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सर्वकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 442, कुल 600 में से

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पृष्ठ 442

४०४ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ । क० २१
है । यह मन्त्र कुछ भेद से महर्षि दयानन्दकृत संस्कारविधि विवाह प्रकरण में वधू वर के
परस्पर प्रतिज्ञा करने में भी व्याख्यात है । मन्त्र में पद एक वचन और द्विवचन हैं ॥
( अमोऽहमस्मि सा त्वं सामाहमस्म्यृक् त्वं द्यौरहं पृथिवी त्वम् । ताविह सं भवाव
प्रजामा जनयावहै—अथर्व० १४ । २ । ७१ ) । [ हे वधू ! ] ( अहम् ) मैं [ वर ]
( अमः अस्मि ) ज्ञानवान् हूँ, ( सा त्वम् ) सो तू [ ज्ञानवती है ], ( अहम् ) मैं
( साम ) सामवेद [ मोक्षज्ञान के समान सुखदायक ] ( अस्मि ) हूं, ( त्वम् ) तू
( ऋक् ) ऋग्वेद की ऋचा [ पदार्थों के गुणों की बड़ाई बताने वाली विद्या के तुल्य
आनन्द देने वाली ] है, ( अहम् ) मैं (द्योः) सूर्य [ वृष्टि आदि करने वाले सूर्य के समान
उपकारी ] हूं, और ( त्वम् ) तू ( पृथिवी ) पृथिवी [ अन्न आदि उत्पन्न करने वाली
भूमि के समान उत्तम सन्तान उत्पन्न करने वाली ] है । ( तौ ) वे हम दोनों ( इह )
यहां [ गृहाश्रम में ] ( सं भवाव ) पराक्रमी होवें, और ( प्रजाम् ) प्रजा [ उत्तम
सन्तान ] को ( आ जनयावहै ) उत्पन्न करें ॥
कण्डिका २१ ॥
आत्मा वै स्तोत्रियः, प्रजा अनुरूपः, पत्नी धाय्या, पशवः प्रगाथः, गृ'हाः
सूक्तं, यदन्तरात्मन् तन्निवित्, प्रतिष्ठा परिधानीया, अन्नं याज्या । सोऽस्मिंश्च
लोके भवत्यमुष्मिंश्च प्रजया च पशुभिश्च गृहेषु भवति, य एवं वेद ॥ २१ ॥
कण्डिका २१ ॥ स्तोत्रिय आदि यज्ञाङ्गों की आत्मा आदि
से सामान्‍यता ॥
( आत्मा वै स्तोत्रियः ) आत्मा [ के समान ] ही स्तोत्रिय [ स्तुति विशेष ] है,
( प्रजाः अनुरूपः ) प्रजायें अनुरूप [ विषय के सदृशं स्तोत्र ] हैं, (पत्नी धाय्या) पत्नी
धाय्या [ स्तुति विशेष ] है । (पशवः प्रगाथः) सब पशु प्रगाथ [ स्तुति विशेष ] हैं।
( गृहाः सूक्तम् ) सब घर सूक्त [ अच्छे प्रकार कहा हुआ स्तोत्र ] हैं, ( यत् अन्तरात्मन्,
तत् निवित् ) जो अन्तरात्मा [ अन्तःकरणवर्ती पराक्रम ] है, वह निवित् [ निश्चित विद्या,
स्तुति विशेष ] है, ( प्रतिष्ठा परिधानीया ) प्रतिष्ठा [ ठहरने का स्थान ] परिधानीया
[ सब ओर से धारण करने योग्य स्तुति विशेष ] है, ( अन्नं याज्या ) अन्न [ भोजनीय
पदार्थ के तुल्य ] याज्या [ स्तुति विशेष ] हैं । ( सः अस्मिन् च अमुष्मिन् च लोके
प्रजया च पशुभिः च गृहेषु भवति भवति, यः एवं वेद ) वह पुरुष इस और उस
लोक में प्रजा के साथ और पशुओं के साथ घरों में बढ़ता है, रहता है, जो ऐसा
जानता है ॥ २१ ॥
२१—( अनुरूपः ) विषयसदृशः स्तोमः ( आत्मा ) जीवः ( अन्तरात्मन् )
अन्तःकरणवर्ती पराक्रमः । सर्वान्तर्यामी परमेश्वरः ( निवित् ) सत्सूद्विषद्रुह-
दुह० ( पा० ३ । २ । ६१ ) नि+विद ज्ञाने - क्विप् । निवित्, वाङ्नाम-निघ०
१ । ११ । निश्चितविद्या । स्तुतिविशेषः ॥
१. पू. सं. 'ग्रहाः' इति पाठः ॥ सम्पा० ॥