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सर्वकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 261, कुल 600 में से

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पृष्ठ 261

गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० ५ । क० ५ ॥ २२३
[ १,२३,०१,८७, ५०,००० ] एतर्हि हैं । २१ । ( यावन्ति एतर्हीणि तावन्ति स्वेदाय-
नानि २२ ) जितने एतर्हि हैं उतने [ १,२३,०१,८७,५०,००० ] स्वेदायन [ पसीने के
मार्ग ] हैं । २२ । ( यावन्ति स्वेदायनानि तावन्ति क्षिप्रायणानि २३ ) जितने स्वेदा-
यन हैं उतने [ १,२३ ०१,८७,५०,०० ] क्षिप्रायण [ शीघ्र मार्ग ] हैं । २३ । ( यावन्ति
क्षिप्रायणानि तावन्तः रोमकूपाः २४ ) जितने क्षिप्रायण हैं उतने ( १,२३,०१,८७,
५०,८०० ) रोमकूप हैं । २४ । ( यावन्तः रोमकूपाः पञ्चदशकृत्वः तावत्यः वर्षतः
धाराः ) जितने रोमकूप पन्द्रह बार [ १,२३,०१,८७,५०,००० x १५ = १८,४५,२८,
१२,५०,००० ] हैं उतनी वर्षत् की धारायें [ सेचनशील नाड़ियों के प्रवाह ] हैं । ( तत्
एतत् क्रोशशतिकं परिमाणम् २५ ) सो यह सौ क्रोश वाला परिणाम [गणना] है । २५ ।
( तत् अपि एतत् ऋचा उक्तम् ) सो यह भी इस ऋचा करके कहा गया है—
( पुरुषः श्रमात् अन्यत्र परिवर्तमानः आसीनः यदि वा स्वपन् अपि चरतु अहो-
रात्राभ्यां क्षणेन कतिकृत्वः प्राणिति च अपानिति च ) मनुष्य श्रम से दूसरे स्थान में
लगा हुआ चाहे बैठा हुआ, चाहे सोता हुआ वर्त्तमान हो, वह दिन और रात्रि के साथ क्षण
[ की समता ] से कितनी बार प्राण लेता है और अपान लेता है । १ । ( परिवत्सराणां
शतं शतानि अष्टौ च शतानि यान् मुहूर्त्तान् वदन्ति, पुरुषः अहोरात्राभ्यां समेन
कतिकृत्वः प्राणिति च अपानिति च—इति ब्राह्मणम् ) पुरुष परिवत्सरों के सौ सैकड़े
और आठ सैकड़े जिन मुहूर्तों को कहते हैं, पुरुष दोनों दिन और रात्रि के साथ समानता से
कितने बार प्राण लेता है और अपान लेता है । २ । —यह ब्राह्मण [ ब्रह्मज्ञान ] है । ५ ॥
[ यह दोनों श्लोक ब्राह्मण वचन हैं, वेदों में नहीं हैं, इनका भावार्थ विचारणीय है । ]
भावार्थः — मनुष्य शरीर में स्थूल रूप से प्राण हृदय में १, अपान मलाशय में २,
व्यान समस्त शरीर में ३, समान नाभि में ४, और उदान कण्ठ में ५, रहता है ऐसां
मानते हैं । फिर जैसे जैसे नाड़ियां एक से एक सूक्ष्म होकर गणना में बढ़ती जाती हैं, वैसे
ही वायु की गति भी सूक्ष्म और अधिक होकर बढ़ती जाती है । स्थान वा नाड़ियों में
गति के भेद से एक ही वायु के अलग अलग नाम और काम हैं । तात्पर्य यह है कि जैसे
इति एतः । आदीयंते गृह्यते आ+दा—किः । एतानां गतीनाम् आदीनि ग्रहण-
शीलानि अङ्गानि । नाडीविशेषाः ( एतर्हीणि ) इण् गतौ—तन् । सर्वधातुभ्य इन्
( उ० ४ । ११८ ) एत + अहं पूजायां योग्यत्वे च—इन्, पृषोदरादि रूपम् । गति-
योग्यानि अङ्गानि । नाडीविशेषाः ( स्वेदायनानि ) स्वेदस्य गात्रस्रवस्य अयनानि
मार्गाः ( क्षिप्रायणानि ) क्षिप्राणि शीघ्राणि अयनानि मार्गाः येषां तानि ( वर्षतः )
वर्त्तमाने पृषद्वृहन्महज्जगच्छतॄवच्च ( उ० २ । ८४ ) वृषु सेचने प्रजनैश्वर्ययोश्च—अतिः ।
सेचनशीलनांडीसमूहस्य ( धाराः ) प्रवाहाः ( क्रोशशतिकम् ) क्रुश रोदने
आह्वाने च—घञ् । क्रोशः महासंख्याविशेषः । तदस्य परिमाणम् ( पा० ५ । १ ।
५७ ) क्रोशशत्—ठन् । क्रोशशतयुक्तम् ( परिवर्तमानः ) परिवृतः ( परिवत्सरा-
णाम् ) वत्सरविशेषाणाम् ( समेन ) समत्वेन ॥