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सर्वकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 481, कुल 600 में से

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पृष्ठ 481

गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४। क० १६ ४४३
विद्वान् ब्राह्मणाच्छंसी [ ऋत्विज् ] इस [ स्तुति ] से परिधानीया इष्टि करता है। (बृहस्पते
युवम् इन्द्रश्च वस्वः······इति यजति ) बृहस्पते युवम् इन्द्रः च वस्वः····८-इस मन्त्र'
से वह याज्या आहुति देता है। ( एते एव देवते तत् यथाभागं प्रीणाति वषट्कृत्य
अनुवषट्करोति ) इन ही दोनों देवताओं को उससे अपने अपने भाग के अनुसार वह
प्रसन्न करता है और वषट्कार करके अनुवषट्कार [ अन्तिम आहुति दान ] करता है।
( प्रति एव अभिमृशन्ते, अनाराशंसाः न आप्याययन्ति न हि सीदन्ति ) वे [ ऋषि
लोग ] प्रत्यक्ष ही विचारते हैं—नरों [ नेताओं ] की स्तुति बिना यज्ञ [ यजमान को ] न
बढ़ाते हैं और नहीं चलते हैं [ नहीं आप बढ़ते हैं। देखो क० ३ ] ॥ १६ ॥
भावार्थः—कण्डिका १५ के समान है ॥ १६ ॥
विशेष : १—( वृहद्रथ ) के स्थान पर ( बृहद्रथ ) वेदमन्त्र से शुद्ध किया है ॥
विशेषः २--प्रतीक वाले मन्त्र अर्थ सहित लिखे जाते हैं ॥
१--इन्द्रश्च सोमं पिबतं बृहस्पतेऽस्मिन् यज्ञे मन्दसाना वृषण्वसू । आं
वां विशन्त्विन्दवः स्वाभुवोऽस्मे रयिं सर्ववीरं नि यच्छतम्---अथर्व० २०। १३ ।
१, ऋग्० ४ । ५० । १० ॥ (बृहस्पते) हे बृहस्पति ! [ बड़ी वेदवाणी के रक्षक
विद्वान् ] ( च ) और ( इन्द्रः ) हे इन्द्र ! [ अत्यन्त ऐश्वर्य वाले राजन् ] (मन्दसाना)
आनन्द देने वाले, ( वृषण्वसू ) बलवान् वीरों के निवास कराने वाले तुम दोनों (सोमम् )
सोम [ उत्तम ओषधियों के रस ] को (अस्मिन् ) इस ( यज्ञे ) यज्ञ [राजपालन व्यवहार]
में ( पिबतम् ) पीओ । (स्त्राभुवः) अच्छे प्रकार सब ओर होने वाले ( इन्दवः )
ऐश्वर्य ( वाम् ) तुम दोनों में ( आ विशन्तु ) प्रवेश करें, ( अस्मे ) हम को ( सर्व-
वीरम् ! सबको वीर बनाने वाला ( रयिम् ) धन ( नि ) नियम पूर्वक ( यच्छतम् )
तुम दोनों दो ॥
२--वयमु त्वामपूर्व्वं स्थूरं न कच्चिद् भरन्तोऽवस्यवः । वाजे चित्रं
हवामहे - अथर्व २० । १४ । १, ऋग्० ८ । २१ । १, साम० पू० ५ । २ । १० ॥
( अपूर्व्यं ) हे अनुपम ! [ राजन् ] ( कत् चित् ) कुछ भी ( स्थूरम् ) स्थिर वस्तु (न)
नहीं ( भरन्तः ) रखते हुये, (अवस्यवः) रक्षा चाहने वाले ( वयम् ) हम ( वाजे )
संग्राम के बीच ( चित्रम् ) विचित्र स्वभाव वाले (त्वाम् ) तुझ को ( उ ) ही ( हवा-
महे ) बुलाते हैं ॥
३--यो न इदमिदं पुरा प्र वस्य आनिनाय तमु वः स्तुषे । सखाय इन्द्र-
मूतये-अथर्व० २० । १४ । ३, ऋग्० ८ । २१ । ९, साम० उ० ५ । २ । २ ॥ (यः)
जो [ पराक्रमी ] ( नः ) हमारे लिये ( इदमिदम् ) इस-इस ( वस्यः ) उत्तम वस्तु
रिगागमः, वरिवो धननाम--निघ० २ । १० । वरणीयं धनम् ( कृणोतु )
करोतु ( अत्वीयम् ) भृमृशीङ्० ( उ० १ । ७ ) ऋत जुगुप्सायाम्--उप्रत्ययः ।
अतुं--छः । निन्दायो ग्यम् ( युवम् ) युवाम् ( वस्वः ) वसुनः । धनस्य । अन्यत्
पूर्ववत् क० १५ ॥