभिहेषते
पिपासते क्षिप्रं प्रयच्छेत्, तादृक् तत् समानीभिः परिदध्युः ) सो जैसे हिनहिनाते हुये,
प्यासे [ घोड़े ] को शीघ्र [ जल ] देवे, वैसे ही उस [ यज्ञ कर्म ] को समान ऋचाओं से
समाप्त करे । ( एषां ह एव सन्ततः आरब्धः अविस्रस्तः यज्ञः भवति, ऋचा सन्ततं
वषट्कृत्यं सन्तत्यै ) इन [ पुरुषों ] का ही फैलाया हुआ, आरम्भ किया हुआ यज्ञ विनाश
रहित होता है, ऋचा द्वारा फैलाया हुआ वषट् कर्म [ यजमान के ] फैलाव कें लिए है ।
( प्रजया पशुभिः सन्धीयते, यः एवं वेद ) प्रजा और पशुओं से वह संयुक्त होता है, जो
ऐसा विद्वान् है ॥ ५ ॥
भावार्थः—यज्ञों के यथाविधि समाप्त होने पर यजमान लोग सुख पाते हैं ॥ ५ ॥
विशेषः १—इस कण्डिका को ऐ० ब्रा० ६ । २३ । से मिलाओ ॥
विशेषः २—प्रतीक वाले मन्त्र अर्थ सहित लिखे जाते हैं ॥
१—व्य१ न्तरिक्षमतिरन्मदे सोमस्य रोचना । इन्द्रो यदभिनद् वलम् ॥
अथर्व० २० । २८ । १ ॥ इत्यादि ऊपर आ चुका है—गो० उ० ५ । १३ ॥
२—एवेदिन्द्रं वृषणं वज्रबाहुं वसिष्ठासो अभ्यर्चन्त्यर्कैः । स न स्तुतो
वीरवद् धातु गोमद् यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः—अथर्व० २० । १२ । ६, ऋग्०
७ । २३ । ६, यजु० २० । ५४ ॥ यह मन्त्र आ चुका है—गो० उ० ४ । २ ॥
३—नूनं सा ते प्रति वरं जरित्रे दुहीयदिन्द्र दक्षिणा मघोनी । शिक्षा
स्तोतृभ्यो माति धग्भगो नो बृहद्वदेम विदथे सुवीराः—ऋग्० २ । ११ । २१, २ ।
१५ । १०, २ । १६ । ६, २ । १७ । ६, २ । १८ । ९, २ । १९ । ९, २ । २० । ९,
और निरु० १ । ७ ॥ (इन्द्र) हे इन्द्र ! [बड़े ऐश्वर्य वाले वीर] (नूनम्) निश्चय करके
( ते ) तेरी ( सा ) वह ( मघोनी ) बहुत धन वाली ( दक्षिणा ) दक्षिणा [ दानक्रिया ]
( जरित्रे ) स्तुति करने वाले के लिये ( वरम् ) वर [ कामना ] ( प्रति ) प्रत्यक्ष
( दुहीयत् ) पूर्ण करे । ( स्तोतृभ्यः ) स्तुति करने वालों को ( शिक्ष ) शिक्षा दे,
( नः ) हमें ( अति = अतीत्य ) छोड़ कर ( भगः ) [ हमारे ] ऐश्वर्य को ( मा धक् )
मत भस्म कर, ( सुवीराः ) बड़े वीरों वाले हम ( विदथे ) ज्ञान स्थान यज्ञ में ( बृहत् )
बृहत् [ साम आदि विज्ञान ] ( वदेम ) कहें ॥
४—नू ष्टुत इन्द्र नू गृणान इषं जरित्रे नद्यो ३ न पीपेः । अकारि ते
हरिवो ब्रह्म नव्यं धिया स्याम रथ्यः सदासाः—ऋ० ४ । १६ । २१, ४ । १७ ।
२१, ४ । १९ । ११, ४ । २० । ११, ४ । २१ । ११, ४ । २२ । ११, ४ । २३ । ११,
हेषृ अश्वशब्दे—शतृ, आर्षं परस्मैपदम् । हेषां कुर्वणाय ( पिपासते ) तृषिताय .
( अविस्रस्तः ) अविनाशितः ( सन्धीयते ) संयुज्यते ॥