सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 187, कुल 600 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 187

गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० ३ । क० ९ ।। १४६
प्रयाजे समानयति तस्माद् इमे श्रोत्रे अन्ततः समे इव दीर्णे १६) जो कि चौथे
प्रयाज [ यज्ञ ] में [ हवि ] समान लाता है, इसलिये यह दोनों कान अन्त में समान से
फटे हुये हैं १६ । ( यत् जपं जपित्वा अभिहिङ्करोति तस्मात् पुमांसः श्मश्रुवन्तः
१७ स्त्रियः अश्मश्रुवः १८ ) जो जप को जप कर हिङ्कार शब्द करता है, इसलिये
पुरुष दाढ़ी मूंछ वाले होते हैं १७, और स्त्रियां बिना दाढ़ी मूंछ वाली १८ । ( यत् सामि-
धेनीः संतन्वन् आह तस्मात् आसां सन्ततम् इव शरीरं भवति १९ ) जो कि
सामिधेनी ऋचाओं [ अग्नि जलाने के मन्त्रों ] को फैलाता हुआ बोलता है, इसलिये
इन [ प्रजाओं ] का फैला हुआ सा शरीर होता है १९ । ( यत् सामिधेन्यः काष्ठहविषः
भवन्ति तस्मात् आसा म् अस्थीनि दृढतराणि इव भवन्ति २० ) जो कि सामिधेनी
ऋचायें काष्ठ के हवि वाली होती हैं, इसलिये इनकी हड्डियां अधिक दृढ़ होती हैं २० ।
( यत् प्रयाजा आज्यहविषः भवन्ति, तस्मात् आसां प्रथमे वयसि रेतः सिक्तं न
सम्भवति २१ ) जो कि प्रयाज [ यज्ञ ] जमे हुये घी के हवि वाले होते हैं, इसलिये इन
[ प्रजाओं ] की पहिली अवस्था में वीर्य सींचा हुआ नहीं निकलता है २१ । ( यत् हविषां
मध्ये दध्ना च पुरोडाशेन च प्रचरन्ति तस्मात् आसां मध्यमे वयसि रेतः सिक्तं
सम्भवति २२, ) जो हवियों के मध्य में दही से और पुरोडाश [ मालपूये ] से हवन
करते हैं, इसलिये इन की मध्यम अवस्था में वीर्य सींचा हुआ निकलता है २२ । ( यत्
अनुयाजाः आज्यहविषः भवन्ति तस्माद् आसा म् उत्तमे वयसि रेतः सिक्तं न
सम्भवति २३: ) क्योंकि अनुयाज [ पिछले यज्ञ ] जमे हुये घी वाले होते हैं, इसलिये इन-
की पिछली अवस्था में वीर्य सींचा हुआ नहीं निकलता है २३ । ( यत् उत्तमे अनुयाजे
सकृत् अपानिति तस्मात् इदं शिश्नम् उच्चशः एति २४, नीचीपद्यते २५, ) जो कि
सबसे पिछले अनुयाज में सकृत् [ एक बार, शेष हवि उठा कर ] गिराता है, इसलिये यह
मनुष्य लिङ्ग ऊंचा जाता है २४, और नीचा होता है २५ । ( यत् न अपानेत् १शकृच्छूनं
स्यात् ) जो [ हवि ] न गिरावे, [ लिङ्ग ] शकृच्छून [ वीर्य शून्य ] हो जावे, ( यत् मुहुः
अपानेत् शकृति अन्नं स्यात् ) और जो बार बार [ हवि को ] गिरावे, शकृत् [ वीर्य ]
में अन्न [ का रस ] होवे, ( तस्मात् सकृत् अपानिति शकृच्छूनं नेत् स्यात् ) इसलिये
सकृत् [ एक बार ] [ हवि को उठा कर ] गिरावे और वह शकृच्छून [ वीर्यशून्य ] न होवे,
( शकृति अन्नं वेति ) शकृत् [ वीर्य ] में अन्न [ का रस ] पहुंचता है २६ ॥ ६ ॥
भावार्थः—कण्डिका ७ के प्रश्न देखो ॥ ९ ॥
ऋचः ( संतन्वन् ) सम्यग् विस्तारयन् ( अपानिति ) अपनयति । अग्नौ हविःशेषं
क्षिपति ( शकृच्छूनम् ) शकृता वीर्येण शून्यम् ( अपानेत् ) प्रक्षिपेत् ( शकृति )
वीर्ये ( अन्नम् ) अन्नरसः ( वेति ) वी गत्यादिषु । गच्छति ॥
१. शकृत् ( मल, वीर्य ) एवं सकृत् ( एक बार ) ये दो पृथक् शब्द हैं । पू० सं० में यहाँ
व कं० ७ में सर्वत्र दन्त्य सकार ही छपा है, तदनुसार भाष्यकार ने अभेदार्थ मानते हुये
सकृत् की सिद्धि में “वा शश्य सः” पृ. १४४ में लिखा है । वस्तुतः यह उच्चारणगत
अन्धपरम्परा का सूचक है । शकार सकार दोनों एक नहीं है ॥ सम्पा० ॥