गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 482, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ें४४४ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ । क० १६
को ( पुरा ) पहिले ( प्र ) अच्छे प्रकार ( आनिनाय ) लाया है, ( तम् उ ) उस ही
( इन्द्रम् ) इन्द्र [ महाप्रतापी वीर ] को, ( सखायः ) हे मित्रो ! ( वः ) तुम्हारी
( ऊतये ) रक्षा के लिये ( स्तुषे ) मैं सराहता हूं ॥
४--प्र मंहिष्ठाय बृहते बृहद्रये सत्यशुष्माय तवसे मतिं भरे । अपामिव
प्रवणे यस्य दुर्धरं राधो विश्वायु शवसे अपावृतम्-अथर्व० २० । १५ । १, ऋग्० १ ।
५७ । १ ॥ (मंहिष्ठाय) अत्यन्त दानी, ( बृहते ) महागुणी, ( बृहद्रये ) महाधनी,
( सत्यशुष्माय सच्चे बलवान् [ सभाध्यक्ष ] के लिये ( तवसे ) बल पाने को (मतिम् )
बुद्धि ( प्र ) उत्तम रीति से ( भरे ) मैं धारण करता हूँ (प्रवणे ) ढालू स्थान में (अपाम्
इव ) जलों के [ प्रवाह के ] समान, ( यस्य ) जिस [ सभाध्यक्ष ] का (दुर्धरम् ) बेरोक
( विश्वायु ) सब को जीवन देने वाला ( राधः ) धन (शवसे ) बल के लिये (अपा-
वृतम् ) फैला हुआ है ॥
५--उदप्रतो न वयो रक्षमाणा वावदतो अभ्रियस्येव घोषाः । गिरिज्रो
नोर्मयो मदन्तो बृहस्पतिम्अभ्य१ र्का अनावन्-अथर्व २० । १६ । १, ऋग्० १० ।
६८ । १ ॥ ( उदप्रुतः ) जल को प्राप्त हुये, ( रक्षमाणाः ) अपनी रक्षा करते हुये
( वयः न ) पक्षियों के समान, (वावदतः ) बार बार गरजते हुये ( अभ्रियस्य ) बादल
के (घोषाः इव ) शब्दों के समान ( गिरिभ्रजः ) पहाड़ों से गिरते हुये, (मदन्तः )
तृप्त करते हुये ( ऊर्मयः न ) जल के प्रवाहों के समान, ( अर्काः ) पूजनीय पण्डितों ने
( बृहस्पतिम् ) बृहस्पति [ बड़ी वेदवाणी के रक्षक महाविद्वान् ] को ( अभि ) सब
ओर से ( अनावन् ) सराहा है ॥
६--अच्छा म इन्द्रं मतयः स्वर्विदः सध्रीचीर्विश्वा उशतीरनूषत । परिष्व-
जन्ते जनयो यथा पतिं मर्यं न शुन्ध्युं मघवानमूतये--अथर्व० २० । १७ । १,
ऋग्० १० । ४३ । १ ॥ ( स्वर्विदः ) सुख पहुँचाने वाली, ( सध्रीचीः ) आपस में मिली
हुई, ( उशतीः ) कामना करती हुई, ( विश्वाः ) सब ( मे ) मेरी ( मतयः ) बुद्धियों
ने ( इन्द्रम् ) इन्द्र [ महाप्रतापी राजा ] को ( अच्छा ) अच्छे प्रकार से ( अनूषत )
सराहा है और ( ऊतये ) रक्षा के लिये [ ऐसे, उसे ] (परिष्वजन्ते ) सब ओर से घेरती
हैं, ( यथा ) जैसे ( जनयः ) पत्नियां ( पतिम् ) [ अपने अपने ] पति को और ( न )
जैसे ( शुन्ध्युम् ) शुद्ध आचार वाले ( मघवानम् ) महाधनी ( मर्यम् ) मनुष्य को [लोग
घेरते हैं ] ॥
७-बृहस्पतिर्नः परि पातु पश्चादुतोत्तरस्मादधरादघायोः इन्द्रः पुरस्तादुत
मध्यतो नः सखा सखिभ्यो वरिवः कृणोतु--अथर्व० २० । १७ । ११, ऋग्० १० ।
४३ । ११ ॥ ( बृहस्पतिः ) बृहस्पति [ बड़े शूरों का रक्षक सेनापति ] ( नः ) हमें
( पश्चात् ) पीछे से, ( उत्तरस्मात् ) ऊपर से ( उत ) और ( अधरात् ) नीचे से
( अघायोः ) बुरा जीतने वाले शत्रु से ( परि पातु ) सब प्रकार बचावे । ( इन्द्रः )
इन्द्र [ बड़े ऐश्वर्य वाला राजा ] ( पुरस्तात् ) आगे से ( उत ) और ( मध्यतः )
मध्य से ( नः ) हमारे लिये ( वरिवः ) सेवनीय धन ( कृणोतु ) करे, ( सखा )
[ जैसे ] मित्र ( सखिभ्यः ) मित्रों के लिये [ धन करता है ] ॥